अमित शाह ने सोनिया गांधी पर स्वतंत्रता दिवस समारोह के दौरान 'वंदे मातरम' का अपमान करने का आरोप लगाया है। जवाब में कांग्रेस ने कहा, 'डॉ. आंबेडकर का अपमान करने वाला आदमी अपने साहिब की भारी विफलताओं से ध्यान भटकाने के लिए कांग्रेस से माफी की मांग कर रहा है।'
केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने स्वतंत्रता दिवस समारोह के दौरान कांग्रेस नेता सोनिया गांधी पर वंदे मातरम का अपमान करने का आरोप लगाया और उनसे देश से माफी मांगने की मांग की। वहीं कांग्रेस ने इन आरोपों को खारिज करते हुए पलटवार किया और कहा कि बीजेपी असली मुद्दों से ध्यान भटकाने की कोशिश कर रही है। उन्होंने कहा कि 'जिस विचारधारा ने जनवरी 2002 तक अपने मुख्यालय पर तिरंगा फहराना भी जरूरी नहीं समझा वही आज राष्ट्रवाद का पाठ पढ़ा रही है'।
कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने अमित शाह का बिना नाम लिए कहा, 'एक ऐसा आदमी, जिसने 17 दिसंबर 2024 को राज्यसभा में डॉ. आंबेडकर का अपमान किया। एक ऐसा आदमी, जो उस विचारधारा से आता है जिसने जनवरी 2002 तक अपने मुख्यालय पर तिरंगा फहराना भी उचित नहीं समझा। एक ऐसा आदमी, जो शांतिपूर्ण तरीके से प्रदर्शन कर रहे युवाओं पर दिल्ली पुलिस की बर्बरता के लिए सीधे जिम्मेदार है। अब वही आदमी आज के असली मुद्दों और अपनी तथा अपने साहिब की भारी विफलताओं से ध्यान भटकाने के लिए कांग्रेस से माफी की मांग कर रहा है।'
बता दें कि संविधान के 75 साल पूरे होने पर राज्यसभा में चर्चा के दौरान अमित शाह ने कहा था, 'अभी एक फैशन हो गया है… आंबेडकर, आंबेडकर, आंबेडकर, आंबेडकर, आंबेडकर, आंबेडकर। इतना नाम अगर भगवान का लेते तो सात जन्मों तक स्वर्ग मिल जाता।' विपक्ष ने इसे बाबासाहेब आंबेडकर का अपमान बताया था। उन्होंने शाह के इस्तीफे और माफी की मांग की, विशेषाधिकार नोटिस भी दिया था।
बहरहाल, जयराम रमेश ने यह बयान तब जारी किया जब राजस्थान के चित्तौड़गढ़ में पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की प्रतिमा के अनावरण कार्यक्रम में अमित शाह ने कांग्रेस पर बड़ा हमला बोला। उन्होंने कहा कि आजादी की लड़ाई में लाखों लोगों ने 'वंदे मातरम' का नारा लगाते हुए फांसी के फंदे को चूमा, गोलियां खाईं, लाठियां झेलीं और वर्षों तक जेल में रहे। लेकिन कांग्रेस ने वोट बैंक की राजनीति के कारण इस गीत का सम्मान करना छोड़ दिया। शाह ने आरोप लगाया कि स्वतंत्रता दिवस पर कांग्रेस मुख्यालय में वंदे मातरम गाया जा रहा था, तभी सोनिया गांधी ने कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे से गीत रोकने के लिए कहा।
उन्होंने कहा, '140 करोड़ देशवासी आपको देख रहे हैं। आपने जो पाप किया है, देश की जनता उसे कभी माफ नहीं करेगी। अगर कांग्रेस में थोड़ी भी शर्म बची है तो सोनिया गांधी को हाथ जोड़कर बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय और देश की जनता से माफी मांगनी चाहिए।'
विवाद कैसे शुरू हुआ?
बीजेपी ने शनिवार को आरोप लगाया था कि कांग्रेस मुख्यालय में स्वतंत्रता दिवस समारोह के दौरान सोनिया गांधी ने वंदे मातरम का पूरा गायन रोकने का निर्देश दिया। इसके बाद बीजेपी नेताओं ने इसे राष्ट्रगान और स्वतंत्रता आंदोलन की भावना का अपमान बताया। दूसरी ओर कांग्रेस का कहना है कि न तो गीत रोका गया और न ही उसका अपमान हुआ। पार्टी के मुताबिक, यह विवाद केवल राजनीतिक लाभ लेने के उद्देश्य से खड़ा किया गया है।
कांग्रेस ने आरोपों को बताया झूठा
कांग्रेस ने अमित शाह के आरोपों को पूरी तरह खारिज कर दिया। कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश ने कहा कि बीजेपी इस पूरे मामले को ग़लत तरीक़े से पेश कर रही है। उन्होंने बताया कि 'अक्टूबर 1937 में कोलकाता में हुई कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक में, जिसमें महात्मा गांधी समेत कई वरिष्ठ नेता मौजूद थे, यह निर्णय लिया गया था कि कांग्रेस के कार्यक्रमों में वंदे मातरम गाया जाएगा।' उन्होंने कहा कि रवींद्रनाथ टैगोर ने पंडित जवाहरलाल नेहरू को सुझाव दिया था कि कार्यक्रमों में वंदे मातरम की शुरुआती पंक्तियां गाई जाएं और तभी से कांग्रेस की यही परंपरा रही है।सोनिया ने खड़गे के लिए कुर्सी लाने को कहा था: कांग्रेस
जयराम रमेश के अनुसार, इस बार स्वतंत्रता दिवस समारोह में भी वंदे मातरम का पूरा संस्करण प्रस्तुत किया गया। उन्होंने कहा, 'गीत रोकने जैसी कोई बात नहीं हुई। मल्लिकार्जुन खड़गे काफी देर से खड़े थे। सोनिया गांधी ने केवल उनके लिए एक कुर्सी लाने को कहा था। बीजेपी इस घटना को तोड़-मरोड़कर पेश कर रही है।'
इस मुद्दे पर बीजेपी और कांग्रेस आमने-सामने आ गई हैं। बीजेपी इसे राष्ट्र सम्मान का मामला बता रही है, जबकि कांग्रेस का आरोप है कि सरकार और बीजेपी वास्तविक मुद्दों से जनता का ध्यान हटाने के लिए इस तरह के विवाद खड़े कर रही हैं। फिलहाल दोनों दल अपने-अपने दावों पर कायम हैं और यह मामला राजनीतिक बहस का नया विषय बन गया है।
वंदे मातरम पर बीजेपी-कांग्रेस में क्या मतभेद?
वंदे मातरम पर बीजेपी और कांग्रेस के बीच विवाद वंदे मातरम के पहले दो स्टैंजा बनाम पूरा गाने को लेकर रहा है। यह विवाद मुख्य रूप से 1937 के कांग्रेस वर्किंग कमेटी के फैसले से जुड़ा है। यह गीत बंकिम चंद्र चटर्जी के उपन्यास आनंदमठ (1882) से लिया गया है। इसमें कुल छह स्टैंजा हैं। पहले दो स्टैंजा मातृभूमि की प्राकृतिक सुंदरता, समृद्धि, नदियों, खेतों और खुशहाली का वर्णन करते हैं। इनमें कोई स्पष्ट धार्मिक देवी-देवताओं का जिक्र नहीं है। ये ही स्वतंत्रता संग्राम में सबसे ज्यादा गाए गए और लोकप्रिय हुए। बाद के स्टैंजा में हिंदू देवी-देवताओं का उल्लेख है। कुछ पंक्तियाँ मातृभूमि को देवी के रूप में प्रस्तुत करती हैं। कुछ संदर्भ आनंदमठ के कथानक से जुड़े हैं, जिसमें संन्यासी विद्रोह का जिक्र है।
अक्टूबर 1937 में कोलकाता में कांग्रेस वर्किंग कमेटी की बैठक हुई। इसमें महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू, सरदार पटेल, सुभाष चंद्र बोस, मौलाना अबुल कलाम आजाद, राजेंद्र प्रसाद आदि शामिल थे। रवींद्रनाथ टैगोर की सलाह पर यह तय हुआ कि राष्ट्रीय समारोहों में केवल पहले दो स्टैंजा ही गाए जाएँगे। कारण बताया गया कि स्वतंत्रता आंदोलन में हिंदू-मुस्लिम एकता ज़रूरी है और ऐसे में किसी एक धर्म के गीत को इस्तेमाल करने पर ऐसी एकता नहीं आ पाएगी। धर्मनिरपेक्षता का भी तर्क दिया गया। इसलिए पहले दो स्टैंजा अलग और सर्वमान्य हैं। स्वतंत्रता के बाद 1950 में संविधान सभा ने भी इन्हीं दो स्टैंजा को राष्ट्रीय गीत का दर्जा दिया। बीजेपी आरोप लगाती है कि कांग्रेस ने ऐसा तुष्टिकरण के लिए किया। कांग्रेस का ऐतिहासिक और मौजूदा रुख यही है कि यह फैसला तुष्टिकरण नहीं, बल्कि समावेशिता और एकता के लिए था। विविध धर्मों वाले देश में राष्ट्रीय प्रतीक को सभी के लिए स्वीकार्य बनाना जरूरी था। इसका कहना रहा है कि गांधी, टैगोर, नेहरू, पटेल जैसे नेताओं का समर्थन था। यह 'कमजोरी' नहीं, बल्कि दूरदर्शिता थी।