पंजाब विधानसभा चुनाव में बीजेपी-अकाली दल में गठबंधन होगा तो बड़े भाई की भूमिका में कौन होगा? रिपोर्ट है कि अंदरखाने सीट-बँटवारे पर एक दौर की बातचीत हो चुकी है और दूसरे दौर की बातचीत की तैयारी है। जानें किन तीन बड़े मुद्दों पर हो रही बातचीत।
पीएम मोदी और सुखबीर सिंह बादल। (फाइल फोटो)
पंजाब विधानसभा चुनाव 2027 से पहले बीजेपी और शिरोमणि अकाली दल के बीच संभावित गठबंधन को लेकर बातचीत काफी आगे बढ़ गई है। हालाँकि बीजेपी सार्वजनिक मंचों पर लगातार दावा कर रही है कि वह राज्य की सभी 117 विधानसभा सीटों पर अपने दम पर चुनाव लड़ने की तैयारी कर रही है, लेकिन मीडिया रिपोर्टों के अनुसार दोनों दलों के बीच अंदरखाने गठबंधन और सीट बँटवारे को लेकर बातचीत शुरू हो चुकी है। सूत्रों के हवाले से रिपोर्ट में कहा गया है कि सीट बंटवारे को लेकर दोनों दलों के नेताओं के बीच एक दौर की बैठक पहले ही हो चुकी है, जबकि दूसरे दौर की बातचीत जल्द होने की संभावना है। बताया जा रहा है कि बातचीत अब तीन प्रमुख मुद्दों पर केंद्रित है, जिन पर अंतिम सहमति बनना अभी बाकी है।
बीजेपी और अकाली दल के बीच गठबंधन को लेकर किस बात पर चर्चा हुई है, यह जानने से पहले यह जान लें कि आख़िर गठबंधन को लेकर हाल में क्या ख़बरें आई हैं। दोनों दलों के संभावित गठबंधन की चर्चाओं को उस समय और बल मिला जब हाल ही में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और शिरोमणि अकाली दल के अध्यक्ष सुखबीर सिंह बादल की नई दिल्ली में मुलाकात हुई। हालाँकि इस बैठक का आधिकारिक एजेंडा सार्वजनिक नहीं किया गया और दोनों दलों ने चुनावी गठबंधन की संभावना से इनकार किया है, लेकिन राजनीतिक गलियारों में इसे पंजाब विधानसभा चुनाव की तैयारियों से जोड़कर देखा जा रहा है।
सार्वजनिक बयान और अंदरूनी रणनीति अलग
दिलचस्प बात यह है कि बीजेपी अब भी सार्वजनिक रूप से यही कह रही है कि वह पंजाब की सभी 117 सीटों पर चुनाव लड़ने की तैयारी कर रही है। दूसरी ओर, अंदरखाने गठबंधन और सीट बंटवारे को लेकर लगातार बातचीत की खबरें सामने आ रही हैं। इससे यह संकेत मिल रहा है कि दोनों दल फिलहाल सभी विकल्प खुले रखना चाहते हैं और अंतिम फैसला राजनीतिक परिस्थितियों तथा चुनावी समीकरणों को देखते हुए लिया जा सकता है।
पीएम मोदी और सुखबीर बादल की बैठक के बाद किसी भी पक्ष की ओर से कोई आधिकारिक बयान जारी नहीं किया गया। और अब इसी बीच रिपोर्ट है कि बीजेपी और अकाली दल के बीच फिलहाल तीन अहम मुद्दों पर चर्चा चल रही है। इकोनॉमिक टाइम्स ने सूत्रों के हवाले से रिपोर्ट दी है कि दोनों दलों के बीच शीट बंटवारे को लेकर बैठक हुई है।
सीट बंटवारे का फॉर्मूला
सबसे बड़ा सवाल यह है कि चुनाव में किस पार्टी को कितनी सीटें मिलेंगी। ईटी ने सूत्रों के हवाले से रिपोर्ट दीहै कि एक प्रस्ताव के तहत अकाली दल 70 सीटों और बीजेपी 47 सीटों पर चुनाव लड़ सकती है।
अकाली दल का मानना है कि पंजाब की राजनीतिक और सामाजिक परिस्थितियों को देखते हुए उसे गठबंधन में 'बड़े भाई' की भूमिका मिलनी चाहिए। वहीं बीजेपी के भीतर एक वर्ग का कहना है कि पिछले कुछ वर्षों में पार्टी का जनाधार और संगठन दोनों मजबूत हुए हैं, इसलिए सीटों का बंटवारा लगभग बराबरी के आधार पर होना चाहिए।
कौन किस सीट से लड़ेगा?
दूसरा बड़ा मुद्दा सीटों के चयन का है। पहले जब दोनों दलों का गठबंधन था तब बीजेपी मुख्य रूप से शहरी क्षेत्रों की लगभग 23 सीटों पर चुनाव लड़ती थी, जबकि अकाली दल ग्रामीण और सिख बहुल इलाकों की अधिकांश सीटों पर चुनाव लड़ता था। अब दोनों दलों के सामने चुनौती यह है कि बदले हुए राजनीतिक समीकरणों के बीच किस सीट पर कौन उम्मीदवार उतारेगा।
मुख्यमंत्री और उपमुख्यमंत्री का चेहरा
तीसरा और सबसे संवेदनशील मुद्दा सरकार बनने की स्थिति में नेतृत्व का है। अंग्रेज़ी अख़बार ने सूत्रों के हवाले से रिपोर्ट दी है कि यदि अकाली दल ज़्यादा सीटों पर चुनाव लड़ता है तो वह मुख्यमंत्री पद के लिए अपने अध्यक्ष सुखबीर सिंह बादल को आगे रखना चाहता है।हालाँकि बीजेपी के कुछ नेताओं का मानना है कि चुनाव से पहले मुख्यमंत्री का चेहरा घोषित करना पार्टी के लिए राजनीतिक रूप से फायदेमंद नहीं होगा। इसके साथ ही उपमुख्यमंत्री पद को लेकर भी दोनों दलों के बीच बातचीत चल रही है।गठबंधन की ज़रूरत क्यों महसूस हो रही है?
बीजेपी और अकाली दल के बीच फिर से नजदीकियां बढ़ने के पीछे चुनावी गणित को बड़ी वजह माना जा रहा है। 2024 लोकसभा चुनाव में बीजेपी को पंजाब में 18.56 प्रतिशत वोट मिले थे और पार्टी 23 विधानसभा क्षेत्रों में बढ़त बनाने में सफल रही थी। वहीं अकाली दल को 13.42 प्रतिशत वोट मिले थे। अगर दोनों दलों के वोट जोड़ दिए जाएं तो उनका संयुक्त वोट शेयर करीब 32 प्रतिशत बनता है। हालांकि राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि गठबंधन बनने पर दोनों दलों के वोट पूरी तरह एक-दूसरे को ट्रांसफर होंगे या नहीं, यह अभी निश्चित नहीं कहा जा सकता है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि बीजेपी और अकाली दल फिर साथ आते हैं तो इसका चुनाव पर असर पड़ सकता है। अकाली दल का प्रभाव अभी भी पंजाब के जाट सिख वोटरों के बीच माना जाता है, जबकि बीजेपी शहरी हिंदू मतदाताओं के बीच अपनी पकड़ मजबूत करने की कोशिश कर रही है। ऐसे में दोनों दलों का साथ आना चुनावी समीकरण बदल सकता है। ऐसे में आम आदमी पार्टी के लिए सत्ता बरकरार रखना मुश्किल हो सकता है। उधर कांग्रेस भी अपने पूरे दमखम से चुनाव लड़ने की तैयारी में है।
2020 में टूटा था दशकों पुराना साथ
बीजेपी और शिरोमणि अकाली दल का गठबंधन 1997 में औपचारिक रूप से बना था। उस समय पंजाब आतंकवाद के दौर से बाहर निकल रहा था। इस गठबंधन ने कई चुनावों में सफलता हासिल की। 1997, 2007 और 2012 के विधानसभा चुनावों में दोनों दलों ने मिलकर सरकार बनाई थी। खास बात यह रही कि 1997 में बनी अकाली दल की सरकार पहली ऐसी सरकार थी जिसने पांच साल का पूरा कार्यकाल पूरा किया।लेकिन वर्ष 2020 में केंद्र सरकार द्वारा लाए गए तीन कृषि कानूनों के विरोध के बाद दोनों दलों के रिश्तों में दरार आ गई। किसान आंदोलन के दबाव के बीच शिरोमणि अकाली दल ने राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन छोड़ दिया था। इसी दौरान केंद्रीय मंत्री हरसिमरत कौर बादल ने भी केंद्रीय मंत्रिमंडल से इस्तीफा दे दिया था। अकाली दल यह नहीं चाहता था कि उसका मूल वोट बैंक यानी किसान और गांवों में रहने वाले लोग उससे नाराज़ हों।
सुखबीर तब रहे थे बीजेपी पर हमलावर
किसान आंदोलन के दौरान सुखबीर सिंह बादल ने कहा था कि 'केंद्र सरकार की ओर से कहा जा रहा है किसानों के आंदोलन में आतंकवादी, अलगाववादी आ गए हैं। तो फिर सरकार उन्हें बातचीत के लिए क्यों बुला रही है।' बादल ने तब कहा था, ‘अगर सरकार की बात मान लें तो देशभक्त और न मानें तो आतंकवादी, इससे ख़राब बात और क्या हो सकती है।’ सितंबर 2021 में दिल्ली पुलिस ने सुखबीर सिंह बादल और पूर्व केंद्रीय मंत्री हरसिमरत कौर बादल समेत 15 लोगों को हिरासत में ले लिया था। तब ये लोग कृषि क़ानूनों के ख़िलाफ़ संसद भवन तक मार्च निकाल रहे थे।
फिलहाल पंजाब की राजनीति में सबसे बड़ा सवाल यही बना हुआ है कि यदि बीजेपी और अकाली दल फिर से साथ आते हैं, तो गठबंधन में 'बड़े भाई' की भूमिका किसे मिलेगी और दोनों दल सीटों के बंटवारे पर सहमति बना पाएंगे या नहीं।