राजस्थान हाईकोर्ट ने ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के अधिकारों से जुड़े एक पुराने फ़ैसले में बदलाव किया है। कोर्ट ने 30 मार्च को दिए गए फ़ैसले के अंत में एपिलॉग यानी अतिरिक्त टिप्पणियाँ जोड़ी थीं। इसमें ट्रांसजेंडर पर्सन्स (प्रोटेक्शन ऑफ राइट्स) अमेंडमेंट बिल 2026 पर तीखी आलोचनाएँ थीं। इसमें बदलाव करते हुए आलोचना वाले तीन पैराग्राफ को हटा दिया गया है।
हाई कोर्ट ने 2 अप्रैल को स्पष्ट करने वाला आदेश जारी किया। इसमें पुरानी टिप्पणियों को बदलकर दो नए पैराग्राफ जोड़े गए हैं। अब कोर्ट ने कहा है कि मुख्य फ़ैसला उस समय के क़ानूनी स्थिति को ध्यान में रखकर दिया गया था और राज्य सरकार को उसका पालन करना चाहिए।

क्या हुआ था 30 मार्च को?

जस्टिस अरुण मोंगा और जस्टिस योगेंद्र कुमार पुरोहित की बेंच ने एक ट्रांसजेंडर महिला गंगा कुमारी की याचिका पर फ़ैसला सुनाया था। गंगा कुमारी राजस्थान पुलिस में काम करती हैं। उन्होंने जनवरी 2023 की राज्य सरकार की अधिसूचना को चुनौती दी थी, जिसमें ट्रांसजेंडर व्यक्तियों को अन्य पिछड़ा वर्ग यानी ओबीसी में शामिल किया गया था।
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उस फ़ैसले में कोर्ट ने कहा था कि ओबीसी में शामिल करना सिर्फ़ दिखावा है और इससे ट्रांसजेंडर लोगों को कोई असली फ़ायदा नहीं मिलता। कोर्ट ने राज्य सरकार को निर्देश दिया कि ट्रांसजेंडर व्यक्तियों की हाशिए पर पड़ी स्थिति का पता लगाने के लिए एक समिति बनाए और सही कदम सुझाए।

कोर्ट के मुख्य निर्देश क्या?

सार्वजनिक नौकरियों और शिक्षा में ट्रांसजेंडर उम्मीदवारों को अतिरिक्त 3% अंक का वेटेज दिया जाए। ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के लिए प्रभावी आरक्षण की व्यवस्था हो। फ़ैसले के अंत में जस्टिस अरुण मोंगा ने एक अलग एपिलॉग लिखी थी। उसमें उन्होंने ट्रांसजेंडर पर्सन्स अमेंडमेंट बिल 2026 पर टिप्पणी की थी।
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कोर्ट ने कहा था

  • यह बिल ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के स्व-निर्धारण के अधिकार को छीन लेता है। अब जेंडर पहचान को सरकारी प्रमाण-पत्र, जाँच या प्रशासनिक मंजूरी पर निर्भर करना पड़ेगा।
  • पहले सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि हर व्यक्ति खुद अपनी जेंडर पहचान चुन सकता है। लेकिन नया बिल कहता है कि जेंडर पहचान अब सरकारी सर्टिफिकेट, जांच या एडमिनिस्ट्रेटिव मंजूरी पर ही मिलेगी।
  • राज्य को ध्यान रखना चाहिए कि कानून संवैधानिक गारंटी को कमजोर न करे।
  • कोर्ट ने यह भी कहा था कि राज्य को आरक्षण जैसी सकारात्मक कार्रवाइयों से ट्रांसजेंडर लोगों के अधिकारों को जिंदा रखना चाहिए ताकि वे कागजी न रह जाएं।

अब क्या बदला?

2 अप्रैल को कोर्ट ने साफ़ किया कि एपिलॉग में कुछ हिस्सा ग़लती से शामिल हो गया था। वह न तो इरादतन था और न ही ज़रूरी। इसलिए कोर्ट ने उन तीन पैराग्राफ को हटा दिया और उनकी जगह दो नए पैराग्राफ़ जोड़ दिए।

नए वर्जन में कोर्ट ने कहा

  • मुख्य फ़ैसला उस तारीख की कानूनी स्थिति को ध्यान में रखकर दिया गया था।
  • राज्य सरकार का कर्तव्य है कि फ़ैसले के निर्देशों के अनुसार बनी कोई भी नीति उस समय के मौजूदा कानून के दायरे में रहे।
  • कोर्ट ने यह भी साफ़ किया कि पूरा एपिलॉग अब भी फ़ैसले का हिस्सा है, लेकिन आलोचनात्मक हिस्सा हटा दिया गया है।
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क्या है पूरा मामला

2014 का एनएएलएसए फ़ैसला: सुप्रीम कोर्ट ने ट्रांसजेंडर व्यक्तियों को तीसरे जेंडर के रूप में मान्यता दी और उन्हें सामाजिक-शैक्षिक रूप से पिछड़ा माना। कोर्ट ने उनके लिए रिजर्वेशन की सिफारिश की थी। 2023 में राजस्थान सरकार ने उन्हें ओबीसी सूची में शामिल किया, लेकिन इससे एससी/एसटी या अन्य वर्ग के ट्रांसजेंडर लोगों को फायदा नहीं मिल पाता था।

ट्रांसजेंडर अमेंडमेंट बिल 2026: मार्च 2026 में संसद ने यह बिल पास किया। इसमें ट्रांसजेंडर पहचान को अपनी पसंद के बजाय कुछ प्रमाणीकरण की प्रक्रिया रखने का प्रावधान है। इसे लेकर ट्रांसजेंडर समुदाय और विपक्ष ने काफी विरोध किया था।