शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद पर विवाद है।
उत्तर प्रदेश में सनातन धर्म को बचाने की जंग छिड़ी हुई है तो दुनिया में सार्वभौमिक मानवीय मूल्यों को बचाने और नई व्यवस्था की रचना की जद्दोजहद मची है। दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के 77 वें गणतंत्र के अवसर पर और सत्य, अहिंसा के सनातन पुजारी महात्मा गांधी के शहादत दिवस (30 जनवरी) के आसपास यह सवाल मौजूं हो जाता है कि इनमें से क्या बचाने लायक है और उसे कैसे बचाया जाए? संयोग से राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय व्यवस्थाओं में जिन शक्तियों से यह आशा की जाती थी कि वे उदात्त मानवीय मूल्यों और नियम आधारित अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था को बचाएंगे उन्होंने उससे हाथ खड़े कर लिए हैं। वे अपनी शक्ति आधारित और स्वार्थ आधारित एक ऐसी व्यवस्था के निर्माण में लग गए हैं जिसे राष्ट्रीय स्तर पर धर्मतंत्रीय राजशाही कहा जा सकता है और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नव साम्राज्यवाद के आसपास देखा जा सकता है।
उत्तर प्रदेश में एक शक्ति असत्य, अहंकार और पुलिस के डंडे के बल पर सनातन धर्म को परिभाषित करते हुए उसे बचाने का दावा कर रही है तो दूसरी ओर दूसरी शक्ति धार्मिक संस्था, स्वाभिमान और आध्यात्मिक शक्ति के बल पर उसे परिभाषित और संरक्षित करने की कोशिश कर रही है। यहां दावोस के वर्ल्ड इकॉनमिक फोरम में कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी के भाषण में दिया गया वह दृष्टांत मौजूं हो जाता है जो उन्होंने चेकोस्लोवाकिया और चेक गणराज्य के राष्ट्राध्यक्ष रहे वाक्लाव हावेल के ‘पावर ऑफ द पालरलेस’ के हवाले से दिया था। उनका कहना था कि कम्युनिस्ट व्यवस्था काफी समय तक इस बात पर टिकी थी कि सामान्य लोग अपने घरों और दुकानों पर यह पोस्टर लगा दिया करते थे कि ‘दुनिया के मजदूरों एक हो’। हालांकि वे इसमें यकीन नहीं करते थे। लेकिन जैसे ही कोई व्यक्ति उसमें यकीन करना छोड़कर उस पोस्टर को उतार लेता है वैसे ही वह व्यवस्था भरभराने लगती है। कुछ ऐसी ही स्थिति सनातन धर्म के कथित रक्षकों और रामराज्य के कथित संस्थापकों की भी हो रही है। जिन शंकराचार्यों को वे अपना स्वाभाविक अनुयायी मान रहे थे और निश्चिंत थे कि वे उनकी सांप्रदायिक योजना में कारगर योगदान देंगे उनके सवाल और उनकी शाही स्नान की जिद ने उस व्यवस्था के राजा को नंगा कर दिया है।
क्या सनातन धर्म सत्ता, वैभव का आडंबरपूर्ण प्रदर्शन है?
इस विवाद और टकराव में रोचक बहसें हो रही हैं। एक ओर शंकराचार्यों का संगठन है जो अपने अपमान को लेकर उद्वेलित है तो दूसरी ओर अखाड़ा परिषद है जो राजनीतिक सत्ता के साथ खड़ा है। इस बीच अयोध्या में कुछ ऐसे धर्माचार्य पैदा हो गए हैं जो अपनी सत्ता स्थापित करने के लिए लच्छेदार भाषा का सहारा लेकर कभी स्त्री पहलवानों का शोषण करने वाले पूर्व सांसद के साथ खड़े हो जाते हैं और पाक्सो कानून को ही गैर जरूरी बताने लगते हैं तो कभी योग और संन्यास की सारी मान्यताओं को तिलांजलि देकर सत्ता का सुख भोगने वाले राजनेताओं के पीछे खड़े हो जाते हैं। ऐसे में यह भ्रम पैदा होता है कि क्या सनातन धर्म सत्ता और वैभव के आडंबरपूर्ण प्रदर्शन को कहते हैं या फिर उसके भीतर कुछ सादगी, संयम और त्याग के भी मूल्य हैं। इस बीच सेक्यूलरिज्म के समर्थक होने का दावा करने वाले लोग राजसत्ता को संविधान सम्मत बताकर धार्मिक सत्ता को कमजोर करने का आह्वान करने लगते हैं। तीसरा पक्ष उन विपक्षी राजनीतिक दलों का है जो हिंदुत्व के अभियान में कुछ दरारें देखकर उनका फायदा उठाने के लिए टूट पड़ता है। और उम्मीद करता है कि इसी से हिंदू समाज में उदारता और विविधता लौट आएगी।
मूल्यों और व्यवस्थाओं का यही क्षरण हम अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उस समय देखते हैं जब कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी वर्चस्ववादी महाशक्तियों का नाम लिए बिना यह कहते हैं कि अब दुनिया में किसी प्रकार की नियमबद्ध व्यवस्था नहीं बचने वाली है बल्कि उसकी जगह पर ‘जिसकी लाठी उसकी भैंस’ वाला नियम चलने जा रहा है। हालांकि उनका मानना है कि वह पहले भी नहीं थी लेकिन मर्यादा की एक ओट थी और वाक्लाव हावेल के दृष्टांत की तरह लोग यह मानते थे कि संयुक्त राष्ट्र है, डब्ल्यूटीओ है और हम अपना व्यवहार और कारोबार उसके मुताबिक़ कर रहे हैं। वैसे जैसे भारत में लोगों को एक भरोसा रहा है कि देश संविधान के रास्ते पर चल रहा है और कुछ समय के लिए भले फिसल जाए लेकिन एक दिन रास्ते पर आ जाएगा।
मार्क कार्नी एक निराशा भरे लेकिन यथार्थवादी स्वर में कहते हैं कि नियम आधारित पुरानी व्यवस्था अब खंडित हो गई है। वह अब वापस आने वाली नहीं है। नई व्यवस्था बनी नहीं है बल्कि उसे बनाना ही पड़ेगा। वे कहते हैं कि नई व्यवस्था सिद्धांत आधारित और व्यवहार आधारित बनेगी।
लोकतांत्रिक मूल्य बेहद दबाव की स्थिति में हैं
ठीक यही स्थिति भारतीय गणराज्य भी अपने भीतर महसूस कर रहा है। अपने गणराज्य की स्थापना के 77 वें वर्ष में उसके लोकतांत्रिक मूल्य बेहद दबाव और विखंडन की स्थिति में हैं। सनातन धर्म जिसकी दुहाई देकर महात्मा गांधी ने स्वाधीनता संग्राम को लड़ा और जीता और जिसकी पृष्ठभूमि में भारतीय संविधान बना और लोकतांत्रिक गणराज्य की स्थापना हुई वही सनातन धर्म आज लोकतंत्र और संविधान का दुश्मन बनता जा रहा है। या तो सनातन धर्म गड़बड़ है या फिर संविधान। इस बहस में भारतीय समाज उलझा हुआ है। एक बड़े राजनीतिशास्त्री तो यहां तक कहते हैं कि हम संविधान की भारतीय जड़ें तलाश ही नहीं सके हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि राष्ट्रीय स्तर से लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर तक धनबल और पशुबल के प्रदर्शन की इस व्यवस्था के बीच कौन सा सनातन मूल्य है जिसकी रक्षा की जानी चाहिए और जिसके लिए खड़ा होना चाहिए। सनातन मूल्य क्या है?
अगर सनातन मूल्य वह है जो युगों युगों से भारतीय समाज और विश्व समाज को टिकाए हुए है और पृथ्वी नामक ग्रह पर रहने वाले सभी प्राणियों के लिए कल्याणकारी है तो उसके उत्थान के साथ ही देश दुनिया में दमन, युद्ध, घृणा और लूटपाट का माहौल क्यों बना हुआ है? अगर सनातन धर्म में शक्ति है तो वह अपने देश से लेकर दुनिया की व्यवस्था के लिए कारगर सुझाव क्यों नहीं दे सकता कि दुनिया में अन्याय और शोषण हटे और विश्व बंधुत्व और न्याय पर आधारित एक व्यवस्था बने? जाहिर है कि वह व्यवस्था ‘मैं महान, मेरा धर्म महान, मेरा देश महान’ के अहंकार पूर्ण नारे से नहीं बनने वाली है। उसके लिए ‘तत त्वम असि, वसुधैव कुटुम्बकम, एकम सत्य विप्र वहुधा वदंति और सर्वेभवंतु सुखिना’ के सनातन मूल्य कारगर हो सकते हैं। वही मूल्य जो संयुक्त राष्ट्र के मूल चार्टर में हैं। वही मूल्य जो संविधान में हैं।
वह मूल्य धन कमाने के लिए देश से विदेश तक हर प्रकार की धोखाधड़ी के नहीं हैं और न ही राजसत्ता पाने और उस पर बने रहने के लिए हर तरह के हथकंडे अपनाने के हैं। वह मूल्य सत्य और अहिंसा के हैं। आज सनातन अगर अपने को लोभ और लालच के मार्ग से हटाकर जगत कल्याण के मार्ग पर चले तो वह न सिर्फ अपने देश में सद्भाव का माहौल बना सकता है, बल्कि दुनिया को नैतिकता का पाठ पढ़ा सकता है।
सत्य और अहिंसा
गांधी ने कहीं नहीं कहा कि सत्य और अहिंसा का आविष्कार उन्होंने किया। उनका तो कहना था कि वे तो उतने ही पुराने हैं जितने कि पर्वत। उनके लिए रामकृष्ण परमहंस की तरह सभी धर्मों का मार्ग उसी सत्य की ओर जाता है जो परम है। भले ही सारे धर्म अपूर्ण हों। लेकिन गांधी सिर्फ आदर्शवादी नहीं थे। वे व्यावहारिक भी थे। वे नैतिकता के प्रति लोगों में यकीन पैदा करने और उसके लिए एक ढांचा बनाने का प्रयास कर रहे थे।
मार्क कार्नी भी जब सैद्धांतिक और व्यावहारिक प्रणाली की बात करते हैं तो वे भी वही कहते हैं। जिनमें मानवाधिकार, सतत विकास, संप्रभुता और भौगोलिक अखंडता की रक्षा शामिल है। उसी तरह सनातन भी न्याय, बंधुता और स्वतंत्रता पर आधारित है। इसलिए सनातन धर्म न तो संविधान की रक्षा के लिए खड़े होने वाले न्यायमूर्ति एस. मुरलीधर के तबादले से बचेगा और न ही न्यायमूर्ति अतुल श्रीधरन और सीजेएम विभांशु सुधीर से। बल्कि उससे तो वह खंडित ही होगा। वह न्याय की मांग करता है और न्याय की मांग दिखावे से पूरी नहीं होती और न ही न्याय मांगने वाले को राष्ट्रविरोधी और धर्मविरोधी बताने से।
वास्तव में अन्याय और झूठ कुछ समय के लिए मजबूत और टिकाऊ भले लगे लेकिन वह महज ‘दुनिया के मजदूरों एक हो’ जैसे दिखावटी पोस्टरों पर टिका होता है। जैसे ही कोई एक व्यक्ति उन पोस्टरों को हटाने लगता है वैसे ही वह भरभराने लगती है। लेकिन सत्य और अहिंसा पर आधारित व्यवस्था अगर मानव बना ले गया तो उसके टिकाऊ होने और सनातनी होने में कोई संदेह नहीं है।