भारत का सुप्रीम कोर्ट संविधान का संरक्षक कहलाता है और आम नागरिक की आख़िरी उम्मीद माना जाता है। लेकिन आज स्थिति यह है कि देश के बड़े तबके—दलित, आदिवासी, अल्पसंख्यक और ओबीसी—तेज़ी से यह मानने लगे हैं कि यह अदालत उनके लिए नहीं है। यह केवल ‘धारणा’ की समस्या नहीं है, बल्कि एक गंभीर संवैधानिक संकट है।
संविधान की रखवाली कौन कर रहा है?
उच्च न्यायपालिका की सामाजिक बनावट पर अगर नज़र डालें तो तस्वीर चिंताजनक है। सरकारी आँकड़ों और स्वतंत्र अध्ययनों के अनुसार:
- 2018 से 2023 के बीच नियुक्त हुए हाई कोर्ट जजों में लगभग 75–80% सामान्य/उच्च जातियों से थे।
- दलित (SC) लगभग 3–4%, आदिवासी (ST) सिर्फ़ 1–2%, ओबीसी करीब 11–12% और अल्पसंख्यक लगभग 5–6% ही थे।
- महिलाएँ भी कुल मिलाकर 13–14% से ज़्यादा नहीं हैं।
- सुप्रीम कोर्ट में ब्राह्मण समुदाय का अनुपात उनकी जनसंख्या हिस्सेदारी से कई गुना अधिक रहा है।
जब देश की अदालतें सामाजिक रूप से इतनी एकरूप (homogeneous) हों, तो यह मानना मुश्किल हो जाता है कि वे देश की विविध सामाजिक सच्चाइयों को पूरी तरह समझ पा रही हैं।
डॉ. भीमराव आंबेडकर ने पहले ही चेतावनी दी थी कि अगर संविधान को लागू करने वाली संस्थाएँ सामाजिक रूप से विशेषाधिकार प्राप्त वर्गों के हाथ में रहीं तो संविधान काग़ज़ पर रह जाएगा।
दलित और SC/ST एक्ट: सुरक्षा से संदेह तक
2018 का सुभाष काशीनाथ महाजन मामले में फ़ैसला दलित समाज के लिए एक बड़ा झटका था। सुप्रीम कोर्ट ने SC/ST अत्याचार निवारण क़ानून को यह कहकर कमजोर किया कि इसका “दुरुपयोग” हो रहा है।
अदालत ने यह नहीं देखा कि:
- ज़्यादातर दलित मामलों में FIR दर्ज ही नहीं होती
- सज़ा की दर बहुत कम है
- पीड़ितों को सामाजिक और पुलिस स्तर पर भारी दबाव झेलना पड़ता है
इस फ़ैसले ने यह संदेश दिया कि अदालत को उत्पीड़ित से ज़्यादा चिंता आरोपी की है- जो अक्सर सामाजिक रूप से ताक़तवर होता है। संसद को दख़ल देकर क़ानून बहाल करना पड़ा, लेकिन दलित समाज का भरोसा तब तक हिल चुका था।
आदिवासी, ज़मीन और “विकास” का न्याय
आदिवासियों के मामलों में सुप्रीम कोर्ट का रवैया अक्सर “विकास” के पक्ष में और संविधान के खिलाफ़ दिखता है। वन अधिकार क़ानून में ग्रामसभा की सहमति को कई बार केवल औपचारिकता माना गया। खनन, बांध और सड़क परियोजनाओं में अदालतों ने तेज़ी दिखाई, लेकिन विस्थापन, रोज़गार और जीवन के सवालों पर चुप्पी साध ली। नियमगिरि (वेदांता) मामला एक अपवाद है, जहाँ अदालत ने आदिवासी अधिकारों का सम्मान किया। लेकिन यह इसलिए याद किया जाता है क्योंकि ऐसे फ़ैसले बहुत कम हैं। आज कई आदिवासियों के लिए अदालत एक संरक्षक नहीं, बल्कि उनकी ज़मीन छिनने की मुहर लगाती संस्था बनती जा रही है।
अल्पसंख्यक और न्याय की गिरती उम्मीद
अल्पसंख्यकों का भरोसा सुप्रीम कोर्ट से सबसे ज़्यादा डगमगाया है। हेट स्पीच मामलों में अदालत बार-बार सरकार से “उम्मीद” जताती है, लेकिन सख़्त आदेश नहीं देती। मॉब लिंचिंग, बुलडोज़र कार्रवाई, और चुनिंदा क़ानून लागू करने के मामलों में न्यायिक हस्तक्षेप देर से या बहुत कमज़ोर रहा। कश्मीर में अनुच्छेद 370 हटने के बाद महीनों तक बंद लोगों की सुनवाई देर से हुई। “हम ट्रैवल एजेंट नहीं हैं” जैसी टिप्पणी ने मूल अधिकारों को हल्का बना दिया। जब न्याय समय पर न मिले तो वह न्याय नहीं रहता, वह सिर्फ़ प्रक्रिया बन जाता है।
ज़मानत और जेल: ग़रीबों के लिए क़ानून अलग?
भारत की जेलों में:
- 75% से अधिक कैदी अंडरट्रायल हैं, यानी जिन पर अभी दोष सिद्ध नहीं हुआ।
- गरीब, दलित, आदिवासी और अल्पसंख्यक इन जेलों में ज़्यादा संख्या में हैं।
- क़ानून में ज़मानत नियम है और जेल अपवाद- लेकिन व्यवहार में यह उलटा हो चुका है।
भीमा कोरेगांव मामले में बुज़ुर्ग और बीमार लोग वर्षों तक जेल में रहे। फादर स्टेन स्वामी की हिरासत में मौत न्यायपालिका के लिए एक नैतिक विफलता थी। इसके उलट, राजनीतिक या आर्थिक रूप से ताक़तवर लोगों को ज़मानत अपेक्षाकृत आसानी से मिल जाती है।
यह साफ़ संकेत देता है कि आज़ादी सबके लिए समान नहीं है।
जब अदालत सत्ता की भाषा बोलने लगे
जब अदालतें ‘राष्ट्रविरोधी’, ‘अर्बन नक्सल’, या ‘विकास विरोधी’ जैसे शब्द इस्तेमाल करती हैं तो वे सत्ता की भाषा अपनाती हैं। संविधान अदालत से उम्मीद करता है कि वह सत्ता को रोके, न कि उसकी शब्दावली दोहराए।
विविधता क्यों ज़रूरी है?
सुप्रीम कोर्ट में विविधता कोई “कोटा” नहीं है। यह संवैधानिक ज़रूरत है। दलित, आदिवासी, ओबीसी और अल्पसंख्यक पृष्ठभूमि से आए जज-
- थाने की हकीकत समझते हैं
- ज़मीन छिनने की प्रक्रिया जानते हैं
- जातिगत अपमान का दर्द महसूस करते हैं
बिना इन अनुभवों के न्याय अक्सर किताबों तक सीमित रह जाता है।
संविधान और अदालत के बीच बढ़ती दूरी
जब समाज के बड़े हिस्से यह मानने लगें कि संविधान उनकी आवाज़ नहीं सुनता तो दोष नागरिकों का नहीं होता, दोष संस्थाओं का होता है।
सुप्रीम कोर्ट या तो खुद को कमज़ोर नागरिक का रक्षक बनाएगा, या फिर वह सरकारों, कॉरपोरेट्स और सामाजिक अभिजात वर्ग की सुविधा की अदालत बनकर रह जाएगा।
एक ऐसा संविधान, जो असमानता को तोड़ने के लिए बना हो, उसे ऐसी अदालत नहीं बचा सकती जो उसी असमानता को प्रतिबिंबित करे।