सवाल यह है कि भाजपा को 2019 में मिली 303 सीटों में शामिल महाराष्ट्र, बिहार और कर्नाटक से प्राप्त 65 सीटों का सहारा क्या क़ायम रहेगा ? भाजपा ने पिछला चुनाव उद्धव की शिव सेना और नीतीश के जद(यू) के साथ लड़ा था। वर्तमान में दोनों साथ नहीं हैं। कर्नाटक में अब सरकार कांग्रेस की है। महुआ मोइत्रा के ख़िलाफ़ कार्रवाई के बाद भाजपा पश्चिम बंगाल में 2019 की अपनी 18 सीटों में से कितनी बचा पाएगी ? उसकी तेलंगाना की चार ,हिमाचल की चार और झारखंड की ग्यारह सीटों का भविष्य क्या होगा जहां अब विपक्ष की सरकारें हैं ? जिन तीन राज्यों (मध्यप्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़) में भाजपा की हाल में जीत हुई है वहाँ की 65 में से 61 सीटें तो उसके पास पहले से है। विधानसभा परिणामों से आहत कांग्रेस क्या उनमें कोई सेंध नहीं लगा पाएगी ?
प्रथम दृष्टया तो यही समझ में आता है कि भाजपा राज्यों के स्थापित क्षत्रपों ने पार्टी आलाकमान की सत्ता को चुनौती देना प्रारंभ कर दिया है। 11 दिसंबर को मध्यप्रदेश के नए मुख्यमंत्री के नाम की नाटकीय अन्दाज़ में घोषणा के पहले और बाद में भी शिवराज सिंह भोपाल में और उसके अगले दिन जयपुर में वसुंधरा राजे जिस अन्दाज़ में पेश आईं उसमें आने वाले दिनों की टोह ली जा सकती है !
वे तमाम आलोचक जो इंडिया गठबंधन में मतभेदों की दरारें तलाश रहे हैं इस सचाई की तह में भी जा सकते हैं कि क्या प्रधानमंत्री का जादुई तिलिस्म अब कमज़ोर पड़ने लगा है ? क्या मतदाताओं ने उनके कहे को नज़रअंदाज़ करना प्रारंभ कर दिया है ? इसका संकेत प्रधानमंत्री द्वारा बाड़मेर के बायतु में दिए गए चुनावी भाषण से प्राप्त परिणामों में तलाशा जा सकता है !