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केंद्र के कृषि सुधारों पर अकाली दल नाराज़, बीजेपी से रिश्ते पर हो सकता है विचार

केंद्र के कृषि सेवा अध्यादेश-2020 की घोषणा के साथ ही पंजाब में इसका बड़े पैमाने पर विरोध शुरू हो गया है। विभिन्न प्रमुख किसान संगठन तो मुखालफत में आ ही गए हैं, बीजेपी का गठबंधन सहयोगी शिरोमणि अकाली दल भी इसके ख़िलाफ़ मुखर है। जैसे ही केंद्र की ओर से कृषि संबंधी फ़ैसले लिए गए, वैसे ही देर शाम शिरोमणि अकाली दल की एक आपात बैठक अध्यक्ष सुखबीर सिंह बादल की अगुवाई में हुई।

केंद्र के जिन फ़ैसलों पर 'गहन मंथन' के लिए शिरोमणि अकाली दल की यह आपात बैठक हुई, उनकी घोषणा के वक़्त दिल्ली में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अगुवाई में हुई विशेष बैठक में केंद्रीय मंत्री हरसिमरत कौर बादल भी उपस्थित थीं। वह बादल घराने की बहू तथा शिरोमणि अकाली दल की बड़ी नेता हैं। केंद्रीय मंत्रिमंडल में दल का प्रतिनिधित्व करती हैं। तमाम फ़ैसलों पर हरसिमरत कौर बादल की मुहर भी लगी है।

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मोदी सरकार ने कृषि क्षेत्र में सुधारों के लिये तीन अध्यादेश जारी करने का फ़ैसला बुधवार की कैबिनेट बैठक में किया। एक तो आवश्यक वस्तु अधिनियम 1955 में बदलाव किया गया है। इसके तहत अब किसानों का सामान मंडी में बेचने की ज़रूरत नहीं है, वे सीधे अपनी पसंद से किसी को भी बेच सकते हैं। अब वे निजी क्षेत्र में किसी भी व्यापारी या कंपनी से सीधे क़रार कर फ़सल का मूल्य और दूसरे दर निश्चित कर सकते हैं। केंद्रीय कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर ने इस सुधारों को ऐतिहासिक क़दम बताये हैं, उनका कहना है कि किसान अब सही मायनों में आज़ाद हो गया है। एक तरह से इस फ़ैसले से मंडियों की भूमिका ख़त्म हो जाएगी।

इस आपात बैठक में पार्टी के राज्य सभा सांसद बलविंदर सिंह भूंदड़ और प्रेम सिंह चंदूमाजरा ने बैठक में ज़ोर देकर कहा कि मौजूदा केंद्र सरकार शक्तियों का केंद्रीकरण कर रही है और राज्यों से उनके अधिकार धीरे-धीरे पूरी तरह छीने जा रहे हैं। दोनों नेताओं ने सुखबीर सिंह बादल से कहा कि अब उन्हें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को नए सिरे से शिरोमणि अकाली दल की नीति से अवगत कराना चाहिए। शिरोमणि अकाली दल संघीय ढांचे की मज़बूती के पक्ष में है। पावर सेक्टर में केंद्र के दखल को लेकर भी बैठक में चर्चा की गई। संसदीय राजनीति के पुराने अनुभवी नेता और शिरोमणि अकाली दल के संस्थापकों में से एक बलविंदर सिंह भूंदड़ के अनुसार एकाएक नए अध्यादेश के ज़रिए 1955 के आवश्यक वस्तु अधिनियम में संशोधन कर दिया गया। जबकि इसके लिए संसद में बहस कराई जानी चाहिए थी।

वरिष्ठ अकाली नेताओं का मानना है कि नरेंद्र मोदी ने कृषि के मंडीकरण को लेकर इतना बड़ा फ़ैसला लेते हुए बीजेपी के गठबंधन सहयोगियों को विश्वास में नहीं लिया। जबकि यह आत्मघाती क़दम है। किसानों के लिए बेहद ज़्यादा नुक़सानदेह है।

केंद्र का कृषि सेवा अध्यादेश-2020 इसलिए भी शिरोमणि अकाली दल की चिंता का सबब है कि पंजाब में ज़मीनी स्तर पर आम किसानों द्वारा इसका विरोध किया जाना तय है और अकाली ख़ुद को किसान हितों का सबसे बड़ा राजनीतिक प्रवक्ता और अभिभावक मानते हैं। शिरोमणि अकाली दल के वोट बैंक का 76 प्रतिशत हिस्सा ग्रामीण पंजाब से है। केंद्र के नए अध्यादेश पर अकाली दल और केंद्र में टकराव तय है। एक वरिष्ठ अकाली नेता की मानें तो इस बार यह टकराव 'निर्णायक' होगा।

आकस्मिक नहीं है कि अचानक पंजाब बीजेपी ने 59 सीटों पर चुनाव लड़ने का राग कुछ महीनों के बाद फिर से अलापना शुरू कर दिया है। इसका आगाज पार्टी प्रवक्ता और कई बार विधायक रहे पूर्व मंत्री मदन मोहन मित्तल ने किया है।          

पंजाब के प्रमुख किसान संगठनों ने भी नरेंद्र मोदी सरकार के कृषि सेवा अध्यादेश-2020 का तीखा विरोध शुरू कर दिया है। इनका मानना है कि यह अध्यादेश किसानों के लिए नहीं बल्कि व्यापारियों के लिए ज़्यादा फ़ायदेमंद है। किसान नेताओं का मानना है कि न्यूनतम समर्थन मूल्य ख़त्म करने तथा प्रचलित मंडीकरण व्यवस्था में इस मानिंद बदलाव किसानों को तबाही की ओर धकेलने वाला है।

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भारतीय किसान यूनियन (राजोवाल) के अध्यक्ष बलबीर सिंह राजोवाल कहते हैं, ‘नरेंद्र मोदी मंत्रिमंडल द्वारा पारित नया ऑर्डिनेंस साफ़ तौर पर मौजूदा मंडी व्यवस्था का ख़ात्मा करने वाला है। केंद्र सरकार लॉकडाउन के चलते समूचे कृषि क्षेत्र को कॉर्पोरेट घरानों के हवाले करने के लिए ख़ासी तत्पर है। नए अध्यादेश के ज़रिए पंजाब और हरियाणा की मंडियों का दायरा और ज़्यादा सीमित कर दिया जाएगा। न्यूनतम समर्थन मूल्य पर ख़रीद बंद होने से किसान एकदम बर्बाद हो जाएँगे।’

‘कृषि राज्यों का विषय’

भारतीय किसान यूनियन (बीकेयू/लक्खोवाल) के प्रधान अजमेर सिंह लक्खोवाल के मुताबिक़, ‘कृषि राज्यों का विषय है लेकिन नरेंद्र मोदी सरकार राज्यों की शक्तियों का केंद्रीयकरण करने की राह पर है। फ़सल कहीं भी बेचने की छूट का ज़्यादा फ़यदा व्यापारियों को होगा। किसान तो अपने सूबे में भी बहुत मुश्किलों से मंडियों तक पहुँचते हैं। वे दूसरे राज्यों में आसानी से फ़सल बेचने नहीं जा पाएँगे। कॉरपोरेट घराने ज़रूर अपनी सुविधानुसार खुली लूट करेंगे। हम इस अध्यादेश के ख़िलाफ़ राज्यव्यापी आंदोलन करेंगे।’ 

पंजाब के एक अन्य वरिष्ठ किसान नेता सुखदेव सिंह कहते हैं, "एक 'देश-एक कृषि बाज़ार' की अवधारणा सरासर किसान विरोधी है और यह किसानों के लिए बेहद मारक साबित होगी।"

वरिष्ठ कृषि विशेषज्ञ डॉक्टर देवेंद्र शर्मा के अनुसार, ‘3 जून को केंद्रीय मंत्रिमंडल द्वारा पारित कृषि संबंधी तीनों क़ानून मूलतः किसान विरोधी हैं। ऐसे क़ानून यूरोप और अमेरिका में पूरी तरह नाकाम साबित हो चुके हैं। किसानों के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य ही आमदनी का एकमात्र ज़रिया है, अध्यादेश इसे भी ख़त्म कर देगा। पंजाब और हरियाणा के किसानों को इसका सबसे ज़्यादा नुक़सान होगा। इसलिए कि इन राज्यों में न्यूनतम समर्थन मूल्य और ख़रीद की गारंटी है।’

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अमरीक
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