राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के प्रमुख मोहन भागवत और प्रख्यात उद्योगपति कुमार मंगलम बिड़ला ने नागपुर में एक कार्यक्रम में देश की आर्थिक और वैश्विक चुनौतियों पर चर्चा की। लेकिन इस कार्यक्रम में मोहन भागवत की टिप्पणी पूरे देश में चर्चा का विषय बन गई है। मोहन भागवत ने कहा कि "भारत अभी पूरी तरह से विश्वगुरु नहीं बना है, क्योंकि हमारी तैयारी अभी अधूरी है।" संघ प्रमुख का यह बयान ऐसे समय आया है जब भारत तमाम तरह की चुनौतियों से जूझ रहा है। दूसरी तरफ मोदी सरकार कह रही है कि हमारी अर्थव्यवस्था बहुत मजबूत है और हम चुनौतियों का सामना कर सकते हैं।
उद्योगपति बिड़ला की टिप्पणी पर क्या बोले भागवत
आशुतोष ने कहा कि सबसे पहले तो हमें यह समझना होगा कि दरअसल यह बयान आया कहां से है। आरएसएस का जो वार्षिक ट्रेनिंग प्रोग्राम (सत्र) होता है, उस ट्रेनिंग प्रोग्राम के दौरान मोहन भागवत ने यह बात कही है। और यह बात उन्होंने तब कही, जब इस कार्यक्रम के मुख्य अतिथि (चीफ गेस्ट) मशहूर उद्योगपति कुमार मंगलम बिड़ला थे।
कुमार मंगलम बिड़ला ने अपने भाषण में बिना किसी का नाम लिए या बिना किसी सीधे इशारे के, बहुत स्पष्ट तौर पर कहा कि दुनिया इस वक्त बहुत तेजी के साथ बदल रही है। उन्होंने अमेरिका के एक भविष्यवक्ता (Futurest) का हवाला देते हुए कहा कि अगले 100 साल में होने वाला बदलाव हम अगले 10 साल के अंदर ही देख सकते हैं। यानी दुनिया में बदलाव की रफ्तार बहुत तेज है। वह मुख्य रूप से आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) के बारे में बातचीत कर रहे थे। उसी संदर्भ में उन्होंने इशारों-इशारों में भारत की मौजूदा तैयारियों के ऊपर एक टिप्पणी की। उनका स्पष्ट मतलब यह था कि दुनिया में जिस तरह के बदलाव हो रहे हैं, भारत शायद अभी उन परिस्थितियों का सामना करने के लिए पूरी तरह तैयार नहीं हैं।
मोहन भागवत की टिप्पणी क्या मोदी सरकार पर है
आशुतोष ने कहा कि कुमार मंगलम बिड़ला के इसी भाषण के बाद मोहन भागवत ने जो अपना वक्तव्य दिया, वह एक तरीके से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की इस वक्त की स्थिति, उनकी नीतियों और तैयारियों पर बहुत तीखी टिप्पणी और आलोचना है। यह बयान सरकार के तमाम दावों की हवा निकालता हुआ दिखाई पड़ता है। अगर आप 'इंडियन एक्सप्रेस' में छपी इससे संबंधित रिपोर्ट को ध्यान से पढ़ेंगे, तो मैं उसका हिंदी अनुवाद करके बताता हूं। मोहन भागवत ने जो कहा, उसका मतलब है: "हम लंबे समय से सोच रहे हैं और कह रहे हैं कि भारत एक विश्वगुरु है, भारत को विश्वगुरु बनना है, हमें भारत को विश्वगुरु बनाना है। तो फिर हमें रोक कौन रहा है? हमें हमारी तैयारी रोक रही है, हमारी तैयारी अभी भी अधूरी है।"
यानी वह सीधे पूछ रहे हैं कि जब सब कुछ अनुकूल है, तो रुक क्यों रहे हैं? और खुद ही जवाब देते हैं कि हमारी तैयारी अधूरी है।
देश के तीन बड़े संकट क्या हैं
आशुतोष ने कहा कि देश के तीन बड़े संकट - शिक्षा, अर्थव्यवस्था और विदेश नीति है।
शिक्षा का संकट: इस वक्त नीट (NEET) और सीबीएसई (CBSE) की परीक्षाओं में जिस तरीके के गड़बड़झाले और घोटाले सामने आए हैं, उसकी वजह से पूरी केंद्र सरकार और शिक्षा मंत्रालय कटघरे में हैं। छात्र आत्महत्या कर रहे हैं और सरकार के पास इसका कोई ठोस जवाब नहीं है। पहली बार मैं देख रहा हूं कि तमाम टीवी चैनल और अखबार, जो आमतौर पर सरकार की मदद करते हैं, वे भी इस मुद्दे पर बिना नाम लिए बहुत तीखे हमले कर रहे हैं।
आर्थिक स्तर पर संकट: आशुतोष ने कहा कि सरकार के साथ अतीत में काम कर चुके उनके अपने ही लोग अब अर्थव्यवस्था पर सवाल उठा रहे हैं। डॉ. सुरजीत भल्ला (जो पीएम की आर्थिक सलाहकार परिषद के सदस्य रहे और आईएमएफ के एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर भी बने) ने कहा कि 2013 में भाजपा कहती थी कि हमें 'फ्रजाइल फाइव' (Fragile Five - पांच कमजोर अर्थव्यवस्थाएं) मिली थी, लेकिन सुरजीत भल्ला के अनुसार अब हम 'फ्रजाइल टू' (Fragile Two) में आ गए हैं। उनका कहना है कि बार-बार चुनाव जीतने का यह मतलब नहीं है कि अर्थव्यवस्था बेहतर है; बल्कि वह नीचे जा रही है और उन्होंने भारत को तुर्की के साथ खड़ा कर दिया है। इसी तरह पूर्व वित्त सचिव सुभाष चंद्र गर्ग ने लिखा है कि भारत 'फ्रजाइल फाइव' से 'वलनेरेबल वन' (Vulnerable One - बेहद संवेदनशील) की तरफ बढ़ गया है।
रोजगार और बाजार की स्थिति: वरिष्ठ पत्रकार आशुतोष ने कहा कि नेता विपक्ष राहुल गांधी तो रोज आर्थिक सुनामी की बात कर ही रहे हैं, लेकिन जो जानकार लोग हैं वे भी मान रहे हैं कि आर्थिक स्थिति ठीक नहीं है। पिछले 4-5 सालों में फॉरेन पोर्टफोलियो इन्वेस्टमेंट (FPI) लगातार बाहर जा रहा है। इस साल करीब 2.5 लाख करोड़ रुपये देश से बाहर जा चुके हैं। भारत की अपनी कंपनियां भी देश के सिस्टम पर भरोसा नहीं कर पा रही हैं और बाहर इन्वेस्ट कर रही हैं। रुपया लगातार गिर रहा है और आरबीआई इसे संभालने की कोशिश कर रही है। 19 से 29 साल के युवाओं के बीच बेरोजगारी का आंकड़ा 15% से 20% के आसपास पहुंच गया है। महंगाई, पेट्रोल-डीजल के दाम बढ़ रहे हैं।
तकनीकी स्तर पर पिछड़ापन: उन्होंने कहा कि जो टेक्नोलॉजी आज पूरी दुनिया को चलाने वाली है- जैसे आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI), सेमीकंडक्टर चिप मेकिंग, इलेक्ट्रिक व्हीकल्स (EV), और रिन्यूएबल ग्रीन एनर्जी- इन सब चीजों में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की कोई बहुत बड़ी पहचान या तैयारी नहीं है। इसी AI का जिक्र कुमार मंगलम बिड़ला ने भी किया था।
आशुतोष ने कहा कि आप (बीजेपी) 12 साल से केंद्र की सरकार में हैं। देश के 22 राज्यों या केंद्र शासित प्रदेशों में एनडीए की सरकार है, जिनमें से 14 में विशुद्ध भाजपा की सरकार है (यानी लगभग 76% हिस्से पर आपका शासन है)। इसके बावजूद हम कहां खड़े हैं?
इसलिए, जब मोहन भागवत यह सवाल उठा रहे हैं, तो यह सिर्फ एक सामान्य बात नहीं है। यह मोहन भागवत और आरएसएस की तरफ से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को सीधी चेतावनी है कि 'विश्वगुरु' का नारा देना बंद करिए और असल में बनने की तैयारी कीजिए। चूंकि इस वक्त आपकी सरकार है, इसलिए यह आपकी जिम्मेदारी और आपकी समस्या है कि आप तैयार नहीं हैं।
क्या विपक्ष और आक्रामक होगा?
आशुतोष ने इस सवाल पर कहा कि विपक्ष के तेवर और आक्रामक होंगे। इसका सीधा मतलब यह है कि खुद संघ परिवार के अंदर भी इस वक्त सरकार के चाल, चलन, चरित्र और चेहरे को लेकर गहरी चिंताएं हैं। वे इस बात को मानते हैं कि भारत को जिस अंतरराष्ट्रीय गति के साथ आगे बढ़ना चाहिए था, हम उस गति से कदमताल नहीं कर पा रहे हैं, बल्कि हम पिछड़ रहे हैं।
अब आप खुद देखिए, सरकार की तरफ से अब यह नारा नहीं सुनाई देता कि हम '5 ट्रिलियन डॉलर इकॉनमी' होने वाले हैं, या हम दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने वाले हैं। ऐसा इसलिए क्योंकि भारत इस रेस में पीछे छूट चुका है। भारत आज तीसरे नंबर पर नहीं, बल्कि छठे नंबर पर पहुंच गया है।
हाल ही में जो डेटा आया है, वह हैरान करने वाला है। भारत के शेयर बाजार (Equity Market) का जो वैल्यूएशन है, उसमें हम ताइवान और दक्षिण कोरिया से भी पीछे छूट गए हैं।
2014 में भारत के शेयर बाजार का वैल्यूएशन 1.8 ट्रिलियन डॉलर था, जबकि ताइवान का 0.8 ट्रिलियन डॉलर और दक्षिण कोरिया का 0.83 ट्रिलियन डॉलर था।
2026 में भारत का वैल्यूएशन 1.8 से बढ़कर 4.82 ट्रिलियन डॉलर हुआ, लेकिन ताइवान 0.8 से सीधे 5.36 ट्रिलियन डॉलर पर पहुंच गया और दक्षिण कोरिया 5.05 ट्रिलियन डॉलर हो गया।
इसका मतलब साफ है कि निवेशकों का हमारे शेयर बाजार पर भी भरोसा कम हो रहा है। फॉरेन इन्वेस्टर्स भारत का मार्केट छोड़कर विदेशों में पैसा लगा रहे हैं, इसीलिए पैसा हिंदुस्तान से बाहर जा रहा है।
क्या भागवत ने मोदी सरकार की विदेश नीति पर भी सवाल उठाए?
आशुतोष ने कहा कि मैं मोहन भागवत की इस राय से पूरी तरह सहमत हूं। अगर आप पिछले कुछ समय के घटनाक्रमों को देखें, तो अमेरिका लगातार भारत पर दबाव बना रहा है और भारत को चपत लगा रहा है। अमेरिकी सीनेटर मार्को रूबियो का वह बयान याद कीजिए जिसमें उन्होंने कहा था कि 'हम चीन वाली गलती भारत के साथ नहीं दोहराएंगे कि पहले उसकी टेक्नोलॉजी में मदद करें और बाद में वह हमें चुनौती दे।' डोनाल्ड ट्रंप ने भारत की इकॉनमी को 'डेड इकॉनमी' (Dead Economy) कहा था, भारत को 'टैरिफ किंग' (Tariff King) कहा था, यहां तक कि भारत की हवा को 'नरक' तक बता दिया। और हम ये सब बातें चुपचाप सुन रहे हैं, हमारी तरफ से कोई कड़ा जवाब नहीं आया।
आप सोचिए, अमेरिका का अधिकारी भारत आकर यह जानकारी देता है कि अगले हफ्ते वेनेजुएला के राष्ट्रपति यहां आएंगे—यह जानकारी हमें हमारी खुद की सरकार नहीं देती। सीजफायर की जानकारी भी हमें अमेरिकी राष्ट्रपति से मिलती है। हम चुप क्यों हैं? यही सवाल तो हम और 'सत्य हिंदी' लगातार उठा रहे हैं। क्या भारत वाकई कमजोर है?
मोहन भागवत के कहने का यही मतलब है कि जो मजबूत होता है, वह झुकता नहीं है। चूंकि हम कमजोर पड़ रहे हैं, इसलिए हम झुकने पर मजबूर हैं। हम चीन के सामने भी झुक रहे हैं। गलवान में हमारे देश के सैनिक शहीद हुए, लेकिन उसके बाद चीन के साथ हमारा व्यापार और बढ़ गया। आज चीन के साथ हमारा व्यापार घाटा (Trade Deficit) 100 बिलियन डॉलर से अधिक का है जो पूरी तरह चीन के पक्ष में है। तो एक तरफ आपका राष्ट्रीय अपमान होता है और दूसरी तरफ आपका बिजनेस बढ़ जाता है। इसलिए, जो हमारी मजबूती का ढिंढोरा पीटा जा रहा था, मोहन भागवत ने उसकी हवा निकाल दी है कि भाई, यह 'विश्वगुरु' का राग अलापना बंद करो, हम अभी तैयार नहीं हैं।
क्या RSS मोदी सरकार को गिराना चाहता है?
आशुतोष ने इस सवाल पर कहा कि सरकार गिराने का काम मोहन भागवत कभी नहीं करेंगे। लेकिन वह सरकार को सख्त चेतावनी (Warning) और नसीहत दे रहे हैं। वह सीधे तौर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की नीतियों और उनके काम करने के अंदाज की आलोचना कर रहे हैं।
आपको याद होगा कि 2024 के चुनाव नतीजों के ठीक 10 दिन बाद भी उन्होंने पीएम मोदी पर तीखे हमले किए थे। उन्होंने कहा था कि विपक्ष को शत्रु नहीं बल्कि 'प्रतिपक्ष' समझना चाहिए। उन्होंने यह भी कहा था कि कुछ लोग खुद को 'भगवान' (नॉन-बायोलॉजिकल वाले बयान पर कटाक्ष) समझने लगते हैं, जबकि एक सच्चे संघ कार्यकर्ता में अहंकार नहीं होना चाहिए। यह इशारा सीधे तौर पर पीएम मोदी की तरफ ही था।
आशुतोष ने कहा- आरएसएस की लीडरशिप का एक बड़ा हिस्सा प्रधानमंत्री की नीतियों और उनकी कार्यशैली से संतुष्ट नहीं है। लेकिन संघ अनुशासित होने के कारण कभी अपनी ही सरकार को गिराने की गलती नहीं करेगा। वह सिर्फ यह कह रहा है कि स्थितियों को संभालो, वरना चीजें हाथ से फिसल रही हैं। जब यही सब बातें राहुल गांधी संसद में बोलते हैं, तो भाजपा के लोग उन पर टूट पड़ते हैं, उनका चरित्र हनन करते हैं। लेकिन अब जब खुद मोहन भागवत कह रहे हैं कि हमारी तैयारी अधूरी है, तो भाजपा के पास कोई जवाब नहीं है।
क्या राहुल गाँधी और भागवत के बयान में समानताएं हैं?
आशुतोष ने कहा- बिल्कुल, मोहन भागवत भी तो उसी वैचारिक सिस्टम और संघ परिवार का हिस्सा हैं। जब संघ प्रमुख खुद इस तरह की चिंताएं जता रहे हैं, तो अंदर के आम कार्यकर्ताओं और पदाधिकारियों में कितनी बेचैनी और खदबदाहट होगी, यह समझा जा सकता है। चूंकि भाजपा और संघ एक अनुशासित और संगठित ढांचा है, इसलिए वहां असंतोष का प्रकटन या विस्फोट उस तरह खुलकर नहीं होता जैसा कांग्रेस में होता है (जहां कोई नाराज हुआ तो तुरंत मीडिया में बयान दे देता है)। लेकिन इसका मतलब यह कतई नहीं है कि अंदर नाराजगी या रोष नहीं है।
आरएसएस का मूल सिद्धांत ही यही है कि वह कभी भी 'व्यक्ति पूजा' (Personality Cult) का समर्थन नहीं करता। संघ के लिए व्यक्ति से बड़ा हमेशा संगठन और उसका अनुशासन होता है।