मैं आज SIR मामले में सुप्रीम कोर्ट का फ़ैसला सुनने नहीं गया।
इस मामले में एक लिटिगेंट के तौर पर और एक ऐसे व्यक्ति के तौर पर जिसे कोर्ट में बोलने का सम्मान मिला था, मुझमें उम्मीद, बेचैनी, या कम से कम उत्सुकता होनी चाहिए थी। लेकिन मुझे ऐसा कुछ महसूस नहीं हुआ। इस मामले का फ़ैसला तो बहुत पहले ही हो चुका था। हम तो बस फ़ैसले की लिखित कॉपी और उसकी बारीकियों का इंतज़ार कर रहे थे।
इस मामले की दिशा पिछले साल अगस्त में ही तय हो गई थी। SIR के ख़िलाफ़ तीन दिनों तक दलीलें सुनने के बाद कोर्ट ने SIR की संवैधानिकता की जाँच करने से खुद को हटा लिया और असल में ख़ुद को एक 'उपभोक्ता फ़ोरम' में बदल लिया; जहाँ संवैधानिक सिद्धांतों के बजाय शिकायतों के समाधान और मध्यस्थता पर ज़्यादा ज़ोर दिया गया।
इस मामले का फ़ैसला तो असल में तभी हो गया था जब सुप्रीम कोर्ट ने ECI को यह मामला पहले से तय किए बिना ही बिहार चुनाव जल्दबाज़ी में करवाने की इजाज़त दे दी थी; और SIR के बाद बनी वोटर लिस्ट में मौजूद सबसे बड़ी कमियों को भी ठीक करने को ECI को नहीं कहा था।
जब ECI ने SIR के दूसरे और फिर तीसरे चरण की प्रक्रिया आगे बढ़ाई, तब इस मामले में कुछ ख़ास बचा ही नहीं था; जबकि दूसरी तरफ़ माननीय कोर्ट बड़ी सुस्ती से इसकी संवैधानिकता पर दलीलें सुन रहा था। SIR अब एक ऐसी हकीकत बन चुका था जिसे बदला नहीं जा सकता था। जो थोड़ी-बहुत शंका बची थी, वह भी तब दूर हो गई जब माननीय जजों ने खुले कोर्ट में यह टिप्पणी की कि किसी को भी SIR की प्रक्रिया में रुकावट डालने की इजाज़त नहीं दी जाएगी।
इस याचिका के ताबूत में आख़िरी कील तब ठोकी गई, जब उसी बेंच के सामने एक और याचिका पर सुनवाई चल रही थी; और एक माननीय जज ने टिप्पणी की कि जिन लाखों लोगों को वोट देने के अधिकार से वंचित किया गया है, उन्हें घबराने की ज़रूरत नहीं है, क्योंकि वे अगले चुनाव में वोट दे सकते हैं। उसी पल कोर्ट ने अपनी संवैधानिक ज़िम्मेदारी से पल्ला झाड़ लिया।
कानूनी पेचीदगियों को दरकिनार कर देखें तो सीधी-सी सच्चाई यह है कि एक संवैधानिक लोकतंत्र की सर्वोच्च अदालत ने पहले ही लाखों नागरिकों को उनके मताधिकार से वंचित करने की मंज़ूरी दे दी है- अब तक कम से कम 59 मिलियन (5.9 करोड़) लोग प्रभावित हुए हैं और यह संख्या आख़िरकार 100 मिलियन (10 करोड़) तक पहुँच सकती है।
यह कल्पना से परे था कि कोर्ट अब SIR को असंवैधानिक घोषित करेगा और SIR के बाद हुए सभी चुनावों को रद्द कर देगा। वकील तो बस उस सटीक कानूनी तर्क का इंतज़ार कर रहे थे, जिसके आधार पर उस नतीजे पर पहुँचा गया है जो पहले से ही सबको पता था। इस तरह की कानूनी बाज़ीगरी में मेरी कोई दिलचस्पी नहीं थी। कुछ मित्र उम्मीद लगाए बैठे थे कि अदालत कम से कम अपनी इज्जत तो बचा लेगी, अगर मतदाताओं को नहीं भी बचा पाई। आखिरकार वह भी नहीं हुआ। सभ्य शब्दों को अलग रखें तो सच्चाई यह है कि अदालत ने चुनाव आयोग को मतदाता सूची के साथ मनमानी करने का पूरा खुला अधिकार दे दिया है।
ADR बनाम भारत संघ (2026) हमारे समय के लिए बिल्कुल वैसा ही है जैसा ADM जबलपुर बनाम शिवकांत शुक्ला (1976) हमारे लोकतंत्र पर हुए पिछले हमले के लिए था। हमें उम्मीद करनी चाहिए कि SIR का यह फ़ैसला संविधान की आखिरी दीवार के ढहने की शुरुआत न बन जाए, जैसा कि ADM जबलपुर के फ़ैसले के समय हुआ था। हमें यह विश्वास रखना होगा कि एक दिन संविधान के रक्षक द्वारा संविधान के प्रति दिखाई गई इस उदासीनता को उसके असली रूप में पहचाना जाएगा। और उसे उलट दिया जाएगा।
(योगेंद्र यादव के एक्स पोस्ट से साभार)