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भारत विभाजन-5: नेहरू के बयान ने जिन्ना से बनती हुई बात बिगाड़ी

1937 के प्रांतीय और केंद्रीय विधानसभा के चुनाव परिणामों के बाद मुसलिम लीग और जिन्ना को समझ में आ गया था कि पृथक निर्वाचक मंडलों के तहत मुसलमानों के लिए अलग सीटों के बावजूद वे किसी राज्य में सत्ता में नहीं आ सकते। उनका मानना था कि जब तक सत्ता में हिस्सेदारी न हो, तब तक मुसलमानों को बराबरी और इंसाफ़ नहीं मिल सकता। भारत विभाजन पर इस विशेष शृंखला की पाँचवी कड़ी में पढ़िए कि किस तरह इसके बाद मुसलमानों के लिए अलग और स्वतंत्र राज्य की माँग ने और ज़ोर पकड़ लिया। 
नीरेंद्र नागर

1937 के प्रांतीय और केंद्रीय विधानसभा के चुनावों में यह साबित हो गया कि भारत के मुसलमानों का प्रतिनिधित्व न मुसलिम लीग करती है और न ही कांग्रेस। मुसलिम लीग जो मुसलमानों का एकल प्रतिनिधि होने का दावा करती थी, उसे पूरे भारत में मुसलमानों के लिए आरक्षित सीटों में भी केवल 25% पर जीत हासिल हुई जबकि कांग्रेस को 6% सीटों पर विजय मिली। बाक़ी सारी सीटें क्षेत्रीय मुसलिम पार्टियों को मिलीं। मुसलिम लीग किसी भी राज्य में सरकार बनाने में कामयाब नहीं हुई। संयुक्त प्रांत में जहाँ उसे 26 सीटें मिली थीं, वहाँ उसने कांग्रेस के साथ मिलीजुली सरकार बनाने का प्रस्ताव रखा लेकिन कांग्रेस ने उसका प्रस्ताव ठुकरा दिया। कई विद्वान ऐसा मानते हैं कि कांग्रेस की इस बेरुखी से जिन्ना और मुसलिम लीग ने आगे जाकर कड़े तेवर अपना लिए।

इन परिणामों के बाद मुसलिम लीग और जिन्ना को समझ में आया कि पृथक निर्वाचक मंडलों के तहत मुसलमानों के लिए अलग सीटों के बावजूद वे किसी राज्य में सत्ता में नहीं आ सकते। उनका मानना था कि जब तक सत्ता में हिस्सेदारी न हो, तब तक मुसलमानों को बराबरी और इंसाफ़ नहीं मिल सकता। इसी के बाद मुसलमानों के लिए अलग और स्वतंत्र राज्य की माँग ने और ज़ोर पकड़ लिया। 
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मार्च 1940 में लाहौर में मुसलिम लीग का एक महाधिवेशन हुआ जिसमें मुसलमानों के लिए अलग राज्य की माँग की गई। इसे लाहौर प्रस्ताव कहते हैं। इसे ख़ुद जिन्ना ने तैयार किया था और सभा में बंगाल के प्रधानमंत्री फज़लुल हक़ ने पेश किया। प्रस्ताव में साफ़-साफ़ कहा गया था कि  - 

अखिल भारतीय मुसलिम लीग के इस सेशन का यह सुविचारित मत है कि इस देश में कोई भी संवैधानिक योजना तब तक व्यवहार में नहीं लाई जा सकती या मुसलमानों को स्वीकार्य नहीं हो सकती जब तक कि वह निम्नलिखित मौलिक सिद्धांत पर आधारित न हो, यथा भौगोलिक रूप से जुड़े हुए इलाक़ों को मिलाकर नए क्षेत्र बनाए जाएँ, ज़रूरी हो तो उनमें सीमाई बदलाव भी किए जाएँ ताकि जिन इलाक़ों में मुसलमान संख्या की दृष्टि से बहुमत में हैं जैसे भारत के पश्चिमोत्तर एवं पूर्वी अंचल, उनको मिलाकर स्वतंत्र राज्यों का रूप दिया जाए जहाँ उनकी घटक इकाइयाँ स्वायत्त और संप्रभु हों।

लाहौर प्रस्ताव के आशय को लेकर तब भी बहुत भ्रम था और आज भी है। इस प्रस्ताव में लिखे इस वाक्यांश से - स्वतंत्र राज्यों का रूप दिया जाए - इससे यह नहीं पता चलता था कि माँग एक नए स्वतंत्र राज्य की थी या बहुत सारे स्वतंत्र राज्यों की थी। ‘घटक इकाइयाँ स्वायत्त और संप्रभु हों’ इस वाक्यांश से तो यही लगता है कि नए स्वतंत्र राज्य जैसे पंजाब और सिंध एक-दूसरे से अलग और स्वायत्त होने थे। प्रस्ताव की इस अस्पष्टता का आगे चलकर लीग को बहुत नुक़सान उठाना पड़ा। 

मुसलिम-बहुल बंगाल व पंजाब का विभाजन करते समय कांग्रेस ने लाहौर प्रस्ताव को ही बुनियाद बनाया। बहरहाल, एक बात स्पष्ट थी कि यह लाहौर प्रस्ताव मुसलमानों के लिए अलग राज्य या राज्यों की वकालत कर रहा था।

लाहौर घोषणा से पहले दुनिया में एक और बड़ी घटना हो चुकी थी। वह थी द्वितीय विश्व युद्ध। 3 सितंबर 1939 को ब्रिटेन के प्रधानमंत्री ने जर्मनी के साथ युद्ध की घोषणा कर दी। उसके अगले दिन वाइसरॉय लिनलिथगो ने किसी भी भारतीय नेता से सलाह किए बिना एलान कर दिया कि इस युद्ध में भारत भी ब्रिटेन के साथ शामिल हो गया है। साथ ही स्वराज की सारी बातें युद्धकाल तक के लिए टाल दी गईं। 

कांग्रेस ने इसका विरोध किया और आज़ाद भारत के लिए जल्द-से-जल्द संविधान सभा गठित करने की माँग की। जब यह माँग नहीं मानी गई तो उसकी 8 प्रांतीय सरकारों ने विरोधस्वरूप इस्तीफ़े दे दिए। जिन्ना और लीग का इस मामले में रवैया न सहयोग का था, न विरोध का। बदले में अंग्रेजी शासन ने लीग को मुसलमानों का एकल प्रतिनिधि मान लिया।

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इसी के कुछ समय बाद आया लाहौर प्रस्ताव जिसकी हमने ऊपर बात की। गाँधीजी ने लाहौर प्रस्ताव को पेचीदा बताया लेकिन साथ में यह भी कहा कि भारत के दूसरे लोगों की तरह मुसलमानों को भी आत्मनिर्णय का अधिकार है। बाक़ी कांग्रेसी नेताओं ने इस प्रस्ताव का तीखा विरोध किया। उसी साल ब्रिटेन में चर्चिल के नेतृत्व में नई सरकार आई। 

नई सरकार की तरफ़ से वाइसरॉय ने भारतीय नेताओं से वादा किया कि यदि वे युद्ध में ब्रिटेन का समर्थन करें तो युद्ध समाप्त होने के बाद भारत का भविष्य तय करने के लिए एक प्रातिनिधिक सभा बनाई जाएगी और भारत के भविष्य का कोई भी फ़ैसला किसी बड़े जनसमूह की आपत्तियों को नज़रअंदाज़ करके नहीं किया जाएगा। कांग्रेस ने तो यह ऑफ़र ठुकरा ही दिया, मुसलिम लीग ने भी इसके प्रति हामी नहीं भरी। कारण यह था कि तब तक नए राज्य/राज्यों की सीमाओं के बारे में कुछ पक्का नहीं था, न ही ब्रिटिश राज या बाक़ी के उपमहाद्वीप के साथ नए राज्य/राज्यों के रिश्तों के बारे में ही कोई स्पष्टता थी। इसलिए वे कोई वचन लेने और देने को तैयार नहीं थे।

दिसंबर 1941 में जापान ने पर्ल बंदरगाह पर हमला कर दिया और इसके बाद अमेरिका भी युद्ध में टूट पड़ा। फ़रवरी 1942 में वह सिंगापुर पर कब्ज़ा कर चुका था और रंगून से अंग्रेज़ी फ़ौजों को पीछे हटना पड़ा था। ऐसे में भारत को जापानी हमले से बचाने के लिए ब्रिटिश हुकूमत को भारतीयों के पूरे समर्थन की ज़रूरत थी। इसी मक़सद से मार्च में लेबर पार्टी के नेता स्टैफ़र्ड क्रिप्स के नेतृत्व में एक दल भारत आया ताकि भारतीय नेताओं को मनाया जा सके। क्रिप्स ने कांग्रेस और लीग दोनों के सामने जो प्रस्ताव रखा था, उसमें युद्ध के बाद भारत को पूर्ण औपनिवेशिक स्वराज देने के वादे के साथ-साथ यह भी कहा गया था कि ऐसा करते वक्त कुछ प्रांतों को यह अधिकार होगा कि वे प्रस्तावित भारतीय संघ से कुछ समय के लिए या हमेशा के लिए अलग रहें या ख़ुद अपना एक महासंघ बनाएँ। लीग ने इसे इस रूप में देखा कि अंग्रेज़ी हुकूमत ने पहली बार अलग पाकिस्तान की माँग को सिद्धांत रूप में स्वीकार कर लिया है।कांग्रेस ने इसका विरोध किया और अगस्त 1942 में भारत छोड़ो आंदोलन शुरू कर दिया। इसकी प्रतिक्रिया में उसके सारे बड़े नेता जेल में डाल दिए गए और युद्ध ख़त्म होने तक वे जेल में ही रहे। जिन्ना इस बीच अपनी अलग राज्य की माँग के समर्थन में प्रचार करते रहे और जिन इलाक़ों में लीग का असर कम था, वहाँ भी अपना प्रभाव बढ़ाते रहे।
दूसरा विश्व युद्ध तो 1945 में समाप्त हुआ लेकिन स्वास्थ्य कारणों से गाँधीजी को 1944 में ही रिहा कर दिया गया। जर्मनी और जापान एक-के-बाद-एक मात खाए जा रहे थे और लग रहा था कि युद्ध जल्दी ही समाप्त हो जाएगा और उसके बाद स्वराज भी दूर नहीं रहेगा। लेकिन स्वराज मिलेगा तब भारत का रूप क्या रहेगा, इसपर शंका बनी हुई थी। 
क्रिप्स मिशन के प्रस्तावों में प्रांतों को भारतीय संघ से अलग होने की अनुमति तो थी ही जो कांग्रेस को बिल्कुल रास नहीं आ रही थी। सो बीच का रास्ता निकालने के लिए गाँधीजी ने उसी साल सितंबर में जिन्ना से भेंट की। उनकी बातचीत दो हफ़्ते चली लेकिन कोई सकारात्मक परिणाम नहीं निकला। जिन्ना चाहते थे कि ब्रिटिश राज समाप्त होने से पहले ही पाकिस्तान की माँग मान ली जाए और साथ-साथ उसका गठन कर दिया जाए।
गाँधीजी का मत था कि एक बार आज़ादी मिल जाए, उसके बाद मुसलिम बहुसंख्यक इलाक़ों में जनमतसंग्रह करा लिया जाएगा कि वहाँ के लोग क्या चाहते है। गाँधीजी और जिन्ना में केंद्र सरकार के अधिकारों पर भी असहमति थी।

अगले साल के शुरू में कांग्रेस के भुलाभाई देसाई और लीग के लियाक़त अली ख़ाँ में इस बात की सहमति हुई कि युद्ध समाप्त होने के बाद वाइसरॉय की कार्यकारी परिषद के सदस्यों के साथ मिलकर जो अंतरिम सरकार बनेगी, उसमें कांग्रेस और लीग के प्रतिनिधि बराबर-बराबर संख्या में होंगे। लेकिन जब जून 1945 में कांग्रेस के बाक़ी नेता रिहा हुए तो उन्होंने इस सहमति को ठुकरा दिया और कहा कि देसाई को इस तरह का वादा करने का कोई अधिकार प्राप्त नहीं था।

अंतरिम सरकार के बारे में बातचीत 

कांग्रेस के नेताओं की रिहाई के साथ ही अंतरिम सरकार के बारे में बातचीत शुरू हो गई। लॉर्ड वेवल देश के नए वाइसरॉय बने और उन्होंने शिमला में सभी समुदायों के नेताओं की एक बैठक बुलाई। लेकिन लीग की यह माँग नहीं मानी गई कि अंतरिम सरकार में मुसलमानों का प्रतिनिधित्व करने का अधिकार केवल उसी को है। बाक़ी समुदायों ने भी अपने-अपने प्रतिनिधियों की लिस्ट सौंपी। लेकिन यह वार्ता बीच में ही रद्द कर दी गई क्योंकि ब्रिटेन में चुनाव होने वाले थे और यह तय किया गया कि अगला क़दम अगली सरकार के आने के बाद ही उठाया जाए।

चुनावों में लेबर पार्टी की जीत हुई जो भारत की आज़ादी के प्रति सहानुभूतिशील थी। उसके प्रधानमंत्री क्लेमंट ऐटली 1928 में भारत आए साइमन कमिशन के सदस्य रह चुके थे। चूँकि युद्ध के कारण 1937 के बाद प्रांतीय और केंद्रीय विधानसभाओं के चुनाव नहीं हुए थे, इसलिए पहले क़दम के तौर पर यही तय हुआ कि सर्वप्रथम सभी प्रांतों और केंद्र के लिए चुनाव कराए जाएँ। ब्रिटिश हुकूमत ने घोषणा की कि इन चुनावों के ठीक बाद संविधान बनाने की प्रक्रिया शुरू कर दी जाएगी।

मुसलिम लीग और जिन्ना के लिए ये चुनाव बहुत महत्वपूर्ण थे। 1937 में उनकी पार्टी की बुरी तरह से पराजय हुई थी और पार्टी को मुसलमानों के केवल एक-चौथाई वोट मिले थे। यदि इन चुनावों में भी उसकी हालत वैसी-की-वैसी रहती तो वह पाकिस्तान की अपनी माँग पर ज़ोर नहीं डाल सकती थी।

मुसलिम लीग ने घोषणा कर दी कि वह ‘पाकिस्तान के एकमात्र मुद्दे’ पर चुनाव लड़ेगी। अहमदाबाद में एक रैली में जिन्ना ने कहा, ‘पाकिस्तान हमारे लिए ज़िंदगी और मौत का सवाल है।’

दिसंबर 1945 में संविधान सभा के लिए जो चुनाव हुए, उसमें हर मुसलिम सीट पर लीग को जीत हासिल हुई। अगले ही महीने प्रांतीय विधानसभा के चुनावों में भी लीग के खाते में तीन-चौथाई मुसलिम वोट आए।

शुरू हुई संविधान बनाने की प्रक्रिया

चुनावों के बाद जैसी कि ब्रिटिश हुकूमत ने घोषणा की थी, संविधान बनाने की प्रक्रिया शुरू कर दी गई। इस मक़सद से मार्च 1946 में एक तीन-सदस्यीय कैबिनेट मिशन भारत आया जिसमें क्रिप्स मिशन वाले जनाब क्रिप्स भी शामिल थे। इस दल ने सभी प्रमुख भारतीय नेताओं से बातचीत शुरू कर दी। मिशन की इच्छा थी कि भारतीय संघ एक रहे और उसके प्रांतों को स्वायत्त रहने का अधिकार हो। आपको याद होगा कि 1942 में क्रिप्स मिशन ने प्रस्ताव दिया था कि भारत के भावी स्वरूप में प्रांतों को साथ या अलग रहने का अधिकार होगा।

भारत विभाजन पर विशेष
कैबिनेट मिशन की प्रस्तावित योजना इस प्रकार थी - देश में प्रांतों और केंद्र के बीच अधिकारों का बँटवारा होगा। प्रांतों को अकेले या समूह के रूप में रहने का अधिकार होगा। इस तरह देश में धर्म के आधार पर तीन समूह बन सकते हैं - पूर्व और पश्चिम में मुसलिम-बहुल दो समूह और मध्य और दक्षिण में हिंदू-बहुल एक समूह। इस हिसाब से संयुक्त प्रांत, मध्य प्रांत, बॉम्बे, बिहार और मद्रास को मिलाकर पहला समूह बनता जो हिंदू-बहुल होता जबकि सिंध, पंजाब, उत्तर-पश्चिम सीमा प्रांत और बलूचिस्तान को मिलाकर दूसरा समूह बनता और बंगाल और असम को मिलाकर तीसरा समूह। दूसरा और तीसरा समूह मुसलिम-बहुल होते।
कैबिनेट मिशन की योजना के तहत रक्षा, विदेश, संचार आदि के विषय केंद्र के हाथ में रहने थे। इस योजना पर अमल होने तक एक अंतरिम सरकार होनी थी जिसमें कांग्रेस और मुसलिम लीग दोनों के प्रतिनिधि होते।
जिन्ना ने इस योजना को स्वीकार कर लिया और कह दिया कि कांग्रेस यदि शामिल न भी हो तो हम अंतरिम सरकार में शामिल होने को तैयार हैं। उधर, कांग्रेस ने भी इसे स्वीकार कर लिया। दोनों को लग रहा था कि इस योजना के तहत उनकी जीत हुई है। जिन्ना को लग रहा था कि इस योजना से पाकिस्तान के हिस्से में 6 बड़े प्रांत आ जाएँगे और पंजाब व बंगाल जिसमें बड़ी संख्या में हिंदू और सिख रहते हैं, उनका बँटवारा भी नहीं करना होगा। इसके अलावा पाकिस्तानी भूभाग में बड़ी संख्या में अल्पसंख्यक हिंदुओं और सिखों के रहने से बाक़ी के हिस्से में जिसे हिंदुस्तान कहा जाना था, अल्पसंख्यक मुसलमानों की सुरक्षा की गारंटी रहेगी।
उधर, कांग्रेस इन प्रस्तावों को अपने विचारों के अनुकूल मान रही थी क्योंकि उसके अनुसार चूँकि प्रांतों को किसी समूह में रहने या न रहने की आज़ादी थी, सो बहुत स्वाभाविक था कि उत्तर-पश्चिम सीमा प्रांत और असम जहाँ कांग्रेस की सरकारें थीं, वे पाकिस्तान के बजाय हिंदुस्तान वाले समूह से जुड़ना चाहेंगे। जिन्ना कांग्रेस की इस व्याख्या से सहमत नहीं थे। उनके अनुसार कैबिनेट मिशन योजना के तहत पश्चिम के चार और पूर्व के दो राज्यों का दो मुसलिम-बहुल समूह का हिस्सा बनना बाध्यताकारी था।
इस बीच जवाहरलाल नेहरू के एक और बयान ने आग में घी डालने का काम किया। 10 जुलाई 1946 को नेहरू ने मुंबई में एक प्रेस कॉन्फ़्रेंस में कहा कि कांग्रेस ने संविधान सभा में शामिल होने का निर्णय तो कर लिया है लेकिन यदि उसे ज़रूरी लगा तो वह कैबिनेट मिशन योजना में फेरबदल भी कर सकती है। 

जिन्ना ने दी धमकी

नेहरू के इस बयान ने कैबिनेट मिशन की सारी योजना को ध्वस्त कर दिया और संयुक्त भारत की आख़िरी उम्मीद पर पानी फेर दिया। इससे जिन्ना का बौखलाना स्वाभाविक था। नेहरू के बयान की प्रतिक्रिया में उन्होंने भी एक प्रेस कॉन्फ़्रेंस बुलाई और कहा कि यदि मुसलमानों को पाकिस्तान नहीं दिया गया तो मुसलिम लीग डायरेक्ट ऐक्शन (सीधी कार्रवाई) की मुहिम छेड़ेगी। जिन्ना ने पूछने पर भी यह नहीं बताया कि उनका डायरेक्ट ऐक्शन या सीधी कार्रवाई से क्या तात्पर्य है लेकिन उनकी बातों से लग रहा था कि कुछ भयंकर होने वाला है। उन्होंने इसके लिए 16 अगस्त का दिन तय किया और कहा, ‘हम युद्ध नहीं चाहते। लेकिन अगर आप युद्ध चाहते हैं तो हम बिना किसी हिचक के इस दावत को क़बूल करते हैं। भारत या तो विभाजित होगा या फिर बर्बाद होगा।’
हमें नहीं मालूम कि जिन्ना ने पाकिस्तान न बनाए जाने की स्थिति में ‘युद्ध’ और ‘बर्बाद भारत’ (Destroyed India) की भविष्यवाणी की थी तो उनका क्या आशय था। लेकिन 16 अगस्त को कलकत्ता में जो हुआ, उसने सारे देश को हिलाकर रख दिया।

उन दंगों का विस्तृत विवरण देकर हम इतिहास के घावों को कुरेदना नहीं चाहते। लेकिन उस त्रासदी का एक अंदाज़ा देने के लिए बता रहे हैं कि तीन दिन तक चले दंगों में 4 हज़ार बेगुनाह हिंदू और मुसलमान मारे गए। एक लाख से ज़्यादा लोग बेघर हो गए। इन दंगों की प्रतिक्रिया में असम, बिहार, संयुक्त प्रांत, पंजाब और उत्तर-पश्चिम सीमा प्रांत में भी धार्मिक संघर्षों की वारदातें हुईं। 

यह कहना ज़्यादती होगी कि जिन्ना के ‘डायरेक्ट ऐक्शन’ का मक़सद देशभर में हिंसा का माहौल पैदा करना और सांप्रदायिक दंगे करवाना था क्योंकि यदि ऐसा होता तो ये दंगे बड़े पैमाने तक केवल कलकत्ता तक सीमित नहीं रहते। कलकत्ता में दंगे भड़कने का कारण शायद यह था कि कैबिनेट मिशन की योजना के तहत सारे बंगाल के पाकिस्तान के पाले में जाने की स्थिति बनती दिख रही थी। इस कारण वहाँ के हिंदू और उनके नेता जो पाकिस्तान के साथ नहीं जाना चाहते थे, चिंतित थे। दूसरी तरफ़ मुसलमान अपने सपनों का पाकिस्तान न बनते देख उद्वेलित हो रहे थे। यदि भारत का विभाजन होने पर पंजाब और बंगाल के भी बँटवारे के बारे में पहले से ही स्पष्टता होती तो शायद दोनों प्रांतों में इतना तनाव और ख़ूनख़राबा नहीं होता।

कलकत्ता और बाक़ी इलाक़ों में हुई हिंसा ने यह साबित कर दिया था कि अब भारत को एक रखना नामुमकिन था। बँटवारा तो होगा लेकिन उस बँटवारे में कौन-कौन से इलाक़े हिंदुस्तान में रहेंगे और कौन से पाकिस्तान में, बस यही तय होना बाक़ी था। यह काम उतना आसान भी नहीं था।

अगली कड़ी में हम जानेंगे कि जब पाकिस्तान बना तो उसके हिस्से में कौन-कौन से प्रांत आए और आख़िर क्या कारण था कि जिन्ना पाकिस्तान बनने के बाद भी ख़ुश नहीं थे। क्यों उन्होंने कहा कि हमें  'दीमक खाया हुआ पाकिस्तान' (moth-eaten Pakistan) दिया गया है?

नीरेंद्र नागर
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