महाराष्ट्र में बीजेपी महायुति सहयोगियों शिवसेना और एनसीपी से रिश्ते सुधारने में जुट गई है। राहुल गांधी के पुणे में छात्रों की गूंज कार्यक्रम के बाद देवेंद्र फडणवीस ने समन्वय बैठक बुलाई। वादों को निभाने का भरोसा दिया गया। क्या यह दूरियाँ मिटाने की पहल नहीं है?
राहुल गांधी और देवेंद्र फडणवीस
पुणे में राहुल गांधी के छात्रों की गूंज कार्यक्रम के बाद क्या बीजेपी और महायुति की रणनीति में बड़ा बदलाव हो गया है? महायुति की जिन बैठकों में गठबंधन सहयोगियों और इनके नेताओं में मनमुटाव की ख़बरें आती रही थीं, वहीं अब महायुति गठबंधन की एकजुटता चर्चा का विषय बन गई है। बीजेपी ने अपने सहयोगी दलों शिवसेना और एनसीपी के साथ रिश्ते मज़बूत करने की दिशा में कदम बढ़ाए हैं। मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने सोमवार को महायुति समन्वय समिति की बैठक बुलाई, जिसमें उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे और सुनेत्रा पवार समेत तीनों दलों के वरिष्ठ नेता शामिल हुए। रिपोर्ट है कि गठबंधन में किए गए वादों को निभाने का भरोसा दिया गया। बेहतर समन्वय की बात की गई। युवाओं और जेन ज़ी में बढ़ती नाराजगी से निपटने के तौर-तरीक़ों पर चर्चा हुई।
महायुति में यह पहल तब हुई है जब कांग्रेस नेता राहुल गांधी के पुणे में आयोजित 'छात्रों की गूंज' कार्यक्रम को बड़ी संख्या में युवाओं का समर्थन मिला। राहुल गांधी द्वारा मुद्दे उठाए जाने के बाद जिस तरह से बीजेपी नेता उनपर टूट पड़े उसको बीजेपी पर राहुल गांधी के असर के तौर पर देखा जा रहा है। माना जा रहा है कि छात्रों की गूंज कार्यक्रम के बाद बीजेपी ने राज्य में बदलते राजनीतिक माहौल और युवाओं के बीच बढ़ रही नाराजगी को गंभीरता से लिया है। द इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार एक सूत्र ने कहा, 'इस वजह से बीजेपी ने युवा पीढ़ी के बीच उनकी बढ़ती लोकप्रियता पर ध्यान दिया है।'
अब नियमित होंगी समन्वय समिति की बैठकें
राहुल गांधी के असर से जोड़कर इस बैठक को इसलिए देखा जा रहा है क्योंकि इसमें कई चीजें पहली बार हुईं। बैठक के बाद यह फ़ैसला लिया गया कि महायुति की समन्वय समिति की बैठकें अब नियमित रूप से होंगी। गठबंधन के सभी सहयोगी दलों से सरकार के प्रशासनिक और नीतिगत फ़ैसलों पर चर्चा की जाएगी और चुनाव के दौरान किए गए वादों को पूरा करने की दिशा में मिलकर काम किया जाएगा।
अब तक यह समिति मुख्य रूप से चुनावों में सीटों के बंटवारे जैसे मुद्दों तक सीमित रहती थी, लेकिन इस बार इसका दायरा बढ़ाकर सरकार के कामकाज और गठबंधन के अंदर बेहतर तालमेल तक कर दिया गया है। राजस्व मंत्री और समन्वय समिति के प्रमुख चंद्रशेखर बावनकुले ने बताया कि तीनों दलों ने यह तय किया है कि अब कोई भी नेता या मंत्री सार्वजनिक रूप से अपने सहयोगी दलों की आलोचना नहीं करेगा। उन्होंने कहा कि गठबंधन को मजबूत बनाए रखने के लिए सभी दलों को आपसी मतभेद सार्वजनिक मंच पर लाने से बचना होगा।
171 सरकारी निगमों में नियुक्तियां, असंतोष दूर?
रिपोर्ट के अनुसार बैठक में यह भी फ़ैसला हुआ कि राज्य के 171 सरकारी निगमों और बोर्डों में लंबित राजनीतिक नियुक्तियां अगले एक महीने के भीतर पूरी कर दी जाएंगी। इन नियुक्तियों को लेकर लंबे समय से गठबंधन के भीतर असंतोष था।
2024 विधानसभा चुनाव के बाद यह मामला टाल दिया गया था क्योंकि सरकार को आशंका थी कि जिन नेताओं को पद नहीं मिलेगा, वे नाराज़ हो सकते हैं। अब तय किया गया है कि गठबंधन के तीनों दलों के कार्यकर्ताओं और नेताओं को उनकी राजनीतिक ताकत के हिसाब से जिम्मेदारियां दी जाएंगी। द इंडियन एक्सप्रेस ने सूत्रों के हवाले से ख़बर दी है कि इन नियुक्तियों में बीजेपी को सबसे बड़ा हिस्सा मिलेगा, जबकि शिवसेना और एनसीपी को क्रमशः 30 और 20 प्रतिशत हिस्सेदारी मिल सकती है।
स्थानीय निकाय चुनाव भी साथ लड़ेंगे
महायुति ने यह भी तय किया है कि पंचायत से लेकर नगर निकायों तक के सभी स्थानीय चुनाव तीनों दल मिलकर लड़ेंगे। इस फ़ैसले को विपक्ष के बढ़ते दबाव के बीच गठबंधन की मजबूती दिखाने की कोशिश माना जा रहा है।
बीजेपी की क्या मजबूरी है?
विधानसभा में बीजेपी के पास 132 विधायक हैं और निर्दलीय तथा छोटे दलों के समर्थन से वह बहुमत के आँकड़े तक पहुँच सकती है। यानी बिना शिवसेना और एनसीपी के ही उसके पास बहुमत है। इसके बावजूद बीजेपी ने सहयोगियों के साथ रिश्ते सुधारने की पहल की है। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि केवल संख्या बल से सरकार चलाना आसान नहीं होता। स्थिर और मजबूत गठबंधन भी उतना ही जरूरी होता है।'बीजेपी अब समझ गई साथ चलने की जरूरत'
शिवसेना के एक मंत्री ने द इंडियन एक्सप्रेस से नाम न छापने की शर्त पर कहा कि विधानसभा चुनाव जीतने के बाद बीजेपी काफी आत्मविश्वास में थी और 2029 का चुनाव अकेले लड़ने की बातें भी कर रही थी। उन्होंने कहा कि अब कांग्रेस की बढ़ती सक्रियता और युवाओं के बीच नए राजनीतिक माहौल को देखकर बीजेपी को एहसास हुआ है कि सहयोगियों को साथ लेकर चलना जरूरी है। उनके मुताबिक, गठबंधन में सभी दलों की भूमिका को स्वीकार करना समय की मांग है।
एनसीपी ने मांगा वित्त मंत्रालय
बैठक में एनसीपी ने सरकार में अपनी भूमिका बढ़ाने की मांग भी दोहराई। पार्टी के एक वरिष्ठ मंत्री ने कहा कि दिवंगत अजित पवार के निधन के बाद वित्त मंत्रालय मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस के पास है, जबकि यह विभाग पहले एनसीपी के पास था। रिपोर्ट के अनुसार उन्होंने कहा कि गठबंधन धर्म के तहत वित्त विभाग फिर से एनसीपी को मिलना चाहिए।
बैठक में जिला स्तर पर विकास निधि के वितरण को लेकर भी सहमति बनी। तय किया गया कि जिला योजना की लगभग 70 प्रतिशत राशि स्थानीय विधायकों को मिलेगी, जबकि शेष 30 प्रतिशत राशि का वितरण संबंधित जिले के पालक मंत्री गठबंधन सहयोगियों के बीच करेंगे। यह मुद्दा भी पिछले कुछ महीनों से एनसीपी और शिवसेना के विधायकों के बीच असंतोष का कारण बना हुआ था।सरकार की साझा जिम्मेदारी पर जोर
रिपोर्ट के अनुसार बीजेपी नेताओं का कहना है कि गठबंधन सरकार में किसी एक दल को सफलता या असफलता का श्रेय या जिम्मेदारी नहीं दी जा सकती है। उनके अनुसार, यदि किसी विभाग में कमी रहती है तो उसकी जिम्मेदारी पूरे गठबंधन की होगी, न कि केवल उस दल की जिसके पास संबंधित मंत्रालय है।
राजनीतिक सूत्रों का मानना है कि राहुल गांधी के 'छात्रों की गूंज' कार्यक्रम में बड़ी संख्या में युवाओं की भागीदारी ने बीजेपी को नई रणनीति अपनाने के लिए मजबूर किया है। इसके अलावा छात्र आंदोलनों, रोजगार, शिक्षा और मराठा आरक्षण जैसे मुद्दों पर बढ़ते दबाव को देखते हुए बीजेपी अब महायुति को अधिक संगठित और सक्रिय बनाए रखना चाहती है। महाराष्ट्र में विपक्ष लगातार सरकार को शिक्षा, रोजगार, आरक्षण और प्रशासनिक मुद्दों पर घेर रहा है। ऐसे में नियमित समन्वय बैठकों, लंबित राजनीतिक नियुक्तियों को पूरा करने और सहयोगी दलों की नाराजगी दूर करने की कोशिश को आगामी राजनीतिक चुनौतियों से पहले गठबंधन को मजबूत करने की रणनीति माना जा रहा है।