मज़दूरों की नाराजगी जगह जगह दिखने की खबरें पिछले दो महीने से कम समय में लगातार आ रही थीं लेकिन बैसाखी के दिन जब नोएडा में करीब पचास हजार मजदूर अपने काम छोड़कर सड़कों पर आ गए तो राष्ट्रीय राजमार्ग समेत सारा नोएडा थम गया। एक दो जगह पुलिस से हिंसक झड़प भी हुई और सरकार ने तुरंत मजदूरों से बातचीत के लिए एक उच्च स्तरीय कमेटी बना दी। चूंकि राजधानी के लगभग सारे मीडिया हाउस नोएडा पहुँच गए हैं, इसलिए पहली बार मजदूरों के आंदोलन की ख़बरें भी दिखीं – यह जरूर है कि मजदूरों की नाराजगी या उनकी मांगों जितना ही महत्व ट्रैफिक थमने से हुई आम लोगों की परेशानी की खबर को मिला।

मज़दूर प्रोटेस्ट की वजह

यह प्राय: हर मजदूर और किसान आंदोलन के समय होता है और बाबुओं का आंदोलन अब होता नहीं, पार्टियों की रैली भी रुक ही गई है। खैर। नोएडा के मजदूरों की मांग थी कि उनको हरियाणा द्वारा हाल में दिए न्यूनतम मजदूरी के बराबर मजदूरी मिले। हरियाणा ने पिछले दिनों 14000 रुपये न्यूनतम मासिक वेतन को बढ़ाकर 19000 रुपए कर दिया है जो पहली अप्रैल से लागू होगा। उत्तर प्रदेश में अभी यह मात्र 13000 रुपये है। और मजदूर आंदोलन की स्थिति यह है कि सरकार द्वारा नियुक्त अधिकारियों की कमेटी को मजदूरों का प्रतिनिधि ढूँढना भारी पड़ रहा है क्योंकि किसी फैक्टरी में शायद ही यूनियन बनी हुई है।
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अब यहां तक की बात तो सामान्य ढंग वाली है और राज्य सरकार की तुरंत की गई कार्रवाई- जांच कमेटी बैठाना, भी उचित मानी जा सकती है। लेकिन तभी राज्य के मुखिया योगी आदित्यनाथ ने पास के मुजफ्फरनगर में विकास की 423 परियोजनाओं का एक साथ उद्घाटन करते हुए ऐसी बात कर दी जो उनकी मंशा से लेकर जांच कमेटी बैठाने के फैसले तक को सवालिया निशान के घेरे में ला देता है। उन्होंने कहा कि देश से नक्सलवाद समाप्त होने के कगार पर है। नोएडा जैसी घटनाएं उसे जिंदा करने का प्रयास हो सकती हैं। अब जब मुख्यमंत्री का नजरिया यह है तो अधिकारियों का क्या होगा यह समझा जा सकता है। वे क्या करेंगे यह अंदाजा भी पहले दिन लग जाता है।

हरियाणा से न्यूनतम वेतन कम क्यों?

करीब पचास हजार मजदूर उस दिन सड़कों पर निकले थे और सिर्फ दो जगह झड़प हिंसक हुई। बिना नेतृत्व वाले आंदोलन के लिए यह काफी बड़ी बात थी। और मुख्यमंत्री को अपने प्रदेश के औद्योगिक मजदूरों का न्यूनतम वेतन नहीं मालूम हो यह संभव नहीं है। उनको यह भी मालूम होगा कि यह हरियाणा से ही नहीं, दिल्ली से भी काफी कम है। और अगर आपके प्रदेश ही नहीं, पूरी हिन्दी पट्टी में आज नोएडा विकास का इंजन माना जाता है तो उस पर तो सुविधाओं की बारिश होनी चाहिए। आज उत्तर प्रदेश में राजस्व के मामले में भी नोएडा नंबर वन बना हुआ है।

इसकी हालत कितनी बुरी है, इसका अंदाजा एक दिन की हड़ताल और ट्रैफिक की तकलीफ से नहीं लगाया जा सकता। अगर नोएडा और आसपास के गांवों में छह-सात मंजिल वाले अनधिकृत ‘मजदूर निवास’ न होते तो इतनी कम कमाई पर मजदूरों का रह पाना भी मुश्किल होता।

मज़दूरों की बेहद दयनीय स्थिति

ये सारे आवास दुर्घटनाओं को तो आमंत्रित करते ही हैं रोज हर काम के लिए ऊपर नीचे आने के लिए सीढ़ियां चढ़ना भी मजदूरों की आठ घंटे की ड्यूटी जितना श्रम ही लेता है। और कहीं आठ घंटे का ही काम होता हो ऐसे ठिकाने भी कम ही हैं। सारे लेबर लॉ सिर्फ संहिता में ही नहीं बदले हैं उन्हें लागू कराना सरकार ने अपना जिम्मा मानना बंद कर दिया है। और इन मजदूरों-मजदूरनियों के आने जाने वाला जो क्लासिकल टेम्पो यहां चलता है और उसमें जिस तरह मजदूर भरे और लटकाए जाते हैं वह देखकर किसी मीडिया वाले को ध्यान नहीं आता कि यह भी ट्रैफिक और ट्रांसपोर्ट का मामला है-अधिकारी तो टेम्पो वालों से कमाई भी कर लेते हैं। सबसे खराब क्वालिटी के और फटे पुराने जूते चप्पल में सुबह शाम या अंधेरे में चलते हजारों मजदूरों को ढंग का फुटपाथ भी नसीब नहीं है। इन मजदूरों को कहीं पच्चीस तीस रुपये तक में पेट भरने लायक भोजन मिल जाए इसका एक भी इंतजाम नोएडा में नहीं मिलता। नाले किनारे सबसे गंदी जगह में ठेले वाले कैसे दस रुपए और पंद्रह रुपए प्लेट पूरी या भटूरे परोस सकते हैं, यह अचरज देखना हो तो नोएडा आइये। और दुर्घटना हो तो एक सीजीएचएस अस्पताल के अलावा कोई सरकारी इंतजाम नहीं है। नोएडा की कहानी बहुत बड़ी है।
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मजदूरों के आंदोलन क्यों?

पर यह शायद सभी औद्योगिक नगरों की कहानी है। जिस मानेसर आंदोलन के चार दिन बाद नोएडा में आंदोलन फूटा वहां भी मजदूरों के आंदोलन के बाद दस साल की अवधि बीतने पर मजदूरी रिवाइज हुई थी। आखिरी बार अक्टूबर 2014 में रिवीजन हुआ था। उससे पहले बिहार के बरौनी में दो फरवरी को मजदूरों ने न्यूनतम वेतन में बढ़ोत्तरी और आठ घंटे की ड्यूटी के लिए आंदोलन किया तो पुलिस ने भारी दमन किया। 23 फरवरी को इंडियन ऑयल की पानीपत रिफाइनरी के 30 हज़ार कैजुअल मजदूरों ने आंदोलन किया था। वह आंदोलन भी हिंसक हो गया था। मार्च में हरियाणा के ही मानेसर में ऐसा आंदोलन हुआ। फिर 27 फरवरी को हजीरा, सूरत में लारसन ऐंड टूब्रो के ठेका मजदूरों ने ऐसा ही आंदोलन किया। कंपनी आरसेलर मित्तल निप्पॉन स्टील का काम ऊंचे दाम पर कर रही है लेकिन मजदूरों को सुविधाएं देने में कंजूसी करती है। यह कहा जा सकता है कि एक को देखकर दूसरी जगह के मजदूर आंदोलित हो रहे हैं। लेकिन तात्कालिक वजह अचानक बढ़ती कीमतें भी होंगी, खासकर रसोई गैस की किल्लत।
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वैसे, न्यूनतम मजदूरी की बात सरकारें भूल गई हैं, खासकर कथित उदारीकरण आने के बाद से। और खुद प्रधानमंत्री ने जब एक बड़ी योजना घोषित की तो वहां भी न्यूनतम से कम मजदूरी की बात ही थी। ऐसे में अधिकारी भूल जाएं तो कौन सा गुनाह। मजदूर कानून उदारीकरण के निशाने पर रहा है। वे हायर ऐंड फायर चाहते हैं लेकिन न्यूनतम मजदूरी भी नहीं देना चाहते। मजदूरों के मामले में अगर सरकारें नहीं सक्रिय हैं तो सारा का सारा विपक्ष भी हाथ पर हाथ धरे बैठ गया है, सारे मजदूर संगठन सिर्फ चन्दा खाने का उपकरण बन गए हैं। जब से भारतीय मजदूर संघ सबसे बड़ा यूनियन बना है तब से आंदोलन की बात दूर हो गई है। मजदूर लाल झंडे से जितना नहीं डरते यूनियन उससे ज्यादा डरती है। इसीलिए जब नोएडा आंदोलन होता है तो मुख्यमंत्री को घर सुधारने की जगह नक्सली सुधारने की याद आती है।