इसराइल-अमेरिका और ईरान युद्ध ने विश्व व्यवस्था के लिए जो खतरा पैदा किया है उस पर चिंताएं पैदा हो रही हैं लेकिन उनकी गंभीरता और उनका स्तर वह नहीं है जो होना चाहिए। विशेषकर द्वितीय विश्व युद्ध के बाद बल्कि प्रथम विश्व युद्ध से ही दुनिया के आला दिमाग युद्ध विरोधी घोषणा पत्र जारी करने और वक्तव्य देने में सक्रिय हो गए थे। अभी अधिक से अधिक प्रदर्शन हो रहे हैं और सरकारों की आलोचनाएँ हो रही हैं। लेकिन ठोस कार्रवाइयां नहीं हो रही हैं, जबकि पिछली सदी में जारी घोषणा पत्रों का हिस्सा अनिवार्य सैनिक भर्ती का विरोध और हर तरह के युद्ध का नकार था।
इसराइल का एक वीडियो वायरल हो रहा है जिसमें एक मां अपने बेटे को सेना में अनिवार्य रूप से भर्ती किए जाने का विरोध कर रही है और सुरक्षा कर्मी उस महिला पर को पटक कर बेहद क्रूर और अशोभनीय ढंग से काबू में ला रहा है। यह दृश्य 1930 में दुनिया भर के शांति संगठनों के संयुक्त मंच की ओर से अनिवार्य सैनिक भर्ती के विरुद्ध जारी उस घोषणा पत्र की याद दिलाता है जिस पर अमेरिका के जेन एडम्स, लियो टालस्टाय के सचिव पावेल विरुकोव और वैलेन्टीन बुलगाकोव, अमेरिकी प्रोफेसर जान डेवी, तब जर्मनी के नागरिक रहे अल्बर्ट आइंस्टीन, ऑस्ट्रिया के सिग्मंड फ्रायड, फ्रांस के रोमां रोलां, बर्टेंड रसेल, रवींद्र नाथ टैगोर और एचजी वेल्स जैसे दिग्गजों के दस्तखत थे। सेना में अनिवार्य भर्ती के विरुद्ध एक ऐसा ही घोषणा पत्र 1926 में जारी हुआ था जिस पर एनी बेसेंट, मार्टिन बूबर, एडवर्ड कारपेंटर, अल्बर्ट आइंस्टीन, महात्मा गांधी, रोमां रोला, बर्टेंड रसेल, रवींद्र नाथ टैगोर, एचजी वेल्स वगैरह के हस्ताक्षर थे।
आज भी उसी तरह का हस्ताक्षरित पत्र इसराइल से बाहर रहने वाले यहूदियों के 120 नेताओं की ओर से सामने आया है। उनका कहना है कि हिंसा न सिर्फ नैतिक रूप से शर्मनाक है बल्कि इसराइल के भविष्य के लिए रणनीतिक ख़तरा है। यह पत्र इसराइली राष्ट्रपति इजाक हरजोग को संबोधित है। इसमें कहा गया है कि पश्चिमी तट के निर्दोष फिलस्तीनियों पर यहूदी और इसराइली अतिवादियों द्वारा बरपाया गया कहर एक क़िस्म की चेतावनी है। इसराइली इतिहासकार और सेपियंस, होमो डियस, ट्वेंटीवन लेसन्स फार ट्वेंटी फर्स्ट सेंचुरी या नेक्सस जैसी इतिहास की बेस्टसेलर पुस्तकों के लेखक युआल नोवा हरारी का कहना है कि अगर हम फिलस्तीनियों के प्रति अपना व्यवहार नहीं बदलते तो इसराइल ऐतिहासिक तबाही का शिकार होगा। उनकी चेतावनी है कि इसराइल विनाश के कगार पर खड़ा है। नेतन्याहू और उनके सहयोगी संगठन इसराइल के भविष्य के बारे में उचित निर्णय लेने के लिए सक्षम नहीं हैं।

इसराइल की नीति

हरारी का कहना है कि इसराइल के शासक सैम्सन के सिद्धांत पर चल रहे हैं। सैम्सन बाइबल का एक चरित्र है जिसने फिलस्तीनी मंदिर के खंबे को इस तरह से पकड़ कर खींचा कि मंदिर भरभरा कर गिर गया और उसके मलबे में हजारों फिलस्तीनियों के साथ वह भी दब कर मर गया। वे लोग उसको अपमानित होते देखने के लिए इकट्ठा हुए थे। इसी सिद्धांत का रूपक देते हुए अमेरिकी पत्रकार सैमुअल हर्श ने एक किताब लिखी है जिसका शीर्षक हैः- द सैम्सन आप्शनः इसराइलस न्यूक्लियर आप्शन एंड अमेरिकन फॉरेन पॉलिसी। यह पुस्तक इसराइल के नाभिकीय प्रोग्राम की कहानी कहती है जिसमें इसराइल की इस पहल से कैनेडी से निक्सन तक कई अमेरिकी राष्ट्रपतियों को चिंतित दिखाया गया है।

सैन्य व्यवस्था बनाम स्वास्थ्य पर खर्च

इसराइल-अमेरिका और ईरान के मौजूदा परिदृश्य पर टिप्पणी करते हुए हरारी कहते हैं कि हम नई किस्म की वैश्विक अव्यवस्था में प्रवेश कर रहे हैं। यह एक तरह का साम्राज्यवादी युग है जिसकी आहट साफ़ सुनाई पड़ रही है। इसमें 2000 वर्षों की यहूदी संस्कृति और लोकतंत्र नष्ट होने जा रहा है। उनका मानना है कि आज के दस साल पहले ऐसी विश्व व्यवस्था थी या उसका आभास था कि कोई देश किसी पर बेवजह और ग़ैर क़ानूनी तरीक़े से हमला नहीं करेगा। उस समय दुनिया के शक्तिशाली देश अपनी सैन्य व्यवस्था पर 6 से 7 प्रतिशत व्यय कर रहे थे और स्वास्थ्य पर दस प्रतिशत तक व्यय कर रहे थे। इस व्यवस्था में छोटे छोटे देश भी अपने को सुरक्षित महसूस करते हुए सैन्य व्यवस्था पर खर्च कम रहे थे और शिक्षा और स्वास्थ्य पर व्यय बढ़ा रहे थे। वैसा मानव इतिहास में पहली बार हो रहा था लेकिन अब वह प्रणाली बदल रही है। यहीं पर वे सवाल करते हैं कि क्या आप अपनी ऊर्जा आवश्यकताओं को युद्ध द्वारा प्राप्त करेंगे या फिर विश्वास के माध्यम से? क्योंकि ऊर्जा सिर्फ ईंधन नहीं है बल्कि सभ्यताओं के बीच कायम होने वाला एक विश्वास का रिश्ता है।

विश्वास के रिश्ते को राष्ट्रों के नेता संधियों द्वारा हासिल कर सकते हैं। लेकिन तनाव और युद्ध कम करने के लिए वैकल्पिक और विशेषकर सौर ऊर्जा स्रोतों पर निर्भरता बढ़ाना ज़रूरी है क्योंकि उनके वैश्विक वितरण में अधिक साम्य है।

पर यह काम न तो सत्ता प्रतिष्ठानों को महज गाली देते रहने से हो पाएगा और न ही उनकी अंधभक्ति करने से। सत्ता प्रतिष्ठानों के मनुष्य विरोधी, नैतिकता विरोधी और पृथ्वी विरोधी चरित्रों को उजागर करने का सिलसिला रुकना नहीं चाहिए। ऐसी देशभक्ति और ऐसा राष्ट्रवाद दुनिया के लिए विनाशकारी होंगे जिनमें महज अपने आर्थिक और सुरक्षा संबंधी हितों की चिंता की जाती है। क्योंकि अगर विश्वव्यवस्था अस्थिर होगी तो किसी भी राष्ट्र का हित नहीं सधने वाला है बल्कि अहित ही होगा। जो लोग सोच रहे हैं कि पश्चिम एशिया में युद्ध होता रहे तो हमारा क्या बिगड़ने वाला है वे अर्थव्यवस्था पर पड़ने वाले व्यापक असर को या तो समझ नहीं रहे हैं या फिर उसे नजरअंदाज कर रहे हैं। तमाम तरह की मिसाइलों और उनकी मारक क्षमताओं पर रोमांचित होने वालों को समझना चाहिए कि विज्ञान और प्रौद्योगिकी के यह नए आविष्कार न तो विज्ञान के हित में है और न ही सामाजिक व्यवस्था के हित में।

विज्ञान और युद्ध के संबंध

भौतिक विज्ञानी पॉल लैंगेविन ने विज्ञान और युद्ध के संबंधों में जो घोषणा जारी की थी उस पर अल्बर्ट आइंस्टीन ने हस्ताक्षर किए थे। उस घोषणा में कहा गया थाः— “विज्ञान और तकनीकी कौशल मनुष्य द्वारा दूसरे को नुकसान पहुंचाने की क्षमता में रोजाना वृद्धि कर रहे हैं। आरंभ से ही विज्ञान के विकास का प्रयोग हत्या की कला को सिद्ध करने के लिए किया गया है। विश्व युद्ध ने विनाश के नए तरीक़े देखे हैं। रासायनिक और वैक्टीरिया संबंधी हथियारों में सिद्धि हासिल करने के कारण नए किस्म का विनाश और असाधारण आतंक प्रकट हुआ है। सभ्यता और मानव प्रजाति को जो खतरा पैदा हुआ है वह वैज्ञानिक प्रगति के नैतिक मूल्य पर संदेह पैदा करता है।... चूंकि विज्ञान की प्रगति पर कोई सीमा लगाई नहीं जा सकती इसलिए युद्ध को रोकना ही एक मात्र विकल्प है। यह कर्तव्य उन लोगों का है जिन्होंने विज्ञान के शोध में अपना जीवन लगा दिया है। हमारा पहला कर्तव्य है कि हम सैद्धांतिक रूप से हर प्रकार के युद्ध का विरोध करें।...”
निश्चित तौर पर द्वितीय विश्व युद्ध के बाद की विश्व व्यवस्था के निर्माण में इन घोषणाओं और संकल्पों का बड़ा योगदान था। उसके बाद अगर किसी अन्य देश पर परमाणु बम का प्रयोग नहीं हुआ तो इन तमाम चेतावनियों का प्रभाव था, भले ही उस व्यवस्था में तमाम कामियां थीं और एनपीटी और सीटीबीटी का पाखंड था जिसके कारण भारत, पाकिस्तान और इसराइल जैसे देशों ने परमाणु बम बना डाले। लेकिन उस विवेक ने एक शांतिपूर्ण सहअस्तित्व पर आधारित व्यवस्था की आशा जगाई थी। उसने यह सपना दिखाया था कि दुनिया ‘जियो और जीने दो’ के सिद्धांत पर चलेगी। आज उस विश्वास की धज्जियां उड़ रही हैं। अमेरिका जैसे देश का नेता कहता है कि उसे ग्रीनलैंड पर कब्जा करना है, कनाडा उसका 51वां प्रांत है। यह परिवर्तन इसराइल की नीतियों में भी आ रहा है और वह महाइसराइल का स्वप्न देख रहा है। विडंबना है कि गांधी, बुद्ध, महावीर और गुटनिरपेक्ष आंदोलन का देश भारत भी अमेरिका-इसराइल की इस धुरी का हिस्सा बन रहा है।
इसका निदान तभी हो सकता है जब हथियारों के बजाय विश्वास का उद्योग लगाया जाए और जब तक सरकार न समझे तब तक ऐसी नागरिक और जनशक्तियों को जगाया जाए जो परमाणु बम से लेकर हर प्रकार के शस्त्र का विरोध करें। अंतरराष्ट्रीय विवादों को हिंसा के बजाय बातचीत से हल करने का सिद्धांत तैयार करें और उसका प्रचार करें। दुनिया में ऊर्जा के अधिकतम उपभोग की सभ्यता को सभ्यता कहना बेमानी है। वे अपने में असभ्यता हैं और इस ग्रह की बीमारी हैं। युद्ध का एक कारण पिछले तीस सालों में तैयार हुआ भयानक उपभोग पर आधारित समाज भी है जो झूठ, घृणा, हिंसा और युद्ध पर आधारित राष्ट्रवाद को पसंद करता है और शारीरिक सुख के अलावा कुछ देखता नहीं है। लेकिन वह यह नहीं सोचता कि यह धरती सिर्फ उसी के उपभोग के लिए नहीं है। यह काम संयम के विचार और पारस्परिक विश्वास और एक उच्च स्तरीय नैतिकता से ही हो सकेगा और उसके लिए युवा पीढ़ी को आगे आना होगा। क्योंकि हम यह सोच कर निश्चिंत नहीं हो सकते कि तीसरा विश्व युद्ध अभी शुरू नहीं हुआ है, बल्कि यह मान लेना चाहिए कि वह चल रहा है।