loader

एक थी ‘घोषित इमरजेंसी’, एक है ‘अघोषित आपातकाल’!

जून 1975 में जब आपातकाल लगाया गया तब राहुल केवल पाँच साल के थे। उनके पिता राजीव गांधी विदेश से प्रशिक्षण लेकर लौटने के बाद उस एयर इंडिया का विमान चला रहे थे जिसे बेचने के लिए इस समय ख़रीदार तलाशे जा रहे हैं। राजीव की आज के जमाने के नेता-पुत्रों की तरह न तो राजनीति करने में कोई रुचि थी और न ही क्रिकेट की किसी सल्तनत पर क़ब्ज़ा करने में।
श्रवण गर्ग

राहुल गांधी के लिए ज़रूरी कर दिया गया था कि देश की वर्तमान में हालत पर कोई भी नई टिप्पणी करने या पुरानी को दोहराने से पहले वे उस घोषित ‘इमरजेंसी’ को सार्वजनिक रूप से ज़लील करें जिसे इंदिरा गांधी ने कोई साढ़े चार दशक पूर्व देश पर थोपा था। राहुल गांधी ने सभी अपने-पराए विपक्षियों को भौचक्क करते हुए ऐसा करके दिखा भी दिया। 

राहुल बार-बार आरोप लगा रहे हैं कि देश इस समय ‘अघोषित आपातकाल’ से गुजर रहा है। राहुल ने बिना साँस रोके और पानी का घूँट पीए अर्थशास्त्री कौशिक बसु के साथ हुए इंटरव्यू में कह दिया कि उनकी दादी द्वारा 1975 में लगाई गई इमरजेंसी एक ग़लती थी। राहुल ने पाँच राज्यों में हो रहे चुनावों के ठीक पहले ऐसा कहकर अपने विरोधियों के लिए कुछ और नया सोचने का संकट पैदा कर दिया है।

कुख्यात ‘इमरजेंसी या आपातकाल' को लेकर राहुल की स्वीकारोक्ति बड़े साहस का काम है। ऐसा करके उन्होंने उच्च पदों पर बैठे लोगों के लिए बड़ी चुनौती खड़ी कर दी है। वह यूँ कि अब वे भी अपनी कम से कम किसी एक गलती को तो स्वीकार करके खेद व्यक्त करें। 

साहस का काम इसलिए कि जून 1975 में जब आपातकाल लगाया गया तब राहुल केवल पाँच साल के थे। उनके पिता राजीव गांधी विदेश से प्रशिक्षण लेकर लौटने के बाद उस एयर इंडिया का विमान चला रहे थे जिसे बेचने के लिए इस समय ख़रीदार तलाशे जा रहे हैं। राजीव की आज के जमाने के नेता-पुत्रों की तरह न तो राजनीति करने में कोई रुचि थी और न ही क्रिकेट की किसी सल्तनत पर क़ब्ज़ा करने में।

ख़ास ख़बरें

राहुल गांधी ने कौशिक बसु के साथ साक्षात्कार में और जो कुछ कहा है वह भी महत्वपूर्ण है।

राहुल के इस मंतव्य का कि वर्तमान का आपातकाल ‘अघोषित’ है, यह अर्थ भी निकाला जा सकता है कि ‘घोषित आपातकाल’ के समाप्त होने की तो अनिश्चितकाल तक प्रतीक्षा की जा सकती है, लेकिन ‘अघोषित’ कभी समाप्त ही नहीं होता।

एक प्रतीक्षा के बाद वह ‘इच्छामृत्यु’ को प्राप्त हो जाता है। ‘महाभारत’ सीरियल वाले भीष्म पितामह की छवि याद करें तो उन्हें मिले ‘इच्छामृत्यु’ के वरदान का स्मरण स्वत: ही हो जाएगा।

व्यवस्था-तंत्र पर संघ का क़ब्ज़ा

राहुल ने दूसरी बात यह कही कि कांग्रेस अगर बीजेपी को हरा दे तब भी उससे मुक्त नहीं हो पाएगी। वह इसलिए कि संघ की विचारधारा वाले लोगों का पूरे व्यवस्था-तंत्र पर क़ब्ज़ा हो चुका है। राहुल के मुताबिक़, कांग्रेस ने न तो कभी संस्थागत ढाँचे पर क़ब्ज़ा करने की कोशिश की और न ही उसके पास ऐसा कर पाने की क्षमता ही रही। 

राहुल के कथन की पुष्टि इस तरह के आरोपों से हो सकती है कि कांग्रेस की कतिपय भ्रष्ट सरकारों के समय बीजेपी से जुड़े लोगों के काम आसानी से हो जाते थे जो कि इस वक़्त उनकी अपनी ही हुकूमतों में नहीं हो पा रहे हैं।

राहुल का अभी यह स्वीकार करना बाक़ी है कि संघ समर्थकों ने अपनी शाखाएँ कांग्रेस संगठन के भीतर भी खोल ली हैं और उनके नेतृत्व को अब अंदर से भी चुनौती दी जा रही है।

स्थितियों में फर्क है

पैंतालीस साल पहले के आपातकाल और आज की राजनीतिक परिस्थितियों के बीच एक और बात को लेकर फ़र्क़ किए जाने की ज़रूरत है। वह यह कि इंदिरा गांधी ने स्वयं को सत्ता में बनाए रखने के लिए सम्पूर्ण राजनीतिक विपक्ष और जे. पी. समर्थकों को जेलों में डाल दिया था, पर आम नागरिक मोटे तौर पर बचे रहे। शायद यह कारण भी रहा हो कि जनता पार्टी सरकार का प्रयोग विफल होने के बाद जब 1980 में फिर से चुनाव हुए तो इंदिरा गांधी और भी बड़े बहुमत के साथ सत्ता में वापस आ गईं।

इस समय स्थिति उलट है। विपक्ष जेलों से बाहर है और निशाने पर सिविल सोसाइटी से जुड़े नागरिक और मीडिया के लोग हैं। अगर ऐसा नहीं होता तो ‘देशद्रोह’ अथवा ‘राष्ट्र के ख़िलाफ़ युद्ध ‘ जैसे आरोपों के तहत सबसे ज़्यादा मुक़दमे और गिरफ़्तारियाँ राजनीतिक कार्यकर्ताओं की होतीं। सरकार के पास यह जानकारी निश्चित रूप से होगी कि इस समय सबसे ज़्यादा नाराज़गी नागरिकों के बीच ही है।

rahul gandhi talks of emergency, questions BJP, RSS,  - Satya Hindi
इंदिरा गांधी, पूर्व प्रधानमंत्री

यदि संजय जीवित होते?

अगर अपनी माँ को कथित तौर पर ‘आपातकाल’ लगाने की सलाह देने वाले संजय गांधी की असमय मौत नहीं हुई होती तो सम्भव है राजीव गांधी को राजनीति में प्रवेश करना ही नहीं पड़ता। राहुल और प्रियंका भी कुछ और कामकाज कर रहे होते। तब देश का नक़्शा भी कुछ अलग ही होता।

आपातकाल के दौरान हुई दिल्ली के तुर्कमान गेट की घटना और देश भर में की गई ज़बरिया नसबंदी के प्रयोगों के मद्देनजर यह अनुमान भी लगाया जा सकता है कि संजय गांधी की उपस्थिति में भारत काफ़ी कुछ हिंदू राष्ट्र बन चुका होता।
राहुल गांधी को कठघरे में खड़ा करके जो सवाल आज पूछे जा रहे हैं और उन्हें जिनके जवाब देने पड़ रहे हैं, तब वही सवाल किसी और ‘युवा गांधी’ से किए जा रहे होते। कौशिक बसु अगर इस आशय का कोई सवाल राहुल गांधी से अपने इंटरव्यू में कर भी लेते तो निश्चित ही किसी तरह की स्वीकारोक्ति उन्हें प्राप्त नहीं होती और तब उनके साथ देश को भी निराश होना पड़ता।
सत्य हिन्दी ऐप डाउनलोड करें

'सत्य हिन्दी'
की ताक़त बनिए


गोदी मीडिया और विशाल कारपोरेट मीडिया के मुक़ाबले स्वतंत्र पत्रकारिता का साथ दीजिए और उसकी ताक़त बनिए। 'सत्य हिन्दी' की सदस्यता योजना में आपका आर्थिक योगदान ऐसे नाज़ुक समय में स्वतंत्र पत्रकारिता को बहुत मज़बूती देगा। याद रखिए, लोकतंत्र तभी बचेगा, जब सच बचेगा।

नीचे दी गयी विभिन्न सदस्यता योजनाओं में से अपना चुनाव कीजिए। सभी प्रकार की सदस्यता की अवधि एक वर्ष है। सदस्यता का चुनाव करने से पहले कृपया नीचे दिये गये सदस्यता योजना के विवरण और Membership Rules & NormsCancellation & Refund Policy को ध्यान से पढ़ें। आपका भुगतान प्राप्त होने की GST Invoice और सदस्यता-पत्र हम आपको ईमेल से ही भेजेंगे। कृपया अपना नाम व ईमेल सही तरीक़े से लिखें।
सत्य अनुयायी के रूप में आप पाएंगे:
  1. सदस्यता-पत्र
  2. विशेष न्यूज़लेटर: 'सत्य हिन्दी' की चुनिंदा विशेष कवरेज की जानकारी आपको पहले से मिल जायगी। आपकी ईमेल पर समय-समय पर आपको हमारा विशेष न्यूज़लेटर भेजा जायगा, जिसमें 'सत्य हिन्दी' की विशेष कवरेज की जानकारी आपको दी जायेगी, ताकि हमारी कोई ख़ास पेशकश आपसे छूट न जाय।
  3. 'सत्य हिन्दी' के 3 webinars में भाग लेने का मुफ़्त निमंत्रण। सदस्यता तिथि से 90 दिनों के भीतर आप अपनी पसन्द के किसी 3 webinar में भाग लेने के लिए प्राथमिकता से अपना स्थान आरक्षित करा सकेंगे। 'सत्य हिन्दी' सदस्यों को आवंटन के बाद रिक्त बच गये स्थानों के लिए सामान्य पंजीकरण खोला जायगा। *कृपया ध्यान रखें कि वेबिनार के स्थान सीमित हैं और पंजीकरण के बाद यदि किसी कारण से आप वेबिनार में भाग नहीं ले पाये, तो हम उसके एवज़ में आपको अतिरिक्त अवसर नहीं दे पायेंगे।
श्रवण गर्ग
सर्वाधिक पढ़ी गयी खबरें

अपनी राय बतायें

विचार से और खबरें

ताज़ा ख़बरें

सर्वाधिक पढ़ी गयी खबरें