कई राज्यों के राज्यपालों के बदलाव के बाद टीएमसी ने मोदी सरकार पर बड़ा हमला किया है। पार्टी का कहना है कि राज्यपालों की बदलाव वाली सूची से साफ़ दिखता है कि राजभवन अब बीजेपी के वॉर रूम बन गए हैं। टीएमसी ने आरोप लगाया कि यह संवैधानिक संघवाद यानी फेडरलिज्म का अपमान है।

यह सब 5 मार्च 2026 की रात को राज्यपालों के फेरबदल के बाद हुआ। तमिलनाडु के राज्यपाल आर एन रवि को अब पश्चिम बंगाल का नया राज्यपाल बनाया गया है। पुराने राज्यपाल सी वी आनंद बोस ने अचानक इस्तीफा दे दिया था।

पश्चिम बंगाल के राज्यपाल डॉ. सी वी आनंद बोस ने 5 मार्च को दिल्ली में इस्तीफा देते हुए कहा, 'मैंने तीन साल से ज्यादा समय राज्यपाल के पद पर बिताया, अब काफी है।' राष्ट्रपति ने उनका इस्तीफा स्वीकार कर लिया।
उसी रात राष्ट्रपति भवन ने कई राज्यपालों और उप-राज्यपालों की नियुक्तियां कीं। आर एन रवि अब पश्चिम बंगाल के राज्यपाल होंगे। केरल के राज्यपाल राजेंद्र विश्वनाथ अर्लेकर को तमिलनाडु का अतिरिक्त प्रभार दिया गया है। बिहार में लेफ्टिनेंट जनरल (रिटायर्ड) सैयद अता हसनैन नए राज्यपाल बने हैं। दिल्ली में पूर्व राजदूत तरणजीत सिंह संधू को लेफ्टिनेंट गवर्नर बनाया गया है। कुल मिलाकर 9 बड़े बदलाव हुए।

यह बदलाव तब हुए जब पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु सहित कई राज्यों में विधानसभा चुनाव अप्रैल-मई 2026 में होने वाले हैं। चुनाव आयोग जल्द तारीखों का ऐलान कर सकता है।

राज्यसभा में टीएमसी की उपनेता सागरिका घोष ने एक्स पर लिखा, 'यह संघवाद की बेसिक ग्रामर है। सरकारी कमीशन साफ़ कहते हैं कि राज्य सरकार से सलाह लें। मोदी सरकार एकतरफ़ा फ़ैसले लेकर संवैधानिक संघवाद का तिरस्कार कर रही है। राज भवन अब बीजेपी के वॉर रूम बन गए हैं।'

टीएमसी नेता सुखेंदु शेखर रॉय ने कहा, 'राज्य सरकार को राज्यपाल नियुक्ति में शामिल होना चाहिए। सरकारी कमीशन ने भी यही सिफारिश की थी कि मुख्यमंत्री से सलाह ली जाए। लेकिन कौन सुनता है?'

ममता बनर्जी का ग़ुस्सा

मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने सीवी आनंद बोस के इस्तीफ़े और आरएन रवि को राज्यपाल बनाए जाने को लेकर कहा कि वे हैरान हैं। उन्होंने एक्स पर लिखा, 'केंद्र सरकार ने मुझे बिना पूछे आर एन रवि को राज्यपाल बनाने का फैसला किया। यह संविधान की भावना और संघवाद का अपमान है।' उन्होंने संकेत दिया कि पुराने राज्यपाल आनंद बोस पर केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने दबाव डाला होगा ताकि चुनाव से पहले कुछ राजनीतिक फायदे लिए जा सकें।

आर एन रवि कौन हैं और क्यों विवाद?

आर एन रवि पूर्व आईपीएस अधिकारी हैं। वे डिप्टी नेशनल सिक्योरिटी एडवाइजर रह चुके हैं। तमिलनाडु में वे मुख्यमंत्री एम के स्टालिन की डीएमके सरकार से लगातार झगड़ते रहे। शिक्षा, भाषा और प्रशासनिक मामले जैसे कई मुद्दों पर सार्वजनिक विवाद हुए। डीएमके सांसद पी विल्सन ने कहा, "आर एन रवि बीजेपी के इरादों की याद दिलाते थे। जहां वे जाते हैं, संविधान, संघवाद और लोकतंत्र को नुकसान होता है। तमिलनाडु चुनाव में हमारा 'स्टार कैंपेनर' जा रहा है, लेकिन बंगाल के लोगों के लिए दुख है।"
तमिलनाडु के राज्यपाल आरएन रवि का कार्यकाल 2021 से शुरू होने के बाद से ही एम.के. स्टालिन के नेतृत्व में डीएमके सरकार के साथ लगातार टकराव और विवादों में रहा है। वे कई बार राजनीतिक और संवैधानिक विवादों के केंद्र में रहे हैं।

विधेयकों पर सहमति में देरी और रोक

आरएन रवि ने तमिलनाडु विधानसभा द्वारा पारित कई अहम विधेयकों पर लंबे समय तक सहमति नहीं दी या उन्हें राष्ट्रपति के पास भेज दिया था। 2025 में सुप्रीम कोर्ट ने 10 ऐसे बिलों को रोकने को अवैध और मनमाना करार दिया था और कहा था कि राज्यपाल के पास वीटो पावर नहीं है और उन्होंने गुड फेथ में काम नहीं किया। यह फैसला राज्य सरकार के लिए बड़ी जीत थी, लेकिन राज्यपाल बनाम सरकार का सबसे बड़ा विवाद बना रहा।

विधानसभा में बार-बार वॉकआउट

रवि ने कई बार विधानसभा सत्र के उद्घाटन पर सरकार द्वारा तैयार अभिभाषण पढ़ने से इनकार किया और सदन से बाहर चले गए। जनवरी 2026 में राष्ट्रगान के प्रति अनादर का आरोप लगाकर वॉकआउट किया। यह 2023-2026 में कम से कम चौथी बार हुआ। वे राज्य सरकार के निवेश, अपराध, शिक्षा आदि दावों को झूठा और निराधार बताते रहे। एक सरकारी कॉलेज कार्यक्रम में छात्रों से 'जय श्री राम' का नारा लगवाने का आरोप उन पर लगा, जिससे तमिलनाडु में बड़ा राजनीतिक बवाल हुआ। कई संगठनों ने इसे संवैधानिक पद की गरिमा के खिलाफ बताया और हटाने की मांग की। मंत्री की नियुक्ति, बर्खास्तगी में हस्तक्षेप जैसे मामले में सुप्रीम कोर्ट ने फटकार लगाई।

राजनीतिक मायने

टीएमसी का आरोप है कि केंद्र गैर-बीजेपी शासित राज्यों में राज्यपालों को इस्तेमाल करके दबाव बनाता है। ममता बनर्जी पहले भी राज्यपाल आनंद बोस से कई बार टकरा चुकी हैं। अब नए राज्यपाल के आने से चुनाव से पहले और तनाव बढ़ सकता है।

बीजेपी की तरफ से अभी कोई बड़ा बयान नहीं आया है, लेकिन यह साफ़ है कि राज्यपालों की यह शिफ्ट चुनावी रणनीति का हिस्सा मानी जा रही है। बंगाल में चुनाव से पहले टीएमसी और बीजेपी के बीच जंग और तेज हो गई है।