पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस (TMC) के भीतर चल रहे संगठनात्मक विवाद ने अब बड़ा राजनीतिक रूप ले लिया है। चुनाव आयोग ने अंतरिम आदेश में ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस (AITC) के नाम और उसके आरक्षित चुनाव चिह्न ‘फूल और घास’ के इस्तेमाल पर रोक लगा दी है। आयोग के इस फैसले के बाद कांग्रेस खुलकर ममता बनर्जी के समर्थन में उतर आई है और उसने चुनाव आयोग पर गंभीर सवाल उठाए हैं। नेता विपक्ष राहुल गांधी ने चुनाव आयोग पर जबरदस्त हमला किया है।

सरकार चोरी के बाद अब पार्टी चोरीः राहुल

नेता विपक्ष राहुल गांधी ने आज शुक्रवार 18 सितंबर को एक्स पर लिखा- पहले शिवसेना, फिर NCP और अब तृणमूल कांग्रेस। हर बार एक ही पैटर्न - BJP और चुनाव आयोग मिलकर एक पार्टी को तोड़ते हैं। फिर उसका चुनाव चिन्ह छीन लिया जाता है। जब पूरी की पूरी पार्टी चोरी हो सकती है, तो करोड़ों भारतीयों के वोट चोरी होना भी हैरानी की बात नहीं। वोट चोरी। सरकार चोरी। अब पार्टी चोरी - ये हमारे लोकतांत्रिक पतन के प्रतीक बन गए हैं। ECI की संवैधानिक ज़िम्मेदारी जनादेश की रक्षा करना है - मगर उल्टा वो उन ताकतों की मदद कर रहा है, जो जनता के फैसले को ही पलट देते हैं। यह लड़ाई सिर्फ़ ममता बनर्जी जी की नहीं है। यह हर राजनीतिक दल, हर मतदाता की लड़ाई है जो स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव चाहता है।

कांग्रेस ने फैसले को बताया ‘संवैधानिक अपहरण’

कांग्रेस महासचिव और लोकसभा सांसद केसी वेणुगोपाल ने चुनाव आयोग के फैसले की तीखी आलोचना की। उन्होंने आरोप लगाया कि टीएमसी का नाम और चुनाव चिह्न फ्रीज करना ‘‘बीजेपी द्वारा किया गया खुलेआम असंवैधानिक अपहरण’’ है। वेणुगोपाल ने चुनाव आयोग के मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार पर भी निशाना साधते हुए इस फैसले को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए ‘‘देर रात का जन्मदिन का तोहफा’’ बताया।
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कांग्रेस नेता ने आरोप लगाया कि ममता बनर्जी के नेतृत्व में बीजेपी के खिलाफ लड़ने वाले नेताओं को अब उनके खिलाफ बगावत करने और पार्टी बदलने का रास्ता दिया जा रहा है। उन्होंने चुनाव आयोग की कार्रवाई को लोकतंत्र के लिए नुकसानदेह बताया और मांग की कि ममता बनर्जी के नेतृत्व वाले गुट को टीएमसी का नाम और उसका चुनाव चिह्न वापस दिया जाए।

पवन खेड़ा ने भी चुनाव आयोग पर उठाए सवाल

कांग्रेस के मीडिया विभाग के प्रमुख और राज्यसभा सांसद पवन खेड़ा ने भी चुनाव आयोग के फैसले की आलोचना की। उन्होंने कहा कि चुनाव चिह्न फ्रीज करना ‘‘न्याय’’ नहीं है बल्कि चुनाव आयोग की संवैधानिक जिम्मेदारी से पीछे हटना है। खेड़ा ने दावा किया कि टीएमसी से अलग हुए गुट का पार्टी के चुनाव चिह्न पर संवैधानिक आधार नहीं है और चुनाव चिह्न उस पार्टी का होना चाहिए जिसके नाम से वह जुड़ा है। 

आयोग का कहना- अंतिम फैसला अभी बाकी

चुनाव आयोग ने साफ किया है कि मौजूदा कार्रवाई अंतरिम व्यवस्था है। आयोग को अभी यह तय करना है कि मान्यता प्राप्त पार्टी का प्रतिनिधित्व वास्तव में कौन-सा गुट करता है। इसके लिए चुनाव चिह्न आदेश, 1968 की धारा 15 के तहत संगठनात्मक दावों की जांच की प्रक्रिया चल रही है। आयोग का कहना है कि अंतरिम रोक का उद्देश्य दोनों प्रतिद्वंद्वी गुटों को समान स्थिति में रखना और आगामी उपचुनाव में उनके अधिकारों तथा हितों की रक्षा करना है। अंतिम निर्णय होने तक दोनों गुटों को अलग-अलग नाम और चुनाव चिह्न के साथ चुनाव लड़ना होगा।

राजनीतिक विवाद और तेज

चुनाव आयोग के इस आदेश ने पश्चिम बंगाल की राजनीति में टीएमसी के अंदरूनी संघर्ष को और अधिक महत्वपूर्ण बना दिया है। एक तरफ आयोग पार्टी के वास्तविक प्रतिनिधित्व को लेकर प्रक्रिया आगे बढ़ा रहा है, दूसरी तरफ कांग्रेस ने इस कार्रवाई पर सवाल उठाते हुए ममता बनर्जी का समर्थन किया है। इस पूरे विवाद का अगला महत्वपूर्ण चरण आयोग के सामने दोनों गुटों के संगठनात्मक दावों की सुनवाई और उसके बाद आने वाला अंतिम फैसला होगा। फिलहाल तत्काल प्रभाव यह है कि आगामी उपचुनाव में दोनों गुट टीएमसी के आधिकारिक नाम और उसके पारंपरिक चुनाव चिह्न का इस्तेमाल नहीं कर पाएंगे।