राम चरित मानस की एक चौपाई को लेकर उठे विवाद पर स्वतंत्र पत्रकार ओम प्रकाश सिंह ने दार्शनिक, अवध विश्वविद्यालय के पूर्व शैक्षणिक सलाहकार, 'गांधी के राम' पुस्तक के लेखक डा अरुण प्रकाश से सच जानने के लिए बात की है। जानिए उनके विचारों को।
तब भी, जो लोग गोस्वामी तुलसीदास जी पर आक्षेप लगा रहे हैं और मानस की चौपाइयों पर आपत्ति जताकर तुलसीदास जी की निंदा कर रहे हैं, उन्हें यह ज्ञात होना चाहिए कि तुलसीदास आप्तपुरुष हैं और उन्होंने द्रष्टा की तरह साक्षी भाव से ग्रंथ की रचना की है। उन्होंने इसका संकेत करते हुए कहा है कि यह भगवान शिव ने अपने मन में रच रखा था और अवसर आने पर उन्होंने पार्वती जी से कहा। शिव की उस रचना को साक्षी होकर के तुलसीदास जी सुन रहे हैं और लिख रहे हैं।
श्रीरामचरितमानस पर उठ रही आपत्तियों के बीच सबसे हास्यास्पद पक्ष, कथित तौर पर गोस्वामी जी के व श्रीरामचरितमानस के समर्थकों की सफाई है। कोई यह कह कर बचाव कर रहा है कि उक्त चौपाई समुद्र की अभिव्यक्ति है। कोई चौपाई में प्रयुक्त शब्दों का रूपांतरण कर दे रहा है, तो कोई कथित तौर पर आपत्तिजनक शब्द के मनमाने अर्थ दे रहा है। जबकि, द्रष्टा की अभिव्यक्ति सहमति-असहमति से परे होती है। यह सब तर्क देने की आवश्यकता ही नहीं है। बचाव में मनमाने अर्थ व तर्क देने से भविष्य में नई भ्रांतियां उठेंगी।
जिस चौपाई पर आपत्ति की जा रही है उसमें ‘ढोल, गंवार, शुद्र, पशु, नारी को सकल 'ताड़ना' का अधिकारी कहा गया है। आपत्ति यहीं ताड़ना के अर्थ को लेकर है। मैं इसपर सीधे कुछ कहने के बजाय संकेत कर रहा हूं। एक दोहा है-, ‘चरण धरत चिंता करत, चितवत चारों ओर/ सुबरन को खोजत फिरत, कवि व्यभिचारी चोर।’ अब यहां चोर के लिए तो ठीक है कि वह प्रत्येक पग के साथ सजग होकर चारों ओर देखता है और फिर स्वर्ण की तलाश में आगे बढ़ता है। लेकिन क्या कवि व व्यभिचारी के लिए चरण और सुबरन के यही अर्थ लिए जा सकते हैं? बल्कि, कवि के चरण का अर्थ हुआ पद का हिस्सा। वह एक पद रखता है, फिर सोचता और सुबरन यानि अच्छे वर्णों को खोजता है। व्यभिचारी के संदर्भ में सुबरन का अर्थ अच्छा वर होता है।