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रफ़ाल सौदे पर सवाल ही सवाल, क्या फँस जाएँगे नरेंद्र मोदी?

रफ़ाल विमान सौदों पर मीडिया में अब तक छपे दस्तावेज़ों के मुताबिक़ नया सौदा प्रधानमंत्री कार्यालय यानी पीएमओ ने ख़ुद किया। राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल का नाम भी नये सौदे में जोड़ा गया है। प्रधानमंत्री कार्यालय के हस्तक्षेप के कारण रफ़ाल विमानों की क़ीमत बढ़ गयी। तो यह आरोप कितना सही है?
शैलेश

वायु सेना के लिए रफ़ाल विमान ख़रीद के मामले में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार साफ़ तौर पर फँसती नज़र आ रही है। सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को अपने फ़ैसले में साफ़ कर दिया है कि सरकार को इस बात पर राहत नहीं दी जा सकती है कि अख़बारों में छपी रिपोर्ट रक्षा मंत्रालय से चुराए गये दस्तावेज़ों पर आधारित थे। कोर्ट अब इन दस्तावेजों की जाँच-पड़ताल करके आगे की कार्रवाई तय करेगा। रफ़ाल विमान सौदों पर अंग्रेज़ी के दो बड़े अख़बारों 'द हिंदू' और 'द इंडियन एक्सप्रेस' ने कई रिपोर्टें प्रकाशित कीं। इनमें कई गंभीर आरोप लगाये गये। इन रिपोर्टों में सीधे तौर पर प्रधानमंत्री कार्यालय पर सबसे गंभीर आरोप यह है कि रक्षा मंत्रालय के विशेषज्ञों की कमेटी को नज़रअंदाज़ करके सीधे रफ़ाल विमानों का सौदा किया। प्रधानमंत्री कार्यालय के हस्तक्षेप के कारण रफ़ाल विमानों की क़ीमत बढ़ गयी और भारत में इन विमानों को बनाने का ठेका यानी ऑफ़सेट कॉन्ट्रैक्ट उद्योगपति अनिल अंबानी को मिल गया।

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इस सौदे में गड़बड़ी को लेकर सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण, केंद्र सरकार के पूर्व मंत्री और भारतीय जनता पार्टी के पूर्व सदस्य अरुण शौरी और यशवंत सिन्हा के अलावा आम आदमी पार्टी के राज्यसभा सदस्य संजय सिंह ने सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर की थी। केंद्र सरकार ने तर्क दिया था कि सरकारी गोपनीयता क़ानून के अंतर्गत इन दस्तावेज़ों को छापना अवैध है और इसके साथ ही दस्तावेज़ों की चोरी का आरोप भी लगाया गया था। इसे राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए ख़तरनाक भी बताया गया था।

एक समय तो रफ़ाल की रिपोर्ट छापने वाले पत्रकारों पर चोरी का मुक़दमा दर्ज करने की बात भी की गयी थी। लेकिन मीडिया में आलोचना होने के बाद सरकार पत्रकारों के ख़िलाफ़ कार्रवाई से पीछे हट गयी।

अब तक जो दस्तावेज़ सामने आये हैं उनसे रफ़ाल सौदे में इन अनियमितताओं के आरोप लगाये जा रहे हैं।

  • मनमोहन सिंह सरकार के समय जो सौदा रफ़ाल बनाने वाली कंपनी दसॉ से किया गया था उसमें एक विमान की क़ीमत 526 करोड़ रुपये बैठती थी। मोदी सरकार के सौदे के मुताबिक़ एक विमान की क़ीमत क़रीब 16 सौ करोड़ रुपये हो जाएगी।
  • मनमोहन सिंह सरकार के समय हुए सौदे के मुताबिक़ भारत द्वारा ख़रीदे जाने वाले कुल 126 विमानों में से 36 विमानों का निर्माण फ़्रांस में किया जाना था और बाक़ी विमान भारत में सरकारी क्षेत्र की कंपनी एचएएल में बनाया जाना था। मोदी सरकार की सिफ़ारिश पर भारत में अनिल अंबानी की कंपनी रिलायंस समेत कई कंपनियों को ऑफ़सेट पार्टनर बनाया गया। रिलायंस ने दसॉ कंपनी के साथ एक संयुक्त कंपनी भी बनायी है।

विवाद की शुरुआत कहाँ से?

दरअसल, सारे विवादों की शुरुआत भारत में रफ़ाल बनाने का ठेका अनिल अंबानी की रिलायंस कंपनी को देने को लेकर हुई। कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गाँधी और अन्य विपक्षी नेताओं का कहना है कि अनिल अंबानी को ठेका दिलाने के लिए कई सरकारी नियमों को तोड़ा गया और अनिल अंबानी की कंपनी को लंबे समय तक फ़ायदा पहुँचाने के लिए क़ीमत बढ़ाने की छूट दी गयी। राहुल गाँधी का आरोप है कि इससे अगले 7 से 10 सालों में अनिल अंबानी की कंपनी को 30 हज़ार करोड़ से ज़्यादा के फ़ायदे होंगे।

नये कॉन्ट्रैक्ट के लिए नियम तोड़े गये

अब इस पर नज़र डालना ज़रूरी है कि रफ़ाल के संबंध में नया ठेका करने के लिए नियमों को किस तरह से तोड़ा गया। 'द हिंदू' की रिपोर्ट के मुताबिक़ इसके लिए सबसे पहले तो सौदा फ़ाइनल करने के लिए रक्षा मंत्रालय की कमेटी को किनारे कर दिया गया और प्रधानमंत्री कार्यालय ने ख़ुद सौदा करना शुरू कर दिया। इस सौदे के लिए रक्षा मंत्रालय ने 7 सदस्यों की कमेटी बनायी थी। प्रधानमंत्री कार्यालय के कुछ अधिकारियों ने सीधे सौदे की बातचीत शुरू की तो कमेटी के तीन सदस्यों एम.पी. सिंह, ए.आर. सुले और राजीव वर्मा ने लिखित तौर पर आपत्ति दर्ज करायी और साफ़ तौर पर कहा कि इससे देश को नुक़सान होगा। और अब जो सबूत सामने आये हैं उससे लग रहा है कि विमान की क़ीमत तीन गुणा बढ़ने का एक बड़ा कारण प्रधानमंत्री कार्यालय की दखल है। प्रधानमंत्री कार्यालय के हस्तक्षेप के बाद दसॉ कंपनी को मुख्य तौर पर ये छूट दी गयीं।

  • मनमोहन सिंह के समय हुए सौदे में सभी 126 विमानों के लिए समान क़ीमत रखी गयी थी। क़ीमत बढ़ाने का प्रावधान नहीं था। नयी व्यवस्था में प्राइस एस्कलेशन यानी क़ीमत बढ़ाने की छूट दी गयी।
  • भारत सरकार विमान बनाने वाली कंपनी दसॉ के खातों की जानकारी नहीं ले पाएगी। पिछली सरकार के सौदे में इसकी व्यवस्था थी। इसके ज़रिये सौदे में आर्थिक गड़बड़ी पकड़ी जा सकती थी।
  • पिछली सरकार ने सौदे के क्लॉज 22 और 23 में व्यवस्था की थी कि सौदे में कोई बिचौलिया या एजेंट नहीं होगा। मोदी सरकार ने इसे हटा दिया।
  • रफ़ाल बनाने वाली कंपनी दसॉ और भारत सरकार के बीच विवाद होने पर मध्यस्थ नियुक्त करके उसका हल निकालने की व्यवस्था पिछले सौदे में थी। नए सौदे में इसे हटाकर फ़्रांस सरकार से एक पत्र ले लिया गया कि फ़्रांस सरकार शिकायतों पर ख़ुद कार्रवाई करेगी। 
  • मनमोहन सरकार के सौदे में विमान आपूर्ति में देर होने पर जुर्माना का प्रावधान था। नये सौदे में उसे भी हटा दिया गया। 
  • मनमोहन सिंह के समय हुए सौदे में भारत में ऑफ़सेट पार्टनर के तौर पर एचएएल का नाम था। 
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नया सौदा सीधे पीएमओ ने किया

'द हिंदू' और 'द इंडियन एक्सप्रेस' में अब तक छपे दस्तावेज़ों के मुताबिक़ नया सौदा प्रधानमंत्री कार्यालय यानी पीएमओ ने ख़ुद किया। राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल का नाम भी नये सौदे में जोड़ा गया है। जहाँ तक भारत में ऑफ़सेट पार्टनर के लिए एचएएल की जगह अनिल अंबानी की कंपनी को चुनने का सवाल है उसमें मोदी सरकार की भूमिका की चर्चा फ़्रांस के पूर्व राष्ट्रपति फ़्रांस्वा ओलांद भी कर चुके हैं। फ़्रांस्वा ने एक बयान में कहा कि भारत सरकार ने इसके लिए एक ही कंपनी (रिलायंस) के नाम की सिफ़ारिश की थी। यानी ख़ुद मोदी सरकार ने इस सौदे से एचएएल को अलग कर दिया।

यह मामला जब पहली बार सुप्रीम कोर्ट पहुँचा तब कोर्ट को बताया गया कि सौदे की जाँच सीएजी ने कर ली है और उसकी रिपोर्ट संसद की पीएसी को दी जा चुकी है। इसी आधार पर सुप्रीम कोर्ट ने मामले को ख़ारिज़ कर दिया। बाद में पता चला कि रिपोर्ट की जाँच सीएजी ने नहीं की थी और उसकी रिपोर्ट पीएसी को नहीं दी गयी थी।

सौदे  को लेकर अभी तक जो तथ्य सामने आये हैं उससे संकेत मिलता है कि प्रधानमंत्री कार्यालय के सीधे हस्तक्षेप के चलते रफ़ाल की क़ीमत बढ़ी और उसका फ़ायदा सीधे तौर पर अनिल अंबानी की कंपनी को होता नज़र आ रहा है। सरकार ज़्यादातर मुद्दों पर कोई साफ़ जवाब अब तक नहीं दे पायी है। इसकी जगह तकनीकी आधार लेकर सुप्रीम कोर्ट से भी तथ्य छिपाए जा रहे हैं। मोदी सरकार का यह दावा भी खोखला साबित हो चुका है कि नये सौदे से रफ़ाल की क़ीमत कम हुई और विमान भारत को जल्द मिल सकेंगे। पहले सौदे के मुताबिक़ सौदा होने के बाद तीन से चार साल के भीतर 18 विमानों की आपूर्ति की जानी थी। नये सौदे में चार साल पाँच महीने का समय दे दिया गया है। रक्षा मंत्रालय के दस्तावेज़ बताते हैं कि बेंच मार्क यानी अधिकतम क़ीमत 5.06 बिलियन यूरो तय किया गया था, जबकि सौदा 7.87 बिलियन यूरो में किया गया। 

इससे जुड़ा एक विवाद यह भी है कि रफ़ाल सौदे से कुछ पहले अनिल अंबानी की एक कंपनी ने उस समय फ़्रांस के राष्ट्रपति फ़्रांस्वा ओलांद की पत्नी जूली गाये की फ़िल्म निर्माण कंपनी में पैसा लगाया था। यह भी इस सौदे पर संदेह खड़ा करता है। 

आपत्तियों को अनदेखा क्यों किया?

प्रधानमंत्री कार्यालय ने सीधे ही सौदे की बातचीत शुरू की तब रक्षा सचिव जी. मोहन कुमार ने आपत्ति जतायी। इसे भी प्रधानमंत्री कार्यालय ने अनदेखा कर दिया। पुराने सौदे में फ़्रांस सरकार और भारत सरकार को एक साझा एकाउंट एस्क्रो एकाउंट खोलने की बात थी। जिसके मुताबिक़ भारत सरकार को क़ीमत का भुगतान फ़्रांस के एस्क्रो एकाउंट में जमा करना था और विमान की आपूर्ति से भारत सरकार के संतुष्ट होने पर फ़्रांस सरकार दसॉ कंपनी को भुगतान देती। इसी तरह दसॉ कंपनी को आपूर्ति को लेकर संप्रभु और बैंक गारंटी देनी थी। मोदी सरकार के सौदे से इसे भी हटा दिया गया। इसके बदले फ़्रांस सरकार से एक आश्वासन पत्र ले लिया गया। 

सवाल यह है कि रफ़ाल की आपूर्ति और क्वालिटी को लेकर जितने भी बंधन पुराने सौदे में थे उसे नये सौदे से हटा क्यों दिया गया?

सुप्रीम कोर्ट ने अब इस मामले पर फिर से सुनवाई का फ़ैसला कर लिया है। ज़ाहिर है कि मोदी सरकार तथ्यों को लंबे समय तक छिपा नहीं पायेगी। पूरे विवाद में रफ़ाल की ख़रीद भी अटक सकती है। ऐसे में सेना को ज़रूरी ताक़त से लंबे समय तक वंचित रहना पड़ सकता है। यह मुद्दा अब सिर्फ़ चुनावों तक ही सीमित नहीं रह पायेगा। चुनाव के बाद सरकार चाहे जिसकी भी बने पूरे सौदे की समीक्षा से इनकार नहीं किया जा सकता है। प्रधानमंत्री मोदी और उनकी सरकार को सभी मुद्दों पर साफ़-साफ़ जवाब देना चाहिए। लेकिन सरकार अभी तक सबकुछ ढक कर रखने की कोशिश में दिखायी दे रही है। 

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