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सोनभद्र के पीड़ितों को इंसाफ़ दिला सकेंगे योगी आदित्यनाथ?

उत्तर प्रदेश के भगवाधारी मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने बड़ी आसानी से सोनभद्र में हुई 10 हत्याओं का दोष कांग्रेस पर डाल दिया। मुख्यमंत्री ने कहा कि इस समस्या की जड़ बहुत पुरानी है और यह 1955 से चली आ रही है। परंतु उन्होंने इस बात को बड़ी सफाई से छुपा लिया कि उनकी 2 वर्ष से ज़्यादा पुरानी सरकार ने मूल मुद्दों का निदान निकालने का कोई प्रयास क्यों नहीं किया और उनके पुलिस-प्रशासन ने आदिवासियों की गुहार सुनने की ज़रूरत क्यों नहीं समझी। 

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आज यह बात पूरी तरह से स्पष्ट है कि जान से मार देने की धमकियाँ मिलने के बाद आदिवासियों ने पुलिस से अपने गाँव में सुरक्षा के इंतजाम करने का आग्रह किया था लेकिन पुलिस ने उनकी कोई भी मदद नहीं की। पुलिस और स्थानीय प्रशासन के कान में जूँ न रेंगने के कई कारण हो सकते हैं जो कि जगज़ाहिर हैं। 
सब जानते हैं कि भ्रष्टाचार में लिप्त अधिकतर पुलिस वाले ग़रीब और कमजोर वर्ग के लोगों की बात आसानी से नहीं सुनते। सुनवाई तभी होती है जब खाकी वर्दी वालों की अच्छे से सेवा की गई हो या फिर उनके ऊपर किसी शक्तिशाली व्यक्ति का जोर लगा हो।

निसंदेह, हमला करने वाले पुलिस की ओर से पूरी तरह निश्चिंत थे कि उनका कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता, वरना कौन हिम्मत कर सकता है कि 10-10 ट्रैक्टर ट्रॉलियों में लाठी-बल्लम और बंदूकों से लैस 200 से 250 हमलावर दिनदहाड़े किसी गाँव में घुसकर नरसंहार और गुंडागर्दी कर डालें। 

ऐसा तभी होता है जब गुंडे आश्वस्त होते हैं कि उनका कोई बाल बांका नहीं कर सकता। इस नरसंहार में 10 लोगों की हत्या कर दी गई और 26 लोग बुरी तरह से जख्मी हैं। सरकार तभी हरक़त में आई जब पानी सिर के ऊपर चला गया और मीडिया में प्रशासन की थू-थू होने लगी। 

कुछ छोटे-छोटे अधिकारियों पर थोड़ी बहुत दंडात्मक कार्रवाई भी हो गई जिनमें एसडीएम, सीओ, थानेदार और लेखपाल स्तर के लोग शामिल हैं। ऐसा लगता है जैसे वहाँ के उच्च अधिकारी डीएम और एसएसपी, दूध के धुले हैं और उनकी कोई ज़िम्मेदारी ही नहीं बनती। मुझे स्मरण है कि इस प्रकार की घटनाएँ इस आदिवासी क्षेत्र में समय-समय पर होती रही हैं। सरकार किसी की भी रही हो पिसने वाले आदिवासी ही रहे हैं। 

कौन नहीं जानता कि दशकों से ज़मीन पर जुताई कर रहे आदिवासियों को वहाँ से बेदख़ल करने की होड़ में भूमाफिया हमेशा से सक्रिय रहे हैं और जब-जब अन्याय के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाने का प्रयास आदिवासियों ने किया है उन्हें इसी प्रकार का उत्पीड़न और गुंडागर्दी झेलनी पड़ी है।

वर्षों पहले एक आध बार कुछ बड़े अधिकारियों को लपेटे में आना पड़ा है जिसमें एक डीएम भी जेल गए। लेकिन ग़ैर क़ानूनी खनन से आने वाली मोटी रकम के भागीदार बड़े-बड़े अधिकारी, नेता और मंत्री की मिलीभगत के कारण मूल समस्या वहीं की वहीं रह गई। 

बल्कि समस्या तबसे ज़्यादा बढ़ी है, जब से खनन से आने वाली काली रकम में बढ़ोतरी हुई है। अखिलेश यादव की सरकार में मशहूर खनन मंत्री गायत्री प्रसाद प्रजापति जिनके ख़िलाफ़ आजकल क़ानूनी कार्रवाई चल रही है, वह तो अरबों और खरबों के मालिक बताए जाते हैं। 

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उत्पीड़न के कारण बढ़ा नक्सलवाद

बेचारे आदिवासियों के उत्पीड़न का ही नतीजा है कि सोनभद्र और उसके आसपास के मध्य प्रदेश और बिहार से सटे उत्तर प्रदेश के इलाक़ों में नक्सलवाद को ख़ूब बढ़ावा मिला है। यह उसी रेड कॉरिडोर का हिस्सा है जो कि नेपाल की सरहद से होता हुआ बिहार, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, ओडिशा और आंध्र प्रदेश तक फैला हुआ है। इसमें कोई दो राय नहीं है कि यहाँ पर झगड़ा दो जातियों के बीच का नहीं बल्कि ग़रीब और अमीर का है। जमीन बोने वाला ग़रीब आदिवासी है और उस पर कब्जा करने वाले रईस और शक्तिशाली भूमाफिया। 

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने मामले की जाँच करने के लिए आनन-फानन में एक उच्च स्तरीय समिति का गठन तो कर दिया है। मामले की जाँच इत्तेफ़ाक से एक बहुत ही ईमानदार और तेज़-तर्रार महिला अधिकारी रेणुका कुमार को मिली है क्योंकि आजकल वह प्रदेश की प्रमुख सचिव (राजस्व) हैं। इसलिए उम्मीद की जा रही है कि इस बार दूध का दूध और पानी का पानी हो जाना चाहिए। लेकिन आख़िरकार क्या बेचारे आदिवासियों को इंसाफ़ मिल पाएगा? 

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इससे पहले भी जब पिछले वर्ष देवरिया स्थित एक शेल्टर होम में महिलाओं और बच्चियों के साथ हो रहे शारीरिक उत्पीड़न के मामले की जाँच इसी अधिकारी ने सरकार को दी थी, तब जाँच के बाद किसी प्रकार की कार्रवाई तो दूर की बात है, इस अधिकारी को लंबी छुट्टी पर जाने को मजबूर होना पड़ा था। कारण सीधा-सीधा था कि दोषी पाए गए लोगों की पहुँच सत्ताधारी पार्टी के उच्च स्तरों तक थी। अब समय बताएगा कि इस बार दोषियों के ख़िलाफ़ कार्रवाई होती है और दुखी आदिवासियों को इंसाफ़ मिल पाता है या हमेशा की तरह फिर से खानापूर्ति करके मामले को रफा-दफा कर दिया जाएगा। 

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