झारखंड में राज्यसभा चुनाव के नतीजों के बाद विपक्षी इंडिया गठबंधन में आपसी भरोसे पर ही बहस छिड़ गई है। सीपीआईएमएल ने कांग्रेस उम्मीदवार प्रणव झा की हार को लेकर लगाए गए उसके आरोपों पर विरोध जताया है। सीपीआईएमएल लिबरेशन के महासचिव दीपांकर भट्टाचार्य ने कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे को पत्र लिखा है। उन्होंने कांग्रेस के आरोपों को बिल्कुल झूठा और दुर्भावनापूर्ण बताया और कहा कि इन्हीं वजहों से इंडिया गठबंधन में भरोसा टूट रहा है।

कांग्रेस ने अपने उम्मीदवार की हार के लिए सहयोगी दलों आरजेडी और सीपीआईएमएल लिबरेशन पर क्रॉस वोटिंग का आरोप लगाया था और इसी पर सीपीआईएमएल ने कड़ा विरोध जताया है। दीपांकर भट्टाचार्य ने लिखा, 'हम हैरान हैं कि कांग्रेस हमारे झारखंड के दो विधायकों पर प्रणव झा की हार का ठीकरा फोड़ रही है। यह सच नहीं है। हमारे दोनों विधायकों ने विपक्षी विधायकों की बैठक में तय योजना के अनुसार प्रणव झा को वोट दिया। हमारे पोलिंग एजेंटों ने वोट डाले जाने से पहले इसकी पुष्टि भी की थी।'
भट्टाचार्य ने आगे कहा कि कांग्रेस के नेताओं को सहयोगी दलों पर बिना सबूत के आरोप लगाना बंद करना चाहिए, क्योंकि इससे गठबंधन के बीच विश्वास टूट रहा है। दीपांकर ने कहा कि सीपीआईएमएल इंडिया गठबंधन का एक सच्चा और समर्पित साथी है और बिहार-झारखंड दोनों जगह उसने हमेशा विपक्षी उम्मीदवारों को वोट दिया है।
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झारखंड राज्यसभा चुनाव में क्या हुआ?

झारखंड विधानसभा में कुल 81 सदस्य हैं। राज्यसभा की एक सीट जीतने के लिए 28 वोट ज़रूरी थे। जेएमएम उम्मीदवार बैद्यनाथ राम को 30 वोट मिले और वह जीत गए। एनडीए समर्थित निर्दलीय उम्मीदवार परिमल नाथवानी को 30 वोट मिले और वह भी जीत गए। कांग्रेस उम्मीदवार प्रणव झा को सिर्फ 21 वोट मिले। इंडिया गठबंधन के पास कुल 56 विधायक थे। अगर सब वोट सही ढंग से पड़ते तो दोनों सीटें गठबंधन के पास आ जातीं।

कांग्रेस ने क्या लगाया था आरोप

कांग्रेस ने आरोप लगाया कि आरजेडी के 4 विधायकों और सीपीआईएमएल के 2 विधायकों ने प्रणव झा को वोट नहीं दिया। झारखंड कांग्रेस प्रभारी के. राजू ने इसे 'गठबंधन के साथ धोखा' बताया और बीजेपी पर हॉर्स ट्रेडिंग का आरोप लगाया।

आरजेडी का बचाव

आरजेडी के राष्ट्रीय महासचिव भोला यादव ने कहा कि उनके सभी 4 विधायकों ने प्रणव झा को ही वोट दिया। उन्होंने कहा, 'लालू प्रसाद यादव और तेजस्वी यादव के निर्देश पर सभी चारों विधायकों ने इंडिया उम्मीदवार को वोट दिया। मैं खुद ऑब्जर्वर था और मैंने अपनी आँखों से देखा है।'

गठबंधन में विश्वास की कमी?

झारखंड में राज्यसभा चुनाव में कांग्रेस उम्मीदवार की हार के बाद इंडिया गठबंधन के सहयोगी दलों में ही आरोप-प्रत्यारोप लग रहे हैं। यह विवाद INDIA गठबंधन में बढ़ते अविश्वास को दिखाता है। हाल ही में तमिलनाडु में कांग्रेस के डीएमके से अलग होकर टीवीके के साथ गठबंधन करने पर भी सहयोगी दलों में नाराज़गी देखी गई थी। दीपांकर भट्टाचार्य ने खड़गे को लिखे अपने पत्र में कहा है- 'सहयोगी दलों पर बिना जांच के आरोप लगाना बंद करें, जो गठबंधन के विश्वास को कमजोर करता है।'

इंडिया गठबंधन के अंदर आरोप-प्रत्यारोप जारी है। कांग्रेस ने आंतरिक जाँच की बात कही है, जबकि सीपीआईएमएल और आरजेडी ने अपने विधायकों के वोट कांग्रेस उम्मीदवार को देने की पुष्टि की है। इस पूरे मामले से विपक्षी गठबंधन की एकता पर सवाल उठने लगे हैं।

वैसे, इंडिया गठबंधन में यह रार कोई नयी बात नहीं है। 2024 लोकसभा चुनाव के बाद से लगातार इसकी ख़बरें आ रही हैं और 2026 के चुनावी नतीजों के बाद यह खुलकर सामने आ गई है। सपा, आरजेडी, टीएमसी और डीएमके जैसे क्षेत्रीय दल समय समय पर आरोप लगाते रहे हैं कि कांग्रेस उन्हें गंभीरता से नहीं लेती, सीट बंटवारे में स्वार्थ रखती है और राज्य स्तर पर उन्हें कमजोर करने की कोशिश करती है। उनका यह भी आरोप रहता है कि वह 'बड़ी पार्टी' वाली मानसिकता दिखाती है।

डीएमके गठबंधन से बाहर

तमिलनाडु में कांग्रेस ने डीएमके को छोड़कर विजय की पार्टी टीवीके का साथ दिया। डीएमके ने इसे 'धोखा' माना। डीएमके अब इंडिया गठबंधन की बैठक में भी नहीं आती है और कांग्रेस-राहुल गांधी पर खुलकर हमला कर रही है।
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दूसरे राज्यों में भी कांग्रेस की सहयोगी पार्टियों से ठीक नहीं बन रही है। केरल में कांग्रेस और लेफ्ट के बीच तनातनी है। समय-समय पर दोनों तरफ़ से ऐसे बयान आ रहे हैं जिसमें रार साफ़ दिखती है। पंजाब में भी कांग्रेस और आप के बीच पहले ऐसी ही स्थिति दिखती रही थी। बहरहाल, आप अब इंडिया गठबंधन से बाहर है और उसने अपना अलग रास्ता चुन लिया है। बिहार में नीतीश साथ छोड़ ही चुके हैं। यूपी और बिहार में कांग्रेस की सपा और आरजेडी के साथ उतनी बड़ी रार तो सामने नहीं आई है, लेकिन कभी कभी मनमुटाव की ख़बरें आ जाती हैं।

कई बार क्षेत्रीय पार्टियाँ कांग्रेस की केंद्रीय भूमिका पर सवाल उठा चुकी हैं। क्षेत्रीय दल कांग्रेस को 'बड़े भाई' के बजाय समान भागीदार मानना चाहते हैं। गठबंधन में कोई मजबूत कन्वीनर या साझा कार्यक्रम नहीं है, सिर्फ बीजेपी विरोधी नारा है। चुनावी हारों ने असंतोष बढ़ा दिया है। हर पार्टी अपनी हार का ठीकरा दूसरे पर फोड़ रही है। झारखंड राज्यसभा चुनाव में भी यही हो रहा है।