फगवाड़ा LPU में हिंसा, वाहन जलना और चितकारा यूनिवर्सिटी में तनाव—पंजाब के कैंपसों में फीस, रोजगार, शिक्षा गुणवत्ता और जवाबदेही को लेकर उबलता छात्र असंतोष। क्या यह केवल कैंपस मुद्दा है या राज्य के भविष्य का आईना? पढ़िए, जगदीप सिंधु का विश्लेषण।
एलपीयू में छात्रों का हिंसक प्रदर्शन
जब विश्वविद्यालयों में डिग्री से पहले निराशा मिल जाए और रोजगार से पहले पलायन की तैयारी शुरू हो जाए, तब छात्र आंदोलन केवल कैंपस का मुद्दा नहीं रहता; वह राज्य के भविष्य का आईना बन जाता है।
पंजाब के विश्वविद्यालय केवल उच्च शिक्षा के केंद्र ही नहीं हैं, बल्कि वे समाज की राजनीतिक बेचैनी के स्पष्ट संकेतक बनते जा रहे हैं। पंजाब में छात्रों का असंतोष केवल प्राइवेट विश्वविद्यालयों तक सीमित नहीं है। पिछले कुछ समय की घटनाओं, छात्र आंदोलनों और उच्च शिक्षा के ढाँचे को देखें तो असंतोष तीन अलग-अलग स्तरों पर दिखाई देता है- निजी विश्वविद्यालय, सरकारी विश्वविद्यालय और सरकारी व निजी संबद्ध कॉलेज। फर्क केवल इतना है कि हर संस्थान में असंतोष का कारण अलग है।
पंजाब में छात्र केवल फीस के खिलाफ नहीं लड़ रहे; वे शिक्षा की बदलती प्रकृति, रोजगार की अनिश्चितता और संस्थागत जवाबदेही के सवाल उठा रहे हैं।
पिछले कुछ वर्षों में पंजाब के कई शिक्षण संस्थानों में विरोध प्रदर्शन हुए हैं। असंतोष व्यापक है, पर उसका स्वरूप संस्थान-दर-संस्थान बदलता है।
छात्रों में असंतोष की वजहें
असंतोष अत्यधिक कार्पोरेटाइज़्ड अनुशासन, फीस, प्रशासन, पारदर्शिता के प्रश्न, शिक्षा की गुणवत्ता, शोध और सुरक्षा के कारण बहुत अधिक उजागर होता है। सरकारी संस्थानों में फीस वृद्धि और हॉस्टल प्रशासनिक रवैये के कारण उच्च स्तर का असंतोष दिखाई देता है। अन्य सरकारी संबद्ध कॉलेजों में शिक्षकों की कमी, बुनियादी सुविधाओं की कमी और रोजगार के अवसरों की सीमितता मुख्य कारण दीखते हैं। छात्रों में असंतोष अधिकतर प्रशासनिक और आर्थिक मुद्दों पर केंद्रित है।
पंजाबी यूनिवर्सिटी पटियाला में पिछले महीनों का सबसे बड़ा छात्र आंदोलन रहा। फीस वृद्धि (कुछ पाठ्यक्रमों में भारी वृद्धि), हॉस्टल सुविधाएँ, पुलिस हस्तक्षेप और प्रशासनिक निर्णयों के खिलाफ यह आंदोलन लगातार तीन सप्ताह तक चलता रहा। आंदोलन के बाद विश्वविद्यालय को फीस वृद्धि वापस लेने की घोषणा करनी पड़ी। पंजाब विश्वविद्यालय चंडीगढ़ में छात्र संगठनों ने वार्षिक 5–7.5% फीस वृद्धि का जमकर विरोध किया। स्व-वित्तपोषित पाठ्यक्रमों की महंगी फीस के कारण छात्रों में भारी असंतोष उपजा।
विश्वविद्यालय की स्वायत्तता का मुद्दा भी समानांतर तौर पर उठा। छात्र प्रतिनिधित्व को उचित और अपेक्षित भागीदारी के सवाल पर छात्रों ने प्रशासनिक पारदर्शिता पर गंभीर सवाल उठाए थे। सरकारी संबद्ध कॉलेजों में बड़े आंदोलन अपेक्षाकृत कम दिखाई देते हैं, लेकिन शोध बताता है कि वहाँ संरचनात्मक समस्याएँ गंभीर हैं। नियमित शिक्षकों की कमी और गेस्ट फैकल्टी पर निर्भरता एक बड़ी कमी यहाँ स्पष्ट तौर पर बनी रही है। ग्रामीण कॉलेजों में कमजोर बुनियादी ढाँचा और कम सरकारी निवेश के कारण निराशा के संकेत छात्रों में उभरते हैं। 1996 के बाद लंबे समय तक नियमित नियुक्तियों की कमी का असर आज भी महसूस किया जाता है।
निजीकरण का असंतुलन
पंजाब में वर्तमान में 41 यूनिवर्सिटी हैं, जिनमें से 20 प्राइवेट यूनिवर्सिटी हैं। कॉलेजों की संख्या 1079 है। लगभग 675 कॉलेजों में से अधिकांश निजी प्रबंधन के अधीन हैं। पंजाब की उच्च शिक्षा का सबसे महत्वपूर्ण तथ्य शायद यह है कि राज्य का बड़ा हिस्सा निजी संस्थानों पर निर्भर है। फगवाड़ा में स्थित प्राइवेट LPU में एक घटना के बाद छात्रों का विरोध राष्ट्रीय राजमार्ग तक पहुँच गया। कैंपस में हिंसा हुई, वाहन जले और विश्वविद्यालय को कई दिनों तक शैक्षणिक गतिविधियाँ स्थगित करनी पड़ीं।
इसी तरह राजपुरा स्थित चितकारा यूनिवर्सिटी में भी सोशल मीडिया पर फैली सूचनाओं के बाद तनावपूर्ण स्थिति बनी, जिसकी पुलिस ने अलग से जाँच शुरू की।
हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने देशभर के निजी विश्वविद्यालयों को अपनी फीस संरचना और वित्तीय रिकॉर्ड सार्वजनिक करने के निर्देश दिए हैं, लेकिन उनके पालन में कितनी गंभीरता अपनाई गई, यह भी किसी से छुपा हुआ नहीं।
क्या यह 2027 की राजनीति को प्रभावित करेगा?
फरवरी 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले यह प्रश्न और महत्वपूर्ण हो जाता है। बीजेपी नशे और कानून-व्यवस्था का मुद्दा उठा रही है। कांग्रेस युवाओं और रोजगार की राजनीति को पुनर्जीवित करने की कोशिश कर रही है। आम आदमी पार्टी शिक्षा और शासन के अपने रिकॉर्ड का बचाव कर रही है। लेकिन छात्रों का असंतोष किसी एक दल के खिलाफ या पक्ष में स्वतः नहीं बदलता। छात्र केवल फीस कम करने की मांग नहीं कर रहे; वे निर्णय लेने की प्रक्रिया में अपनी भागीदारी भी चाहते हैं। यहीं से उनका राजनीतिक दृष्टिकोण भी आकार लेने लगता है। छात्र राजनीति से देश के कई बड़े नेता निकले हैं, जिन्होंने लोकतांत्रिक पद्धति में नीतियों के निर्माण और बदलाव के आधार को पुख्ता किया।
उसका राजनीतिक प्रभाव इस बात पर निर्भर करेगा कि क्या कोई दल उनकी साझा चिंताओं—रोजगार, शिक्षा की गुणवत्ता, फीस, सुरक्षा और पलायन- को विश्वसनीय नीति में बदल पाता है। छात्र आज केवल डिग्री नहीं चाहता; वह यह जानना चाहता है कि डिग्री के बाद उसका भविष्य कहाँ है।