ईरान-इसराइल-अमेरिका से जुड़े संघर्ष की वजह से पश्चिम एशिया में लगातार बढ़ते संकट ने विश्व अर्थव्यवस्था को हिला दिया है। संघर्ष को तीन सप्ताह से अधिक समय बीत चुका है। होर्मुज स्ट्रेट पर संकट, तेल आपूर्ति में बाधा और ऊर्जा संकट गहरा गया है। भारत विश्व का तीसरा सबसे बड़ा कच्चा तेल आयातक है। इस संकट से सीधे प्रभावित है। विपक्षी दल लगातार संसद में विस्तृत बहस की मांग कर रहे हैं, लेकिन मोदी सरकार बहस से बच रही है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 23 मार्च को लोकसभा में और 24 मार्च को राज्यसभा में बयान दिया। 25 मार्च को सर्वदलीय बैठक भी बुलाई। इस बैठक में विपक्षी दलों ने सरकार को संकट के समय साथ देने का भरोसा दिया और संसद में इस मुद्दे पर बहस की मांग रखी। विपक्ष इसे “बहस से भागना” बता रहा है, जबकि सरकार “कार्रवाई पर ज़ोर” दे रही है।

पश्चिम एशिया का बढ़ता संकट

पश्चिम एशिया में युद्ध अब 24वें दिन में प्रवेश कर चुका है। ईरान पर हमले, होर्मुज स्ट्रेट में जहाज़ों पर ख़तरा और ऊर्जा संपत्तियों को नुक़सान पहुंचा है। अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (IEA) प्रमुख फ़तिह बिरोल ने चेतावनी दी कि यह संकट “दो तेल संकट और एक गैस संकट” के बराबर है। ब्रेंट क्रूड की क़ीमतें $100 प्रति बैरल से ऊपर पहुंच गईं और कुछ रिपोर्टों में $114 तक की बात कही गई। वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला टूटने से माल ढुलाई लागत बढ़ गई। भारत जैसे आयात-निर्भर देशों के लिए यह “ट्रिपल थ्रेट” यानी ऊर्जा लागत, रेमिटेंस में कमी और रिवर्स माइग्रेशन का संकट बन गया है।
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भारत की अर्थव्यवस्था पर असर

भारत अपनी कच्चे तेल की जरूरत का 85-90% आयात करता है, जिसमें पश्चिम एशिया (खासकर पर्सियन गल्फ) से 60% से अधिक आता है। SBI रिसर्च और अन्य रिपोर्टों के अनुसार, $10 प्रति बैरल तेल की कीमत बढ़ने से भारत का चालू खाता घाटा (CAD) 0.3-0.36% बढ़ जाता है, मुद्रास्फीति 0.2-0.35% ऊपर जाती है और GDP वृद्धि पर 0.3-0.6% का नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। मार्च 2026 में तेल कीमतों में 23-26% उछाल आया, जिससे वार्षिक आयात बिल $15-17 अरब डॉलर अतिरिक्त बढ़ सकता है।
रेमिटेंस भारत की अर्थव्यवस्था का दूसरा स्तंभ है। FY25 में कुल रेमिटेंस $135-138 अरब डॉलर पहुंचा, जिसमें 38% ($50-51 अरब) गल्फ देशों से आता है। लगभग 1 करोड़ भारतीय वहां काम करते हैं। संकट लंबा खिंचा तो नौकरियां प्रभावित होंगी, रिवर्स माइग्रेशन बढ़ेगा और ग्रामीण उपभोग घटेगा। ASK वेल्थ एडवाइजर्स की रिपोर्ट इसे “ट्रिपल थ्रेट” कहती है – ऊर्जा महंगाई, रेमिटेंस गिरावट और घरेलू श्रम बाजार पर दबाव।

आम लोगों पर सीधा असर

पेट्रोल-डीज़ल और एलपीजी की क़िल्लत और कीमतें बढ़ रही हैं। देशभर से एलपीजी सिलेंडर के लिए लंबी-लंबी लाइनों की तस्वीर सामने आ रही हैं। गुजरात के कई इलाक़ों के पेट्रोल पंप से बर्तनों में पेट्रोल लेते हुए लोगों का वीडियो वायरल हुआ है। एमएसएमई क्षेत्र पर लागत बढ़ने से छोटे कारोबार प्रभावित हो रहे हैं। परिवहन, हवाई यात्रा और पर्यटन ठप हो रहे हैं। फिच की BMI रिपोर्ट के मुताबिक, निर्यात और निवेश पर भी दबाव पड़ेगा। विदेशी मुद्रा भंडार मजबूत है (11-12 महीने के आयात के बराबर और 5 साल का तेल बिल चुकाने लायक), लेकिन लंबे संकट में मुद्रास्फीति और राजकोषीय घाटा बढ़ेगा। 

पेट्रोल-डीज़ल और एलपीजी की क़िल्लत से आम आदमी की जेब पर बोझ बढ़ेगा– महंगाई, बेरोजगारी का खतरा और रेमिटेंस पर निर्भर परिवारों की आय घटेगी।

विपक्ष की संसद में बहस की मांग

कांग्रेस समेत विपक्षी दल लगातार इस मुद्दे पर संसद के दोनों सदनों में बहस की मांग कर रहे हैं। विपक्ष के नेता राहुल गांधी, प्रियंका गांधी वाड्रा, मल्लिकार्जुन खड़गे, जयराम रमेश ने इसे लेकर सरकार पर दबाव बनाया है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पीएम मोदी ने कुछ नया नहीं कहा। संसद में सभी पक्ष अपनी बात रखें, इसलिए नोटिस दिया गया है।” राहुल गांधी ने आरोप लगाया कि सरकार बहस से बच रही है क्योंकि इससे “पीएम की पोज़ीशन” उजागर हो जाएगी और “ब्लैकमेल” का मुद्दा सामने आएगा। उन्होंने US व्यापार सौदे और विदेश नीति की आलोचना की। जयराम रमेश ने एक्स पर लिखा, “मोदी सरकार डरी हुई है, विदेश नीति पूरी तरह उजागर हो चुकी है।”
विपक्ष का तर्क है कि केवल बयान और सर्वदलीय बैठक पर्याप्त नहीं। उन्होंने कहा कि 2003 में इराक युद्ध पर लोकसभा में पूर्ण बहस हुई थी और प्रस्ताव पास हुआ था। अब सरकार “मोनोलॉग” दे रही है, जबकि आर्थिक प्रभाव (तेल, रेमिटेंस, मुद्रास्फीति) हर भारतीय को छू रहा है। विपक्ष ने सदन में हंगामा किया, वॉकआउट किया। सर्वदलीय बैठक को “देरी से बुलाई गई और असंतोषजनक” बताया। वे दावा करते हैं कि बहस से सरकार की तैयारी, विदेश नीति की कमियां और आम लोगों पर बोझ उजागर होगा।
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क्या कह रही है मोदी सरकार?

मोदी सरकार बहस से “बचने” की बजाय “कार्रवाई” पर जोर दे रही है। पीएम मोदी ने लोकसभा और राज्यसभा में स्पष्ट कहा, “पश्चिम एशिया की स्थिति चिंताजनक है। यह संकट तीन सप्ताह से अधिक चला है। दुनिया की अर्थव्यवस्था हिल गई है, लेकिन भारत की मज़बूत नींव है।” उन्होंने होर्मुज स्ट्रेट पर किसी भी रुकावट को “नामंजूर” बताया और शांति की अपील की। सरकार की तरफ से दावा किया जा रहा है कि वह संकट की इस घड़ी में बहुत ज़िम्मेदारी से काम कर रही है।

सरकार के ठोस कदम

  • नागरिकों की सुरक्षा और निकासी: लगभग एक करोड़ भारतीय खाड़ी देशों में हैं। युद्ध शुरू होने के बाद 3,75,000 से अधिक भारतीय सुरक्षित स्वदेश लौटे हैं।‌ इनमें 700 से ज़्यादा मेडिकल छात्रों समेत ईरान से करीब 1,000 लोग शामिल हैं। भारतीय मिशनों में 24 घंटे हेल्पलाइन, नियंत्रण कक्ष और सहायता दी गई।
  • ऊर्जा सुरक्षा: गैर-होर्मुज स्रोतों से आयात 70% तक बढ़ाया गया (पहले 55%)। रूस से तेल आयात बढ़ा। बाजार मांग के 70 दिनों का रणनीतिक भंडार 5.3 मिलियन मीट्रिक टन से ज़्यादा OMC स्टॉक उपलब्ध है।
  • संरचनात्मक तैयारी: पीएम मोदी ने 7 एंपावर्ड ग्रुप्स गठित किए। निर्यातकों के लिए बहुमंत्रालयी सहायता डेस्क और 24x7 पेट्रोलियम कंट्रोल रूम बनाया।
  • कूटनीति: पीएम ने क्षेत्रीय नेताओं से दो बार बात की। संसद से “एकजुट आवाज़” का संदेश भेजने पर ज़ोर दिया।
  • सर्वदलीय बैठक: 25 मार्च को बुलाई गई, जिसमें सभी प्रमुख दलों को ब्रिफिंग दी गई।
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सरकार का तर्क है कि विदेश नीति पर एकमत रहना ज़रूरी है। पीएम ने कहा, “संकट के समय संवेदनशीलता से काम कर रहे हैं।” वे दावा करते हैं कि अर्थव्यवस्था मज़बूत है और कोई तत्काल संकट नहीं।

बहस से क्यों डरा रही मोदी सरकार?

विपक्ष को सरकार का मोनोलॉग पसंद नहीं आ रहा। वह संसद के दोनों सदनों में पश्चिम एशिया संकट के हर पहलू पर विस्तार से चर्चा चाहता है। मोदी सरकार का डर यही है कि अगर संसद में चर्चा हुई तो कई सवालों के जवाब देना उसे भारी पड़ जाएगा। ‌विपक्ष पश्चिम एशिया (ईरान-अमेरिका-इजराइल) संकट पर संसद में मोदी सरकार को मुख्यतः इन मुद्दों पर घेरेगा-
  • विदेश नीति की निष्पक्षता: सरकार अमेरिका-इसराइल के हमलों की निंदा क्यों नहीं कर रही? ईरान के सुप्रीम लीडर की हत्या पर क्यों चुप रहे पीएम मोदी? क्यों अफसोस तक नहीं जताया? पुराने मित्र के साथ संतुलन बिगड़ा, BRICS समिट में चुप्पी क्यों? रणनीतिक स्वायत्तता खत्म हो गई।
  • आर्थिक प्रभाव: होर्मुज स्ट्रेट ब्लॉकेज से तेल-गैस-एलपीजी सप्लाई बाधित। महंगाई बढ़ेगी, उर्वरक-खेती पर असर, सिलेंडर संकट। अर्थव्यवस्था पर बोझ क्या?
  • नागरिक सुरक्षा: खाड़ी में 90 लाख+ भारतीयों की वापसी, जहाज़ों की सुरक्षा। सरकार ने कितने निकाले और आगे का प्लान क्या? क़रीब 4 लाख करोड़ की विदेशी मुद्रा देने वाले इन लोगों के बारे में सरकार ने युद्ध शुरू होने से पहले क्यों नहीं सोचा, एडवांस प्लानिंग क्यों नहीं की?
  • कूटनीतिक असफलता: पीएम के इसराइल दौरा की टाइमिंग ग़लत? पाकिस्तान की भूमिका पर चुप्पी। शांति अपील पर्याप्त नहीं, सक्रिय पहल क्यों नहीं?
ये तमाम ऐसे सवाल हैं जिन पर संसद में जवाब देने में मोदी सरकार के पसीने छूट जाएंगे। विपक्ष इसे 'डर' कह रहा है, जबकि सरकार बचने के लिए 'एकजुटता और कार्रवाई' का हवाला दे रही है। सच्चाई यह है कि लोकतंत्र में बहस से नीतियां मज़बूत होती हैं। सरकार को विपक्ष की चिंताओं को संबोधित करते हुए पूर्ण चर्चा की अनुमति देनी चाहिए। साथ ही, संकट का समाधान कूटनीति और विविधीकरण से ही निकलेगा। भारत की मज़बूत अर्थव्यवस्था (विदेशी मुद्रा भंडार) इस चुनौती का सामना कर सकती है, लेकिन आम लोगों की सुरक्षा और पारदर्शिता सर्वोपरि है। संकट लंबा खिंचा तो न केवल अर्थव्यवस्था, बल्कि राजनीतिक विश्वसनीयता भी दांव पर लगेगी।