जंग महज़ दुश्मनी का नतीजा नहीं होती। यह फ़ैसले का नतीजा होती है। और जब ताक़त असमान छूती हो, तो ज़िम्मेदारी भी उसी अनुपात में बढ़ जाती है।
अमेरिका और इसराइल अब परछाइयों में लड़ी जाने वाली जंग से निकलकर सीधे ईरान के साथ खुले टकराव में उतर आए हैं। मिसाइलें चल चुकी हैं। जवाबी हमले शुरू हो चुके हैं। बाज़ार सहमे हुए हैं। इलाक़ाई ताक़तें चौकन्नी हो गई हैं। वाशिंगटन में बहस है कि यह ज़रूरी था या नहीं। असली सवाल यह है कि क्या इसे टाला जा सकता था।
ईरान एक क्षेत्रीय ताक़त है, सालों से पाबंदियों में जकड़ा हुआ, सीमित अर्थव्यवस्था और सीमित सैन्य पहुँच के साथ। अमेरिका दुनिया की सबसे बड़ी सैन्य ताक़त है, बेमिसाल हथियारों, नौसैनिक दबदबे, आर्थिक पकड़ और गठबंधनों के जाल के साथ। जब एक क्षेत्रीय ताक़त और एक वैश्विक महाशक्ति आमने-सामने आती हैं तो टकराव बराबरी का नहीं होता। यह तय करता है कि कौन मैदान को कितना फैला सकता है। और यह ताक़त अमेरिका के पास थी।
इसराइल मज़बूत है, लेकिन ईरान के भीतर गहरे और लंबे अभियानों के लिए उसे अमेरिकी ख़ुफ़िया जानकारी, ईंधन, हथियारों की सप्लाई, मिसाइल रक्षा और कूटनीतिक सहारे की ज़रूरत होती है। वाशिंगटन की मंज़ूरी या मदद के बिना यह जंग इतनी बड़ी नहीं हो सकती थी। इसराइल ने पहल की, लेकिन जंग में बदलने का फ़ैसला अमेरिका ने किया।
2015 का परमाणु समझौता
2015 का परमाणु समझौता ईरान की गतिविधियों पर सख़्त निगरानी रखता था। उसके टूटने से सारी रोकथाम हट गई। अमेरिका ने समझौते से निकलकर फिर से सख़्त पाबंदियाँ लगाईं और यह संदेश दिया कि पालन करने पर भी स्थिरता की गारंटी नहीं है। ईरान ने धीरे-धीरे जवाब दिया- ज़्यादा संवर्धन, ज़्यादा सेंट्रीफ़्यूज, और प्रॉक्सी दबाव। दोनों ने सीमाओं के भीतर रहकर बढ़त ली। बातचीत असंभव नहीं थी। भरोसा टूटा था। और जब हमला चुना गया तब भी बातचीत की राह बची हुई थी। यह आख़िरी मजबूरी नहीं थी। यह एक पसंद थी। और यह पसंद उसी की थी जिसके पास ताक़त थी।
अमेरिका और इसराइल का गठजोड़ गहरा है। लेकिन गठजोड़ स्वतंत्र फ़ैसले की ज़िम्मेदारी नहीं मिटाता। इसराइल ईरान को अस्तित्व का ख़तरा मानता है।
अमेरिका के लिए ईरान से कोई सीधा भौगोलिक ख़तरा नहीं है। उसके लिए दांव हैं- क्षेत्रीय स्थिरता, गठबंधन की साख, परमाणु नियम और वैश्विक अर्थव्यवस्था। जब अमेरिका इसराइल की नज़र पूरी तरह अपना लेता है तो बातचीत की गुंजाइश घट जाती है और युद्ध की सीमा बढ़ जाती है। यह एक राजनीतिक चुनाव है। और वही चुनाव इस जंग को असल में अमेरिका का फ़ैसला बनाता है।
अंतरराष्ट्रीय क़ानून क्या कहता है?
अंतरराष्ट्रीय क़ानून कहता है कि बल का इस्तेमाल सिर्फ़ आत्मरक्षा या सुरक्षा परिषद की मंज़ूरी से हो सकता है। जब सबसे ताक़तवर देश ‘तत्काल ख़तरे’ की परिभाषा को खींच देता है, तो वह मिसाल बन जाती है। नियमों की साख तभी रहती है जब उनका पालन सब पर बराबर हो। ताक़तवर जब नियम ढीले करता है, तो असर पूरे सिस्टम पर पड़ता है।
ईरान का पैटर्न साफ़ है: प्रॉक्सी के ज़रिए दबाव, सीधे युद्ध से बचाव, धीरे-धीरे बढ़त। वाशिंगटन यह जानता था। यह भी जानता था कि सीधे ईरान पर हमला जवाबी कार्रवाई को मजबूर करेगा — साइबर हमले, समुद्री व्यवधान, मिलिशिया की सक्रियता। यह सब अनुमानित था। जब नतीजे पहले से साफ़ हों तो ज़िम्मेदारी उसी पर आती है जो पहला क़दम उठाता है। अमेरिका के पास बेहतर जानकारी थी, बेहतर मॉडलिंग थी, और व्यापक इलाक़ाई समझ थी। उसने सब जानते हुए भी हमला चुना।
ताक़त बढ़ती है तो ज़िम्मेदारी भी
दुनिया की अर्थव्यवस्था खाड़ी के तेल पर टिकी है। हल्की सी रुकावट भी दाम, बीमा, महँगाई और उभरते बाज़ारों को हिला देती है। क्षेत्रीय ताक़तें सीमित सोच सकती हैं। वैश्विक महाशक्ति को पूरे सिस्टम का हिसाब रखना पड़ता है। ताक़त बढ़ती है तो ज़िम्मेदारी भी बढ़ती है।
लंबी जंग के लिए लोकतांत्रिक मंज़ूरी चाहिए। जब कार्यपालिका अकेले फ़ैसला करती है तो लोकतांत्रिक भरोसा टूटता है। यह सिर्फ़ प्रक्रिया नहीं है। यह जनता के विश्वास, गठबंधन की मज़बूती और जंग की स्थिरता को तय करता है। अमेरिका खुद को लोकतांत्रिक संतुलन का प्रतीक कहता है। जब वह उससे हटता है तो उसकी साख भी गिरती है।
ईरान की दख़लअंदाज़ी अस्थिर करती है। इसराइल की चिंताएँ उसकी बनाई हुई हैं! असली नहीं हैं। लेकिन असली बात यह है कि जंग को खुला बनाने का फ़ैसला अमेरिका ने किया। उसके पास सबसे ज़्यादा ताक़त थी, सबसे ज़्यादा बातचीत की राहें थीं, सबसे ज़्यादा रोकथाम की क्षमता थी। जब वही ताक़त बातचीत छोड़कर युद्ध चुनती है तो सबसे बड़ी ज़िम्मेदारी उसी पर आती है।
किसने सीमा लांघी?
इतिहास बताता है कि ताक़तवर अक्सर भविष्य के डर से वर्तमान को अस्थिर कर देते हैं। रोकथाम का तर्क अंदर से सही लग सकता है, लेकिन बाहर से अस्थिर करता है। ताक़त तात्कालिक जोखिम घटाती है, लेकिन लंबी जंग में खुद को भी फँसा देती है। ज़िम्मेदारी इरादे से नहीं तय होती। यह तय होती है कि किसने सीमा पार की। और सीमा अमेरिका ने पार की।
राजनीति में ताक़त के साथ एजेंसी भी बढ़ती है। छोटे देश सीमाओं में रहते हैं। बड़े देश सीमाएँ तय करते हैं। अगर यह जंग फैली, तो इतिहासकार इसे ईरान की मिसाइलों या इसराइल की रणनीति से नहीं जोड़ेंगे। वे उस पल को दर्ज करेंगे जब वाशिंगटन ने संयम छोड़कर युद्ध चुना। जब सबसे ताक़तवर देश युद्ध चुनता है तो पूरा सिस्टम बदल जाता है। और सिस्टम बदलने की ज़िम्मेदारी उसी पर आती है।