कंगना रनौत AI Generated cartoon
कुछ लोग प्रधानमंत्री की प्रतिभा पर संदेह करते हैं। यह उनका लोकतांत्रिक अधिकार है। लोकतंत्र में आदमी को अपने बारे में अच्छी और दूसरे के बारे में ख़राब राय बनाने की पूरी स्वतंत्रता होती है। मगर मैं प्रधानमंत्री की प्रतिभा का हमेशा से प्रशंसक रहा हूँ। विशेषकर उनकी उस प्रतिभा का, जिससे वे प्रतिभाओं को पहचान लेते हैं।
प्रधानमंत्री को देश चलाने के लिए प्रतिभा को पहचानना भी आना चाहिए है। हालाँकि देश तो कई लोग चला लेते हैं लेकिन प्रतिभा पहचानने के लिए अलग तरह की दृष्टि चाहिए। वही दृष्टि जो निशिकांत दुबे में नीति-निर्माता, गिरिराज सिंह में दार्शनिक और रमेश बिधूड़ी में भविष्य का संसदीय आदर्श देख सके।
प्रधानमंत्री की इस प्रतिभा को प्रधानमंत्री की मंडली में देखा जा सकता है। ऐसी-ऐसी प्रतिभाएँ उन्होंने खोज निकालीं कि जिन्हें देखकर खुद प्रतिभा भी हैरान हो जाती होगी कि वह उनमें अब तक कहाँ छिपी हुई थी।
उन्होंने वर्षों पहले समझ लिया था कि इस देश में प्रतिभा का वितरण बहुत असमान है। कुछ राज्यों में खनिज मिलते हैं, कुछ में नदियाँ मिलती हैं और कुछ में प्रतिभाएँ मिलती हैं। इसलिए उन्होंने प्रतिभा की खोज वहीं से शुरू की जहाँ उन्हें सबसे अधिक संभावना दिखाई दी—गुजरात से।
गुजरात में जो ज़्यादा प्रतिभाशाली मिले, उन्हें मंत्री बना दिया। जो कम प्रतिभाशाली मिले, सलाहकार बना दिया। और जो न्यूनतम प्रतिभाशाली दिखे, उन्हें प्रवक्ता बना दिया या आईटी सेल में डाल दिया। जहाँ तक प्रतिभाहीनों का सवाल है तो उनके खोजी दिमाग़ ने मार्गदर्शक मंडल बना दिया।
भारतीय राजनीति में मार्गदर्शक मंडल वह स्थान है जहाँ नेताओं को सम्मानपूर्वक यह बताया जाता है कि अब देश को नहीं, अपने रक्तचाप, मधुमेह आदि को मार्गदर्शन दीजिए।
आडवाणी, जोशी और दूसरे बुज़ुर्ग नेता वर्षों तक यह भ्रम पालते रहे कि उनमें असाधारण प्रतिभा है। मगर प्रधानमंत्री उनकी प्रतिभा से परिचित थे। राजनीति में सबसे कठिन काम विरोधियों को हराना नहीं, अपने पूर्वजों को अप्रासंगिक साबित करना होता है। प्रधानमंत्री ने यह काम बड़ी सफलता से किया।
इसी कारण जब लोग पूछते हैं कि आखिर कंगना रनौत में ऐसा क्या है कि प्रधानमंत्री उन्हें इतना महत्व देते हैं, तो मुझे उन लोगों पर तरस आता है। वे कंगना में केवल एक अभिनेत्री या सांसद देख रहे हैं, जबकि प्रधानमंत्री उनमें भावी प्रधानमंत्री देख रहे हैं।
मुझे पूरा विश्वास है कि कंगना रनौत भाजपा की दीर्घकालीन राजनीतिक परियोजना हैं। मोदी जी उन्हें धीरे-धीरे गढ़ रहे हैं। वे अपना उत्तराधिकारी तैयार कर रहे हैं। लोग समझ नहीं पा रहे कि अनाप-शनाप बोलने वाली कंगना को बार-बार बोलने क्यों दिया जा रहा है। मैं समझाता हूँ। प्रधानमंत्री को पता है कि नेता पैदा नहीं होता, वह विवादों में पकता है। कंगना अभी पक रही हैं। वे पक भी रही हैं और देश को पका भी रही हैं।
मोदी जी जानते हैं कि भविष्य महिला नेताओं का है और भाजपा में उनका अकाल है। कभी स्मृति ईरानी थीं। उनसे बड़ी उम्मीदें थीं। वे अब फुँकी हुई कारतूस हैं। धीरे-धीरे वे एक असामान्य से सामान्य नेता बनती चली गईं। राजनीति में सामान्य होना सबसे असामान्य अयोग्यता है। स्मृति ईरानी अब बयान देती हैं, जबकि कंगना स्वयं बयान बन जाती हैं।
राजनीति में कुछ लोग समाचार बनाते हैं और कुछ लोग समाचार बन जाते हैं। कंगना दूसरी श्रेणी में आती हैं।
कंगना की सबसे बड़ी योग्यता क्या है? उनकी सबसे बड़ी योग्यता है—आत्मविश्वास। ज्ञान कम हो सकता है, मगर आत्मविश्वास उनका लांग जंप मारता रहता है। राजनीति में आत्मविश्वास का महत्व ज्ञान से कहीं अधिक है। ज्ञान आदमी को सावधान बनाता है, आत्मविश्वास उसे नेता बनाता है। ज्ञान संदेह पैदा करता है, आत्मविश्वास समर्थक पैदा करता है। भारतीय राजनीति में कई बार तथ्य हार जाते हैं और आत्मविश्वास चुनाव जीत जाता है।
इसीलिए जब उन्होंने कहा कि भारत को असली आज़ादी 2014 में मिली थी और वह भीख थी, तो लोग हँसे, नाराज़ हुए, बहस करने लगे। मगर प्रधानमंत्री ने उस बयान में संभावना देखी होगी।
राजनीति में मौलिकता का बड़ा संकट है। अधिकांश नेता पुराने ढर्रे पर चलते हैं। कंगना ढर्रों का नया इतिहास रच देती हैं। साधारण लोग इतिहास पढ़ते हैं, असाधारण लोग इतिहास को फिर से लिखते हैं। कंगना दूसरी श्रेणी में आती हैं।
हाल में उन्होंने जेन ज़ी के एक हिस्से को "गटर जनरेशन" कह दिया। देश भर में बवाल मच गया। सोशल मीडिया में कोहराम मच गया। मगर कंगना पैर जमाकर खड़ी रहीं। थोड़ा-बहुत स्पष्टीकरण दिया और आगे बढ़ गईं। जो बात आईटी सेल संकेतों में कहती है, कंगना उसे लाउड स्पीकर पर कह देती हैं।
लोकतंत्र में सच बोलना गुण है, मगर याद रह जाना उससे बड़ा गुण है। कंगना जानती हैं कि बयान की सत्यता नहीं, उसकी यात्रा महत्वपूर्ण होती है।
रामदेव प्रसंग को ही लीजिए। वे पूरे आत्मविश्वास के साथ अखाड़े में उतरे थे। उन्हें लगा होगा कि उनका कपालभाति देखते ही कंगना मैदान छोड़ देंगी। मगर हुआ उल्टा। कंगना ने ऐसा दाँव लगाया कि रामदेव को सरेंडर करना पड़ा। स्पष्टीकरण देते हुए पीछे हट गए।
चालाक नेतृत्व का पहला नियम है—हमला इतना अप्रत्याशित करो कि सामने वाला जवाब देने के बजाय स्पष्टीकरण देने लगे। कंगना इस कला में निपुण हैं। इसीलिए प्रधानमंत्री उन्हें ध्यान से देख रहे होंगे।
किसान आंदोलन के समय भी कंगना ने असाधारण क्षमता दिखाई थी। दूसरे नेता आंदोलन की आलोचना कर रहे थे। कंगना आलोचना से आगे निकल गईं। उन्होंने आंदोलन में ड्रग्स भी देख लिए, विदेशी षड्यंत्र भी देख लिया, रेप भी देख लिए और पेड़ों पर लटकती लाशें भी देख लीं।
यह सामान्य दृष्टि नहीं है। साधारण नेता को वही दिखाई देता है जो सामने होता है। असाधारण नेता को वह भी दिखाई देता है जो कहीं नहीं होता। राजनीति में दूरदृष्टि वही है जो दूसरों को दिखाई न दे। और महादूरदृष्टि वह है जो अस्तित्व में ही न हो।
कंगना के बयानों में उनका बड़बोलापन भी दिखाई देता है। यह भी एक महत्वपूर्ण राजनीतिक गुण है। इतिहास गवाह है कि भारतीय राजनीति में संकोची लोगों ने बहुत कम सफलता पाई है। जनता उस आदमी से प्रभावित होती है जो बिना झिझक ऐसी बात कह दे जिसे सुनकर बाक़ी लोग झिझक जाएँ। संभव है यह कला उन्होंने प्रधानमंत्री के पुराने भाषणों का अध्ययन करके सीखी हो। शिष्य वही सफल होता है जो गुरु की शैली सीखकर उसे आगे बढ़ा दे।
फिर नड्डा जी वाला प्रसंग भी कम महत्वपूर्ण नहीं है। नड्डा जी ने कहा कि मत बोलिए। कंगना ने इसे एक सुझाव की तरह लिया और सुझावों का सम्मान करते हुए बोलती रहीं। कार्यकर्ता आदेश मानता है। नेता आदेश सुनता है। महान नेता आदेश को सलाह में बदल देता है। कंगना तीसरी श्रेणी में आती हैं। प्रधानमंत्री अपने अनुभव से जानते हैं कि अनुशासन संगठन को चलाता है, लेकिन अवज्ञा इतिहास बनाती है।
वैसे कंगना की सबसे बड़ी राजनीतिक पूँजी उनकी क़ातिल मासूमियत है। यह दुर्लभ वस्तु है। यह उन लोगों में पाई जाती है जिन्हें अपने ज्ञान पर इतना विश्वास होता है कि उन्हें ज्ञान की ज़रूरत ही महसूस नहीं होती।
भारतीय जनता इस गुण को बहुत पसंद करती है। उसे चालाक लोग पसंद नहीं आते। उसे ऐसे लोग पसंद आते हैं जो असंभव बात को भी पूरे विश्वास से कहें। वे जानते हैं कि सामने वाला झूठ बोल रहा है, मगर उसकी मासूमियत पर अपनी समझ क़ुर्बान कर देते हैं।
हमारे यहाँ सत्य से ज़्यादा आत्मविश्वास का सम्मान होता है। पूरे आत्मविश्वास के साथ झूठ बोलने वालों को जनता प्रधानमंत्री तक बना देती है। प्रधानमंत्री से बेहतर यह बात कौन जानता होगा, इसलिए वे कंगना में संभावना देखते होंगे। उन्हें मालूम है कि राजनीति में बुद्धिमत्ता हमेशा पूँजी नहीं होती, कभी-कभी बाधा भी बन जाती है।
फिर कंगना फ़िल्म स्टार हैं, सेलेब्रिटी हैं। ये उनके दावे को और मज़बूत करता है। लोकतंत्र में जनता अब नेता कम और चेहरा ज़्यादा चुनती है। चुनावी सभा और रियलिटी शो में उतना ही फ़र्क बचा है जितना गंजेपन और बाल उगाने के विज्ञापन में। अमेरिका में ट्रम्प इसका उदाहरण हैं। दक्षिण भारत में फ़िल्मी सितारों ने बार-बार सत्ता हासिल की है। जनता को यह भरोसा रहता है कि जिसने पर्दे पर नायक की भूमिका निभाई है, वह असल जीवन में भी कुछ न कुछ कर ही लेगा।
हर नेता चर्चा में रहना चाहता है। कंगना चर्चा को अपने पीछे दौड़ाती हैं। जो नेता विवाद पैदा करता है वह सफल हो सकता है। जो विवादों का स्थायी स्रोत बन जाए, वह ऐतिहासिक हो जाता है। और आधुनिक राजनीति में इससे बड़ा नेतृत्व गुण कोई नहीं।
दिव्यदृष्टि वाले प्रधानमंत्री यह सब देख रहे होंगे। वे जानते हैं कि अमित शाह संगठन चला सकते हैं। योगी आदित्यनाथ अस्सी-बीस कर सकते हैं। लेकिन कंगना सुर्ख़ियों में बनी रह सकती हैं। और इक्कीसवीं सदी में सुर्ख़ियों में बने रहना प्रशासन चलाने से कहीं अधिक कठिन काम है।
कंगना ने संघ परिवार की राजनीति से स्वयं को जोड़ लिया है। वे मुंबई को मिनी पाकिस्तान बता चुकी हैं। वे हिंदुत्व के पक्ष में एक से एक बयान दे चुकी हैं। रानी लक्ष्मीबाई बनकर उन्होंने राष्ट्रवादी होने का प्रमाण भी दे दिया है। भाजपा और संघ परिवार को किसी नेता में और क्या चाहिए?
राजनीति में विचारधारा वह सीढ़ी है जिससे नेता ऊपर चढ़ता है। कंगना यह सीढ़ी पहले ही पकड़ चुकी हैं। मुझे तो कभी-कभी डर लगता है कि भविष्य में उन्हें "हिंदू हृदय साम्राज्ञी" जैसी कोई उपाधि भी मिल सकती है। लोकतंत्र में जब सब कुछ बदल रहा है तो उपाधियों का लिंग परिवर्तन भी होना चाहिए।
और फिर एक ऐसी योग्यता भी है जिसके बारे में लोग कम बात करते हैं। कंगना अंग्रेज़ी जानती हैं। यह सुनकर कुछ लोगों को हँसी आ सकती है, मगर प्रधानमंत्री नहीं हँसेंगे। अंग्रेज़ी न जानने की वजह से कितना मज़ाक बनता है, वे भलीभाँति जानते हैं। वे नहीं चाहेंगे कि उनका उत्तराधिकारी इस कष्ट से गुज़रे।
राजनीति में कई बार अंग्रेज़ी ज्ञान से अधिक काम अंग्रेज़ी का आत्मविश्वास आता है। कंगना के पास दोनों हैं।
अगर आपके मन में अभी भी कंगना की प्रतिभा को लेकर संदेह है तो आपको समझना चाहिए कि लोकतंत्र संभावनाओं का दूसरा नाम है और भारतीय लोकतंत्र तो संभावनाओं का महाकुंभ है। यहाँ जो बात आज व्यंग्य लगती है, वही कल राजनीतिक नैरेटिव बन जाती है।
याद कीजिए, जब कंगना ने कहा था कि भारत को असली आज़ादी 2014 में मिली थी, लोग हँस रहे थे। जब उन्होंने किसान आंदोलन पर टिप्पणियाँ कीं, लोग हँस रहे थे। जब उन्होंने जेन ज़ी को "गटर जनरेशन" कहा, तब भी लोग हँस रहे थे।
मगर राजनीति में एक पुराना नियम है—लोग पहले हँसते हैं, फिर आदत डाल लेते हैं। और आदत लोकतंत्र की सबसे बड़ी शक्ति है। आज जिन बातों पर लोग चुटकुले बना रहे हैं, कल उन्हीं बातों पर तालियाँ भी बजा सकते हैं।
अगर आप अभी भी मेरे आकलन से सहमत नहीं हैं तो आप राजनीति को पुराने सिलेबस से पढ़ रहे हैं। नया सिलेबस कुछ और है। नए सिलेबस में प्रशासन वैकल्पिक विषय है, वायरल होना अनिवार्य विषय है और सुर्ख़ियों में बने रहना मुख्य परीक्षा है।
इस कसौटी पर कंगना रनौत केवल योग्य नहीं हैं, वे ओवर-क्वालिफ़ाइड हैं। इसलिए मुझे पूरा विश्वास है कि प्रधानमंत्री उन्हें यूँ ही नहीं बोलने दे रहे। वे उनका प्रशिक्षण कर रहे हैं। पहले उन्हें इतिहास बदलना सिखाया गया। फिर विवाद पैदा करना। फिर अपनी ही पार्टी की बात न सुनना। फिर विरोधियों से लड़ना। अब कंगना राष्ट्र को चौंकाने के एडवांस पाठ्यक्रम में प्रवेश कर चुकी हैं। बस एक अंतिम परीक्षा बाकी है—प्रधानमंत्री पद की।
हालाँकि उसमें अभी समय है। क्योंकि 2047 तक प्रधानमंत्री की कुर्सी खाली होने की संभावना उतनी ही है जितनी उनके पीओके पर कब्ज़ा करने की। फिर भी राजनीति में कुछ नहीं कहा जा सकता। अगर कहीं से उनका बुलावा आ जाए या जनता ही कह दे कि हटो जी तो उन्हें जाना पड़ सकता है।
ध्यान रहे कि भारतीय राजनीति में भविष्य हमेशा पहले मज़ाक बनकर आता है। मोदी जी उस दौर से गुज़र चुके हैं। नाली से गैस बनाने वाली उनकी तरकीब याद कीजिए। कंगना रनौत शायद उसी मज़ाक की अगली कड़ी हैं।