राजीव के चले जाने के बाद मेरे आसपास की हर चीज़ मेरे नुकसान की गूँज बनकर रह गई थी। उनकी याद से जुड़े कामों में मुझे कुछ सुकून मिलता था, लेकिन जब भी सार्वजनिक रूप से सामने आने की ज़रूरत पड़ती, मुझे अपनी कमज़ोरी का एहसास होने लगता। इन मौकों से बचा नहीं जा सकता था। जिन अलग-अलग मेमोरियल ट्रस्टों की अध्यक्षता मैं कर रही थी, उनका काम जारी रखना था। अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन और व्याख्यान होते थे। ऐसे कार्यक्रमों में मुझे भाषण देकर मेहमानों का स्वागत करना होता था। कार्यक्रम से पहले के दिनों में मैं अपनी बेचैनी से जूझती रहती। इस डर से भी कि कहीं लोगों को संबोधित करते हुए अचानक मेरे आँसू न बहने लगें। ऐसा तब भी होता, जब लोग मुझसे मिलने आते और मेरे प्रति संवेदना जताते। मुझे याद है, जब महान दलाई लामा आए थे और उन्होंने अपने हमेशा की तरह सहज, सीधे-सादे अंदाज़ में मुझसे पूछा था, “क्या राजीव की हत्या करने वालों के प्रति आपके मन में बदले की भावना है?” मैंने जवाब दिया, “नहीं, ऐसी कोई भावना नहीं है,” और फिर फूट-फूटकर रो पड़ी।
वह असुरक्षा लंबे समय तक मेरे साथ बनी रही… पर धीरे-धीरे, बहुत धीरे-धीरे, दिन कम सूने और अंतहीन लगने लगे। नींद लौट आई। राजीव मेरे जीवन में एक चुभती हुई अनुपस्थिति की जगह मेरे भीतर मौजूद एक एहसास बन गए। हालाँकि जब भी हम- राहुल, प्रियंका और मैं- कोई अहम बात साझा करते, जीवन के किसी ऐसे पड़ाव से गुज़रते जिसमें राजीव की भागीदारी बेहद ज़रूरी होती, तो पीड़ा फिर पूरी ताक़त से लौट आती। जैसे बच्चों का दीक्षांत समारोह, उनकी बेटी की शादी और बाद में उनके नाती-नातिनों का जन्म।
प्रियंका ने 1993 में जीसस एंड मैरी कॉलेज से मनोविज्ञान में स्नातक की डिग्री हासिल की। राहुल ने 1995 में ट्रिनिटी कॉलेज से मास्टर ऑफ फिलॉसफी (एम.फिल.) की डिग्री प्राप्त की। प्रियंका और मैंने तय किया कि हम राहुल के दीक्षांत समारोह में शामिल होंगे। मेरी माँ और छोटी बहन भी मेरी दो भांजियों के साथ हमारे साथ आईं। हमें वहाँ देखकर राहुल अपनी खुशी संभाल नहीं पा रहे थे। उनके चेहरे पर फैली मुस्कान थी। उन्होंने हम छहों को गले लगा लिया।
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कैम्ब्रिज की उन सँकरी गलियों में फिर से चलना, जो अब भी छात्रों की चहल-पहल से गुलज़ार थीं, और उन पुरानी जगहों से गुज़रना- वर्सिटी रेस्तराँ, मेरा पुराना भाषा विद्यालय, किम्बर्ली रोड पर राजीव का ठिकाना और टेनिसन रोड पर मेरा अपना ठिकाना- मुझे उन दिनों की याद दिला रहा था, जब राजीव और मैं पहली बार मिले थे और हमने साथ में वे सुखद दिन बिताए थे। सीनेट हाउस में आयोजित उस भावुक दीक्षांत समारोह के दौरान, जब राहुल अपनी डिग्री ले रहे थे, मैं अपने आँसुओं को रोकने की कोशिश कर रही थी। राहुल और प्रियंका भी उसी तरह भावुक हो उठे थे। उस ख़ास पल में उन्हें अपने पिता की कितनी याद आ रही होगी! राजीव को अपने बेटे पर कितना गर्व होता!
वक़्त आगे बढ़ता रहा। धीरे-धीरे जब मैं एकांत से बाहर आने लगी और थोड़ी सक्रिय हुई, तो कभी-कभार राजीव के पुराने सहयोगी मिलने आने लगे। कुछ लोग औपचारिक मुलाक़ात के लिए आते, कुछ किसी पारिवारिक समारोह में आमंत्रित करने के लिए। कुछ ऐसे भी थे जो मुझसे पार्टी के मामलों में सक्रिय दिलचस्पी लेने की अपील करते थे। मैं उनकी बातें चुपचाप सुनती, लेकिन उनकी अपील पर अमल नहीं करती थी।
1996 के चुनाव नतीजे कांग्रेस पार्टी के लिए निराशाजनक थे। वह अपने दम पर सरकार नहीं बना पाई थी। पार्टी टूट और गुटबाज़ी से परेशान थी। 1995 में मुझसे एक ख़ास समूह का समर्थन करने को कहा गया था। इस समूह में अर्जुन सिंह, एन.डी. तिवारी और मोहसिना किदवई प्रमुख थे। ये सभी दशकों से पार्टी के सदस्य थे और महत्वपूर्ण पदों तथा मंत्रालयों में रह चुके थे। मैंने मना कर दिया। वे पार्टी से अलग हो गए और उन्होंने एक नई पार्टी बना ली। अगले साल तमिलनाडु के वरिष्ठ नेता जी.के. मूपनार और पी. चिदंबरम भी अलग हो गए। उनके साथ कांग्रेस के एक युवा नेता माधवराव सिंधिया भी थे, जो 1980 में पार्टी में शामिल हुए थे। इन सभी ने अपनी-अपनी अलग पार्टियाँ बना लीं।

1997 में ममता बनर्जी ने राज्य के नेतृत्व से मतभेदों के चलते कांग्रेस छोड़ दी और अपनी पार्टी तृणमूल कांग्रेस बना ली। उसी साल मैं कांग्रेस की प्राथमिक सदस्य बनी।

कांग्रेस अध्यक्ष सीताराम केसरी ने मुझे कलकत्ता में पार्टी के 80वें महाधिवेशन में आमंत्रित किया था। लेकिन जैसे-जैसे पार्टी की स्थिति बिगड़ती दिखाई दे रही थी, मुझ पर उसका नेतृत्व संभालने का दबाव बढ़ता जा रहा था। मैं बेचैन रहने लगी थी। कांग्रेस में जो कुछ हो रहा था, उसके बारे में सोचती रहती और पार्टी के भविष्य को लेकर चिंतित रहती। मीडिया में छप रहे लेख उसके भविष्य की एक निराशाजनक तस्वीर पेश कर रहे थे। जब भी मैं राजीव और अपनी सास की तस्वीरों के पास से गुज़रती, तो दर्द और अपराधबोध का मिला-जुला एहसास मुझे घेर लेता। कभी-कभी तो मैं जान-बूझकर उन तस्वीरों की ओर देखने से बचती थी।
भारत से मेरा जुड़ाव मुझे मेरे पति और मेरी सास के ज़रिए मिला था। जिन ताक़तों से वे दशकों तक भारत की बहुलतावादी संस्कृति की रक्षा के लिए लड़ते रहे थे, वे अब ऐसे रास्ते पर बढ़ रही थीं, जिससे देश को अपूरणीय क्षति पहुँचने वाली थी। मैं घर में आराम से कैसे बैठ सकती थी और उनके काम तथा उनके बलिदानों को व्यर्थ होते हुए कैसे देख सकती थी?
मैं भीतर से परेशान थी। आधी रात को नींद खुल जाती और सोचने लगती कि मुझे क्या करना चाहिए, किस रास्ते पर जाना चाहिए। क्या मैंने राजनीति में आने के ख़िलाफ़ हर कदम पर संघर्ष नहीं किया था? क्या राजनीति ने मुझसे पहले मेरी सास और फिर मेरी ज़िंदगी का प्यार, मेरे बच्चों के पिता को बेरहमी से नहीं छीन लिया था? फिर क्यों, क्यों मेरे भीतर उस माँग का जवाब देने की इतनी तीव्र इच्छा पैदा हो रही थी, जो मुझसे की जा रही थी? मुझे राजनीति हमेशा नापसंद रही थी, यहाँ तक कि उन तमाम वर्षों में भी जब राजीव सार्वजनिक जीवन में थे। लेकिन अब मैं समझने लगी थी कि वह कौन-सी चीज़ थी जिसने उन्हें राजनीति में आने के लिए मजबूर किया था, जिसका मैंने उस वक़्त इतना कड़ा विरोध किया था- अपनी माँ और अपने देश के प्रति कर्तव्य का खिंचाव।
अब वही खिंचाव मुझे अपनी ओर खींचने लगा था। इससे मैं डरती थी। मैंने इसका विरोध करने की कोशिश की, लेकिन यह बार-बार लौट आता और मुझे परेशान करता रहता। मैं अपने ही भीतर एक युद्ध में फँस गई थी। मेरा एक हिस्सा राजनीति की दुनिया से दूर भागना चाहता था। सत्ता के खेल के साथ हर जगह जुड़ी महत्वाकांक्षा, लालच, पाखंड और विश्वासघात से मेरा मन पीछे हटता था। लेकिन मैं उन आंतरिक संस्कारों को भी नकार नहीं सकती थी, जो बचपन से मेरे भीतर गहरे बैठा दिए गए थे—सौंपे गए काम को पूरी लगन से करना, बड़ों का सम्मान करना, माता-पिता की आज्ञा मानना और परिवार के नियमों के प्रति निष्ठावान रहना।
ये संस्कार मुझे भीतर ही भीतर कचोटते रहते थे। मेरा कर्तव्य कहाँ था, यह मुझे साफ़ दिखाई दे रहा था। लेकिन उस कर्तव्य का अर्थ क्या था, यह भयावह था। मैं उस दुनिया को देख चुकी थी। राजीव के ज़रिए मैंने उसे अनुभव किया था—उसकी ऊँचाइयों को, बड़े प्रयासों और उपलब्धियों को, और साथ ही उसकी तमाम कुरूपताओं तथा भ्रष्टाचार को भी। मैं उसमें कदम रखने के बारे में सोच भी कैसे सकती थी? और वह भी ऐसे समय में, जब एक चुनावी लड़ाई सामने थी और मुझे पार्टी का नेतृत्व करना था? मेरे पास अनुभव कहाँ था? इस काम को करने की क्षमता या समझ कहाँ थी? यह ऐसा काम था, जिसने अतीत के बड़े-बड़े नेताओं को भी कई बार निराश किया था।

आख़िरकार मैं एक बाहरी व्यक्ति ही तो थी। मुझे बार-बार इस हैसियत का एहसास कराया गया था। हाँ, मैं इंदिरा गांधी की बहू और राजीव गांधी की विधवा थी, लेकिन मैं उस पार्टी में उस पद पर कदम रखने के बारे में सोचने की हिम्मत भी कैसे कर सकती थी, जिस पर वे दोनों रह चुके थे?

मैं खुद से यही पूछती थी। मेरे पास कोई अधिकार नहीं था—सिवाय इसके कि मैं उस परिवार का नाम अपने साथ लिए हुए थी। एक ऐसा नाम, जिसकी पूरे देश में व्यापक अपील थी, क्योंकि वह समर्पित सेवा और भारत के समावेशी विचार के प्रति निष्ठा का प्रतीक था। ऐसा भारत, जो धर्म, जाति, भाषा या क्षेत्र की सीमाओं से ऊपर था। यही वजह थी कि कांग्रेस के इतने सारे नेता और कार्यकर्ता मुझसे आगे आकर पार्टी का नेतृत्व संभालने की गुज़ारिश कर रहे थे। उनका कहना था कि अगर मैंने ऐसा नहीं किया, तो पार्टी टूटकर बिखर जाएगी—जैसा कि अब हो भी रहा था। वे मुझे समझा रहे थे कि जल्द ही सांप्रदायिक ताक़तों की लगातार बढ़ती हुई ताक़त को रोकने वाला कुछ भी नहीं बचेगा। मेरे लिए यही सबसे प्रभावशाली तर्क था।

यह संघर्ष चलता रहा। रातों की अधूरी नींद और बेचैनी से भरे दिन। मैं परेशान थी, अकेली थी। किसी ऐसी चीज़ की तलाश में थी, जिसका सहारा ले सकूँ; किसी ऐसे व्यक्ति या चीज़ की, जो मुझे रास्ता दिखा सके और मेरे डर तथा संदेहों से बाहर निकाल सके। क्या यह एक अवचेतन तलाश थी, जो मुझे उसी जगह ले जाने वाली थी, जहाँ मुझे अपने दिल में पहले से पता था कि मुझे जाना है? मैं अपने पूरे वयस्क जीवन में कभी धार्मिक नहीं रही, हालाँकि सभी धर्मों का सम्मान करती हूँ। लेकिन इसी दौर में मेरे भीतर भगवद्गीता की ओर लौटने की इच्छा पैदा हुई। मैंने इसे बहुत कम उम्र में पढ़ा था। यह प्राचीन ग्रंथ और वह महान कथा, जिसका यह हिस्सा है, हर जगह मौजूद थे। वे लाखों लोगों के जीवन और विचारों में रचे-बसे थे।
मैं जानती थी कि स्वतंत्रता आंदोलन के नायकों पर इसका गहरा प्रभाव रहा था। मैंने रंगमंच, त्योहारों और दूसरे माध्यमों में इसके रूपांतरण देखे थे। मैंने राजनीतिक हस्तियों को बार-बार इसके श्लोकों का पाठ करते सुना था, ताकि वे अपनी बात कह सकें या लोगों को कोई संदेश दे सकें। मैं लाल बहादुर शास्त्री संस्कृत विद्यापीठ के बारे में जानती थी। अपनी गुज़ारिश की वजह को ज़ाहिर न करते हुए मैंने अपने कार्यालय से पूछा कि क्या यह पता किया जा सकता है कि मैं घर पर कुछ कक्षाएँ ले सकती हूँ। प्रोफ़ेसर वाचस्पति उपाध्याय का नाम सामने आया। हम उन्हें “शास्त्रीजी” कहते थे। वे एक सौम्य, विनम्र और विद्वान व्यक्ति थे। हमारा परिवार भी उन्हें जानता था। उन्होंने अपने खाली समय में मुझे गीता का गहरा दार्शनिक अर्थ समझाने की कृपा की।
विचार से और
जनवरी 1997 से मैं समय-समय पर उनके साथ बैठने लगी। हम राजीव की किताबों की अलमारी से चुनी गई एक पुस्तक पढ़ते थे। वह संस्कृत में थी, और हर श्लोक के नीचे हिंदी तथा अंग्रेज़ी अनुवाद दिए गए थे। शास्त्रीजी संस्कृत में एक-दो श्लोक पढ़ते, मैं उनका हिंदी अनुवाद पढ़ती और फिर वे उसका अर्थ समझाते।
हमने धीरे-धीरे शुरुआत की, लेकिन अपने कार्यालय की नियुक्तियों वाली डायरी देखकर मुझे पता चलता है कि दिसंबर 1997 में हमारी कई बैठकें हुई थीं। पढ़ने का सिलसिला तेज़ी से आगे बढ़ा और हमारी आख़िरी बैठक 5 जनवरी 1998 को हुई। राहुल और प्रियंका मेरी बेचैनी से वाक़िफ़ थे। उन्हें डर था कि कहीं मैं राजनीति की ओर खिंचती न चली जाऊँ। जिस तरह मैंने राजीव के साथ राजनीति में आने को लेकर संघर्ष किया था, उसी तरह अब मेरे दोनों बच्चे मुझसे तीखी बहस करने लगे थे। वे अपनी दादी और अपने पिता को खोने की तकलीफ़ से गुज़र चुके थे। अब हमारे परिवार में हम तीन ही बचे थे। वे ज़ोर देकर कहते थे कि वे मुझे भी नहीं खोना चाहते। नए साल की छुट्टियों पर जाने से पहले उन्होंने मुझसे एक वादा लिया था। “हैप्पी न्यू ईयर, मामा। हमारे यहाँ न रहने के दौरान कोई पागलपन मत कर बैठना। तुमने हमसे वादा किया है, याद रखना।”

अब मैं अपने उथल-पुथल भरे विचारों के साथ अकेली थी। गीता का पाठ समाप्ति की ओर बढ़ रहा था। कृष्ण ने गीता का संदेश समझा दिया था—अपने धर्म का पालन करो, अपने कर्म के फल की चिंता किए बिना। पांडव राजकुमार अर्जुन घोषणा करते हैं कि उनका मोह अब दूर हो गया है। वे फिर से अपने वास्तविक स्वरूप में लौट आए हैं। अब वे दृढ़ हैं, सभी संदेहों से मुक्त हैं और युद्ध में अपनी भूमिका निभाने के लिए तैयार हैं। मेरे भीतर भी कुछ जाग उठा था। मुझे यक़ीन हो गया था। अपने संदेहों और सवालों का जवाब मुझे मिल गया था। मुझे बाहर निकलना था और वहाँ जाना था, जहाँ मेरा कर्तव्य मुझे बुला रहा था। और मैंने वही किया।

-(द हिंदू से साभार)