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राजस्थान में बीजेपी ने मोदी से ज़्यादा योगी पर भरोसा दिखाया

राजस्थान में आज वोटिंग हो रही है और शाम तक दोनों पार्टियों का भविष्य ईवीएम मशीनों में बंद हो जाएगा। इस बार के चुनाव में बीजेपी और कांग्रेस दोनों ने जाति, धर्म, गोत्र और हिंदू राष्ट्रवाद के सियासी तीर से चुनावी हवा को धुँधला करने की भरपूर कोशिश की। जनता के असल मुद्दों को चुनावी मैदान से बाहर फेंकने की भी कोशिश की। लेकिन इस बार राजस्थान में न आँधी चली, न धूल भरी हवाएँ।

भगवा लहर चलाने की कोशिश

बीजेपी ने उतर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को मैदान में उतारकर भगवा लहर चलाने की कोशिश की। योगी से मुस्लिम-बहुल और नाथ पंथ के प्रभाव वाली सीटों पर रैलियाँ कराईं। राजस्थान में नाथ संप्रदाय के 42 मठ और पीठ हैं। योगी से अलवर, भरतपुर, सीकर, जैसलमेर, बाड़मेर, भीलवाड़ा, अजमेर  से लेकर एक दर्जन ज़िलों में उन विधानसभा सीटों पर रैलियाँ करवाई, जहाँ बीजेपी उम्मीद कर रही थी कि योगी हिंदू राष्ट्रवाद की हवा चला सकते हैं। बीजेपी की बैचेनी राजस्थान में दलित वोट बैंक को लेकर ज़्यादा रही है। इसी वजह से बजरंग बली बनाम अली के नाम पर ध्रुवीकरण की कोशिश कर रहे योगी ने बजंरग बली को दलित बता डाला लेकिन यह दाँव उलटा पड़ गया। बजरंग बली की जाति के नाम पर कांग्रेस को तो बीजेपी को घेरने का मौका मिला ही, यूपी में दलितों ने हनुमान मंदिरों पर दावा ठोकना शुरू कर दिया।

योगी के हिंदू कार्ड पर भरोसा

बीजेपी को योगी के हिंदुत्व कार्ड पर इतना भरोसा रहा कि राजस्थान के चुनाव घोषणा पत्र में 'गोरखधंधा' शब्द पर प्रतिबंध लगाने से लेकर गुरु गोरखनाथ का राष्ट्रीय स्मारक बनाने, पाठ्यक्रम में शामिल करने और नाथ संप्रदाय के मठों की मरम्मत और विकास का वादा कर डाला। मतलब साफ़ है, बीजेपी का अपनी सरकार की काम से ज़्यादा योगी के हिंदुत्व कार्ड पर भरोसा रहा। पार्टी ने इसे राजे सरकार के ख़िलाफ़ सत्ता विरोधी लहर से निपटने का हथियार भी माना। हैरानी तो यह रही कि कांग्रेस बीजेपी के हिंदुत्व के कार्ड से ज़्यादा परेशान रही। जैसे ही योगी आदित्यनाथ ने बजरंग बली के नाम पर ध्रुवीकरण की कोशिश शुरू की, कांग्रेस ने आपात प्लान तैयार कर योगी की काट में आचार्य प्रमोद कृष्णन को मैदान में उतार दिया था। रातोंरात प्रमोद कृष्णन की रैलियों का प्लान हो गया। प्रमोद कृष्णन की भी उन्हीं सीटों पर रैलियाँ करवाई, जहाँ योगी आदित्यनाथ सभाएँ कर चुके थे। राजस्थान में कांग्रेस ने बीजेपी के हिंदुत्व कार्ड का जवाब देने की तैयारी पहले ही कर ली थी। जल्दबाजी इतनी रही कि धर्म और जाति की सियासत से ख़ुद को दूर रखने वाले सी. पी. जोशी ने बीजेपी के हिंदुत्व का अस्त्र चलाने से पहले ही जवाबी अस्त्र दाग दिया - प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय मंत्री साध्वी उमा भारती की जाति पर सवाल उठा कर और हिंदुत्व और राम पर बात करने के दोनों के हक़ को लेकर। बीजेपी तो मानो इसी ताक में बैठी थी कि कांग्रेस ऐसी चूक करे और लपक ले। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मौक़े को लपकने में ज़रा भी देर नहीं की।

कांग्रेस ने दिया मोदी को मौक़ा

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जोशी के बयान को मैदान में ठीक उसी तरह भुनाने की कोशिश की, जैसे गुजरात चुनाव के वक़्त कांग्रेस नेता मणिशंकर के 'नीच' वाले बयान को भुनाया। अगला मौक़ा तेल की क़ीमतों की तुलना पीएम की माँ की उम्र से करके, राज बब्बर ने दे दिया। फिर क्या था, बीजेपी और पीएम के लिए कांग्रेस पर वार करने के लिए ये दोनों चुनावी हथियार बन गए। कांग्रेस ने एक बार फिर जवाबी वार करने की कोशिश की, राहुल गाँधी का गोत्र बता कर वह भी तीर्थराज पुष्कर से। जिससे राहुल गाँधी ख़ुद को हिंदू के साथ ब्राह्मण बता कर राजस्थान के 7 फ़ीसदी ब्राह्मण वोट बैंक के साथ हिंदुओं को लुभा सकें।अब सवाल यह कि क्या बीजेपी ने कांग्रेस को चुनाव में जाति, धर्म, गोत्र में फँसाया या कांग्रेस ने बीजेपी को। यह सवाल हमने जब राजस्थान कांग्रेस के अध्यक्ष सचिन पायलट से पूछा तो जवाब मिला कि इस मुद्दे पर बीजेपी ने जनता को फँसाया। लेकिन हक़ीक़त यह है कि दोनों ने जनता को इसमें फँसाने की कोशिश की।सवाल यह भी है कि क्या राजस्थान की जनता जाति, धर्म, गोत्र के मुद्दे पर वोट करेगी। हो सकता है कि बीजेपी को सत्ताविरोधी लहर का डर हो, जनता को मूल मुद्दों से भटकाने के लिए उसने राष्ट्रवाद का शोर किया हो, लेकिन कांग्रेस क्यों उलझी थी, आख़िर क्यों वह असली मुद्दों पर ठीक से बीजेपी को घेर नहीं पाई?

बेरोज़गारी है सबसे बड़ा मुद्दा

राजस्थान में जनता के तीन मुद्दे प्रमुख हैं। पहला बेरोज़गारी, दूसरा महँगाई और तीसरा किसानों का कर्ज़ और फ़सलों का सही दाम न मिलना। राजस्थान में बेरोज़गारी कितना बड़ा मुद्दा है, इसका अंदाज़ा आप इसी से लगा सकते हैं कि कांग्रेस और बीजेपी दोनों ने अपने घोषणापत्र में बेरोज़गारी भत्ता देने का वादा किया, बीजेपी ने 5000 और कांग्रेस ने 3500 रुपये प्रतिमाह। बीजेपी ने तो घोषणापत्र में हर साल 30 हज़ार सरकारी नौकरियाँ और पाँच साल में निजी क्षेत्र में 50 लाख रोज़गार उपलब्ध कराने का वादा किया। यानी बीजेपी और कांग्रेस, दोनों जानते हैं कि युवा नौकरियाँ नहीं मिलने से गुस्से में हैं और उनका वोट निर्णायक होगा। बीजेपी के लिए चिंता की बात यह है कि नोटबंदी और जीएसटी के बाद शहरों में रियल स्टेट का काम ठप है, गाँवों-कस्बों और शहरों में मज़दूरी मिलने के सबसे बड़े क्षेत्र के ठप होने के चलते यहाँ बेकारी की समस्या है। मनरेगा ठप होने से गाँव में भी काम नहीं है। चाय, चीनी, रसोई का सामान, तेल और गैस की क़ीमतें बढ़ना भी चुनावी मुद्दा है। 2013 में जिस तरह यूपीए पर महँगाई का मुद्दा भारी पड़ा, वैसा ही इस बार भी होने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।

निर्णायक साबित होंगे किसान

पश्चिम राजस्थान में बाड़मेर से लेकर कई ज़िलों में सूखे के हालात हैं। पानी का संकट है, दूसरी और हाड़ौती और शेखावटी के किसान पहले से ही फसलों का समर्थन मूल्य नहीं मिलने से नाराज़ हैं। कई किसान ख़ुदकुशी कर चुके हैं। किसानों का मुद्दा पश्चिम राजस्थान, शेखावटी और हाड़ौती में निर्णायक साबित हो सकता है। किसानों की नाराज़गी का आभास दोनो पार्टियों को है, इसी वजह से बीजेपी ने घोषणापत्र में किसानों को समर्थन मूल्य पर फ़सल का दाम दिलाने का वादा किया, तो कांग्रेस ने किसानों को रिझाने के लिए कृषि ऋण सत्ता में आने के दस दिन में ही माफ़ करने औऱ वृद्ध किसानों को पेंशन देने का वादा किया।

लामबंद हुए हैं दलित

राजस्थान में जनता के वोट का आधार इतना ही नहीं। कई और भी मसले हैं। उनमें सबसे बड़ा दलितों की लामबंदी। दलित निर्णायक भूमिका में हैं। राजस्थान में सबसे अधिक वोट बैंक दलितों का ही है, क़रीब 17.8 फ़ीसदी जिसमें से 13.9 फ़ीसदी ग्रामीण क्षेत्र में हैं। 2 अप्रैल के बाद दलित लामबंद हुए हैं, अब वे सियासत के मैदान में एकजुट हैं। दलितों का राजस्थान में ग़ुस्सा 2 अप्रैल के पहले से है। ग़ुस्सा केवल सत्ताधारी पार्टी बीजेपी से नहीं, कांग्रेस से भी है। लेकिन दलित बँट नहीं रहे हैं, दलितों की नाराज़गी की शुरुआत हुई डांगावास कांड से।नागौर ज़िले के डांगावास में 14 मई 2015 को दंबगों ने 5 दलितों की ट्रैक्टर से कुचल कर हत्या कर दी थी। दलितों के ग़ुस्से की एक वजह इस हत्याकांड के बाद पुलिस के आरोपियों के ख़िलाफ़ कार्रवाई के बजाय लीपापोती है। बीकानेर में दलित छात्रा डेल्टा मेघवाल के साथ दबंगों द्वारा रेप और हत्या के बाद सरकार की जाँच में ढिलाई से उनका ग़ुस्सा बढ़ा है। ऐसे ही दलित उत्पीड़न के क़रीब एक दर्जन मामलों में सरकारी रवैये ने दलितों को नाराज़ किया है। डांगावास कांड में दबंगों को नाराज़गी के डर से पीड़ित दलित परिवारों का साथ न देने वाली कांग्रेस से भी नाराज़ हैं।

राजपूतों की नाराज़गी से बढ़ी चिंता

राजस्थान के चुनावों में चार प्रमुख प्रभावशाली जातियों जाट, राजपूत, मीणा और गुर्जर की भूमिका भी चुनाव में अहम रहती है। बीजेपी की चिंता राजपूतों की नाराज़गी रही। राजपूत बीजेपी के बजाय मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे से ज़्यादा ख़फ़ा रहे। अजमेर लोकसभा उपचुनाव में राजपूतों ने खुलकर बीजेपी का विरोध किया था। बीजेपी ने कांग्रेस से अधिक राजपूतों को टिकट देकर नाराज़गी ख़त्म करने की कोशिश की, बावजूद इसके यह ख़त्म नहीं हुई।दो प्रमुख राजपूत संगठन करणी सेना और राजपूत सभा ने तो खुलेआम झालरापाटन में वसुंधरा राजे के ख़िलाफ़ चुनाव प्रचार किया। राजे के ख़िलाफ़ कांग्रेस प्रत्याशी मानवेंद्र सिंह के समर्थन में राजपूत सम्मेलन किए। गुर्जर आरक्षण का मसला नहीं सुलझने से गुर्जरों का ग़ुस्सा भी बरकरार है। हालाँकि बीजेपी ने किरोड़ी लाल मीणा को बीजेपी में शामिल कर मीणा वोट बैंक को अपने पाले में लाने की कोशिश की है। बीजेपी की एक और मुश्किल कर्मचारी संगठनों की चुनावी तारीखों के एलान से ठीक पहले की नाराज़गी भी है। कई कर्मचारी संगठन चुनाव की तारीख़ों के एलान से पहले आंदोलन पर थे। मंत्रालयी कर्मचारियों से लेकर रोडवेज कर्मचारी तक। कर्मचारी संगठनों और सरकार के बीच समझौता नहीं होने से बीजेपी को कर्मचारियों के ग़ुस्से का भी डर है।  

बेनीवाल ने चुनाव को बनाया त्रिकोणीय

मुद्दों से इतर चुनावी समीकरण भी मायने रखते हैं। हनुमान बेनीवाल की पार्टी राष्ट्रीय लोकतांत्रिक पार्टी ने 52 प्रत्याशी मैदान में उतारे हैं। लेकिन पश्चिम राजस्थान की जाटों के प्रभाव वाली एक दर्जन सीटों पर हनुमान की पार्टी के प्रत्याशियों ने चुनाव को त्रिकोणीय बना दिया है। बीजेपी और कांग्रेस के बाग़ियों ने भी क़रीब 25 सीटों पर दोनों पर्टियों के गणित को उलझाया। बीजेपी के चार मंत्री बाग़ी होकर चुनाव लड़ रहे हैं। कांग्रेस में भी दो जिलाध्यक्ष से लेकर कई पूर्व विधायकों ने कांग्रेस प्रत्याशियों की मुश्किलें बढ़ा रखी हैं।

गुटबाजी से परेशान रही कांग्रेस

बीजेपी के लिए तो सत्ताविरोधी लहर मुश्किल है ही, कांग्रेस ने अपने लिए ख़ुद मुश्किलें खड़ी की हैं। सचिन पायलट औऱ अशोक गहलोत के अपने-अपने समर्थकों को टिकट दिलवाने के बाद टिकट से वंचित दोनों गुट के समर्थकों ने कई जगह कांग्रेस की हवा बिगाड़ दी। इसी तरह विपक्ष के नेता रामेश्वर डूडी के बीकानेर डिविजन में टिकट बंटवारे में दख़ल ने बीकानेर में कांग्रेस की कई सीटों पर मुश्किलें बढ़ा दीं। कांग्रेस की दूसरी चुनौती रही सीएम पद की होड़। सत्ता में आने से पहले ही सचिन पायलट, अशोक गहलोत और रामेश्वर डूडी के बीच मुख्यमंत्री बनने की होड़ के चलते कांग्रेस में खेमेबंदी रही जिसका असर मतदान के दौरान भी पड़ सकता है डैमेज कंट्रोल के लिए कांग्रेस ने अहमद पटेल को जयपुर भेजा। पार्टी ने हर विधानसभा सीट पर तैनात पर्यवेक्षक की रिपोर्ट के आधार पर ज़िलों में जाकर भितरघात रोकने और बागियों को मनाने की कोशिश की।राजस्थान विधानसभा चुनाव महज़ वसुंधरा राजे सरकार के भाग्य का फ़ैसला नहीं है, वह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए भी परीक्षा है। नोटबंदी, जीएसटी के फ़ायदे-नुक़सान की असली परीक्षा राजस्थान समेत पांच राज्यों के चुनाव में ही है। नतीजे 2019 के चुनाव की दिशा तय करने में निर्णायक हो सकते हैं।
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