जब भी किसी समाज ने अपने भीतर मौजूद गहरी और पीढ़ियों से चली आ रही असमानताओं को सुधारने की कोशिश की है, तब उसे विरोध का सामना करना पड़ा है। यह विरोध अक्सर उन लोगों से आया है, जिन्हें उस असमान व्यवस्था से लाभ मिलता रहा है। यह न तो नई बात है और न ही केवल भारत तक सीमित है। पूरी मानव सभ्यता के अनुभव बताते हैं कि अफर्मेटिव एक्शन यानी ‘सकारात्मक भेदभाव’ जैसे कदम हर समाज में ज़रूरी भी रहे हैं और विवादास्पद भी।
अफर्मेटिव एक्शन किसी सरकार की उदारता या राजनीतिक मजबूरी नहीं होता। यह उस सच्चाई की स्वीकृति है कि समानता का कानून, असमान समाज में अपने-आप न्याय नहीं दे सकता।
जब किसी समूह को नस्ल, जाति, लिंग या जन्म के आधार पर सदियों तक शिक्षा, संसाधनों और सम्मान से वंचित रखा गया हो तो केवल ‘सब बराबर हैं’ कह देने से स्थिति नहीं बदलती।
अमेरिका में गुलामी और नस्लीय भेदभाव के बाद, दक्षिण अफ्रीका में रंगभेद के बाद, ब्राज़ील में अश्वेत आबादी के बहिष्कार के बाद और कनाडा-ऑस्ट्रेलिया में आदिवासी समुदायों के दमन के बाद- हर जगह सरकारों को विशेष नीतियाँ बनानी पड़ीं।
भारत में जाति-व्यवस्था इस तरह की असमानता का शायद सबसे पुराना और कठोर उदाहरण है।
दुनिया भर में विरोध का एक-सा स्वरूप
दिलचस्प बात यह है कि अफर्मेटिव एक्शन के ख़िलाफ़ उठने वाले तर्क लगभग हर देश में एक जैसे रहे हैं।
अमेरिका में कहा गया कि इससे ‘मेधा’ ख़त्म हो जाएगी और योग्य छात्रों के साथ अन्याय होगा। दक्षिण अफ्रीका में श्वेत समुदाय ने आशंका जताई कि वे पीड़ित बन जाएंगे। ब्राज़ील में अभिजात वर्ग ने नस्लीय भेदभाव के अस्तित्व से ही इनकार कर दिया।लेकिन समय के साथ यह साफ हुआ कि:
- न संस्थाएँ टूटीं
- न गुणवत्ता गिरी
- न ही प्रभुत्वशाली वर्ग का कोई विनाश हुआ
- जो बदला, वह था विशेषाधिकार का एकाधिकार।
- भारत में आंबेडकर की ऐतिहासिक भूमिका
भारत में अफ़र्मेटिव एक्शन की नींव दुनिया के कई देशों से पहले रखी गई और इसका श्रेय डॉ. भीमराव आंबेडकर को जाता है। संविधान निर्माण के समय उन्होंने यह साफ़ देखा कि राजनीतिक आज़ादी तब तक अधूरी रहेगी, जब तक सामाजिक न्याय सुनिश्चित न किया जाए।
आंबेडकर जानते थे कि अगर जाति आधारित अन्याय को अनदेखा कर दिया गया तो ‘कानून के सामने समानता’ एक खोखला वाक्य बन जाएगी। इसी कारण उन्होंने अनुसूचित जाति और जनजाति के लिए आरक्षण, भेदभाव निषेध और विशेष सुरक्षा उपायों पर ज़ोर दिया।
उन्होंने साफ़ कहा था कि भारत एक ‘विरोधाभासी जीवन’ में प्रवेश कर रहा है- जहाँ राजनीतिक बराबरी होगी, लेकिन सामाजिक और आर्थिक असमानता बनी रहेगी। आज की बहसें उनकी इस चेतावनी को सही साबित करती हैं।
यह याद रखना ज़रूरी है कि संविधान सभा में भी आरक्षण का कड़ा विरोध हुआ था। तब भी “मेधा”, “राष्ट्रीय हित” और “दुरुपयोग” जैसे शब्द इस्तेमाल किए गए। आंबेडकर का उत्तर साफ़ था- यह मेधा के खिलाफ नहीं, बल्कि एकाधिकार के खिलाफ है।
“उलटा भेदभाव” का भ्रम
दुनिया भर में यह दावा किया गया कि अफर्मेटिव एक्शन से नए पीड़ित पैदा होंगे। लेकिन इतिहास बताता है कि कहीं भी प्रभुत्वशाली वर्ग को वास्तविक नुक़सान नहीं पहुँचा।
जो खोया गया, वह था बिना जवाबदेही का विशेष लाभ।
हर मानवाधिकार कानून- चाहे वह महिलाओं की सुरक्षा हो, नस्लीय समानता हो या उत्पीड़न विरोधी नियम- पहले “गलत इस्तेमाल” के डर से विरोध झेलता है। बाद में समाज उनके साथ संतुलन बनाना सीखता है।
संस्थाएँ नियमों से सुधरती हैं, अपीलों से नहीं
इतिहास यह भी सिखाता है कि संस्थाएँ अपने-आप नहीं बदलतीं। विश्वविद्यालय, दफ़्तर और प्रशासन तभी सुधरते हैं जब:
- स्पष्ट नियम हों
- निगरानी हो
- जवाबदेही तय हो
जो बातें पहले “अतिरेक” लगती हैं, वही बाद में सामान्य व्यवहार बन जाती हैं।
आज भारत के सामने असली सवाल
आज का सवाल यह नहीं है कि अफर्मेटिव एक्शन सही है या गलत- इतिहास इसका उत्तर दे चुका है। असली सवाल यह है कि क्या भारत इतना परिपक्व है कि:
- न्यायपूर्ण नीतियों को बेहतर बनाए
- दुरुपयोग से बचाने के उपाय करे
- लेकिन मूल उद्देश्य से पीछे न हटे
आंबेडकर ने कभी नहीं कहा कि ये नीतियाँ पूर्ण हैं। उन्होंने कहा था कि अन्यायपूर्ण समाज में ये अनिवार्य हैं। जब तक जाति जैसी संरचनाएँ मौजूद हैं, तब तक बराबरी के लिए विशेष उपाय भी ज़रूरी हैं।
मानव इतिहास का अनुभव स्पष्ट है-
जिन्हें विशेषाधिकार मिला होता है, उन्हें न्याय हमेशा ज़्यादा लगता है।
लेकिन वे समाज ही आगे बढ़े हैं, जिन्होंने अपने अतीत की सच्चाई को स्वीकार किया और असमानता को ठीक करने का साहस दिखाया।
डॉ. आंबेडकर ने यह साहस आठ दशक पहले दिखाया था। आज ज़रूरत है उस दृष्टि को कमजोर करने की नहीं, बल्कि उसे और मजबूत, पारदर्शी और न्यायपूर्ण बनाने की।
क्योंकि इतिहास यह भी बताता है- असमानता से समझौता करने की कीमत, उसे चुनौती देने से कहीं ज़्यादा होती है।