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शाहीन बाग़फ़ाइल फ़ोटो

संविधान बचाने के लिये ज़रूरी है आन्दोलनकारियों को बचाना

सुप्रीम कोर्ट के वकील महमूद प्राचा के हवाले से शाहीन बाग़ वालों में संविधान बचाओ आन्दोलन को जल्द बहाल करने की सुगबुगाहट है। इसी तर्ज़ पर क्या सोशल-डिस्टेंसिंग का जोख़िम उठाकर 30 अगस्त को मुहर्रम का जुलूस निकालने की इजाज़त माँगने, देने या नहीं देने को लेकर कहीं तनाव के हालात तो नहीं बन जाएँगे? ऐसे दौर में जब रोज़ाना क़रीब 65 हज़ार कोरोना पॉज़िटिव के मामले सामने आ रहे हों, जब स्कूल-कॉलेज निलम्बित हों और रेल-सेवा असामान्य हो, जब मेट्रो-सेवा शान्त हो, होटल-रेस्टोरेंट बन्द हों, जब मास्क अनिवार्य हो, तब क्या ऐसी बातें होना ठीक है कि जल्द ही ‘शाहीन बाग़’ की बहाली हो? संविधान बचाओ आन्दोलन के अगले दौर का वक़्त क्या अभी आने से फ़ायदा होगा? क्या सरकारें इसे होने देंगी? कहीं ये पुलिसिया सख़्ती को ‘आ बैल मुझे मार’ का सन्देश तो नहीं देगी?

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दरअसल, भारत पर अभी कोरोना-मारीचिका हावी है। कोरोना-काल के दौरान उत्तर भारत के मुसलमानों में अज़ीबो-ग़रीब हूक उठती रही है।

उन्हें यहाँ-वहाँ से अपनी बिरादरी के साथ हो रहे भेदभाव की ख़ूब ख़बरें भी मिलीं। देश देख चुका है कि तब्लीग़ी जमात के नाम पर उठी नफ़रत की लपटों ने ठेले पर फल-सब्ज़ी बेचने वालों की मज़हबी पहचान को कैसी प्रमुखता दिलायी। गाय के नाम पर लिंचिंग की नयी घटना को भी कोरोना नहीं टाल सका। दिल्ली के दंगों की पुलिसिया जाँच से कई बदरंग पन्ने भी फिज़ा में उड़ते देखे गये। ‘370’ की पहली पुण्यतिथि भी निपट गयी। लॉकडाउन की तकलीफ़ों और बेरोज़गारी के बावजूद जो ग़रीब जीवित रहे, उन्हें भी बाढ़ और अस्पतालों की दुर्दशा ने जमकर डुबोया। लेकिन अमीरों के आईपीएल को न सिर्फ़ डूबने से बचाया गया, बल्कि उसे ‘आत्मनिर्भर’ बनने के लिए ‘वोकल फॉर लोकल’ वाले गुरु-मंत्र से भी विशेष छूट दी गयी। आसार हैं कि स्वतंत्रता-दिवस की भाषणबाज़ी भी क़तई फ़ीकी नहीं रहेगी। 

लेकिन क्या उपरोक्त तमाम मिसालों को देखते हुए मुसलिम समाज बराबरी की उम्मीद पाल सकता है? यह सही है कि आन्दोलनकारियों पर कभी दमनकारी सत्ता के बर्बर रवैये का ख़ौफ़ नहीं होता। लेकिन आन्दोलन की कमान थामने वालों को अपनी ताक़त और कमज़ोरियों का भी सही अहसास ज़रूर होना चाहिए। कोरोना से पहले चले आन्दोलन के तज़ुर्बों से सीखना भी बहुत ज़रूरी है। 

मसलन, उस आन्दोलन की सबसे बड़ी उपलब्धि यह थी कि वो मुसलमानों की नागरिकता के सवाल से शुरू होकर संविधान बचाने की ओर घूम गयी। इसे शिक्षित और सेक्युलर मुसलमानों से ज़्यादा इसी श्रेणी के हिन्दुओं और इनमें से भी ख़ासतौर पर युवाओं और महिलाओं का अद्भुत समर्थन मिला। सिर्फ़ इसी इकलौते पहलू से हुक़्मरानों के माथे पर बल पड़ा।

फ़रवरी में दिल्ली विधानसभा के चुनाव हुए। दिसम्बर-जनवरी में हुक़्मरानों को अपनी ज़मीनी सच्चाई दिखने लगी थी। मेनस्ट्रीम मीडिया तो मुट्ठी में था लेकिन सोशल मीडिया ने नाक में दम कर रखा था। यही देख कुछ लोगों को डर सताने लगा कि सेक्युलर हिन्दुओं और मुसलमानों की एकजुटता यदि उसी रफ़्तार से बढ़ती रहती तो उनके लिए ‘मुश्किल-काल’ बहुत दूर नहीं रहता। इसी एकजुटता में सेंधमारी के लिए दिल्ली में दंगों की पटकथा लिखी गयी। नफ़रत और उन्माद फैलाने वाली भाषणबाज़ी के धारावाहिक चले। दंगों में पुलिस ने वही किया जो उसे हुक़्म मिला, ताकि ‘सबसे ज़्यादा अनुशासित और आज्ञाकारी संस्था’ वाला उसका सिंहासन अक्षुण्ण रहे।

अब तो सभी लोकतांत्रिक संस्थाओं में ख़ास तरह का ‘समाजवाद’ आ चुका है। सभी ने पुलिसिया-संस्कारों को ही अपना आराध्य बना लिया है। विधान सिर्फ़ इतना है कि हुक़्म की तामील होगी, हर हाल में होगी, अवश्य होगी। बाक़ी संविधान की बातें जिन्हें करना है वो नक्कारख़ाने में तूती बजाते रहें। नये भारत में सबको इस आकाशवाणी पर यक़ीन करना होगा कि ‘पूर्वी लद्दाख में न तो कोई हमारी सीमा में घुस आया है, न ही कोई घुसा हुआ है और ना ही हमारी कोई पोस्ट किसी दूसरे के कब्ज़े में है।’

इसीलिए मुसलिम समाज चाहे तो गाँठ बाँध ले कि उसकी किसी भी क़िस्म की एकता से हुक़्मरानों की सेहत पर कोई फ़र्क़ नहीं पड़ने वाला। क्योंकि हुक़्मरानों को कपड़ों से पहचानने में महारत हासिल है। लिहाज़ा, शाहीन बाग़ की बहाली के लिए बेताब लोगों को पहचान के बजाय परिचय को तरजीह देना सीखना होगा। उन्हें समझना होगा कि पहचान तो दूर से ही हो जाती है जबकि परिचय के लिए नज़दीक आना या रूबरू होना पड़ता है। चन्दन-टीका, पगड़ी-टोपी, दाढ़ी-मूँछ, घूँघट-बुर्का, धोती-पजामा – ये सभी पहचान हैं, जबकि सेक्युलर-कम्युनल, कट्टर-उदार, जातिवादी-प्रगतिशील आदि परिचय हैं। इसी परिचय के साथ उन्हें जिन हिन्दुओं, युवाओं और महिलाओं का ज़ोरदार समर्थन मिला था, उसी ताक़त से वो मंज़िल पा सकते हैं।

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अभी कोरोना के दौरान जिस स्तर का और जैसा ‘अनलॉक’ सामने आया है, उसमें संविधान बचाने की पैरोकारी करने वाले हिन्दुओं, युवाओं और महिलाओं की एकजुटता में मुश्किल होगी। इसीलिए अभी जोख़िम लेने का वक़्त नहीं है। थोड़ा और इन्तज़ार कर लेने में कोई हर्ज़ नहीं है। 15 अगस्त की बातें यदि सरक कर 2 अक्टूबर हो जाए तो कोई आफ़त नहीं आ जाएगी। अबकी बार शाहीन बाग़ के आन्दोलनकारियों को संविधान के अलावा अर्थव्यवस्था की ऐतिहासिक दुर्दशा को भी अपने रडार में लेना होगा। इन्हें यह भी समझना होगा कि सरकार किसी भी क़ीमत पर अपने क़दम वापस नहीं खींचेगी। वो ज़्यादा से ज़्यादा अपने क़दमों को आगे बढ़ाने का इरादा टालती रहेगी। लेकिन इस दौरान आन्दोलनकारियों को हिंसा और हिरासत के उकसावों से भी ख़ुद को बचाना होगा।

बीते एक साल ने सेक्युलरों और संविधान की दुहाई देने वालों को अनेक सबक दिये हैं। इसीलिए आन्दोलनकारियों को समझना होगा कि जो विरोधियों की ताक़त का सही अन्दाज़ा नहीं लगाते, वो विरोधियों का शिकार बनने के लिए अभिशप्त होते हैं। गाँधी जी के मुताबिक़ आंदोलन तभी कामयाब होते हैं जब उनकी बुनियाद अहिंसा और सत्य पर टिकी होती है। सत्य और अहिंसा ही इस आंदोलन की ताक़त है और वो यूँ हवा में जाया नहीं किये जा सकते।

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मुकेश कुमार सिंह
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