उलटबांसी (इमेज AI जनरेटेड)
नेताओं में एक ख़ूबी भरपूर पाई जाती है। भरपूर मतलब सचमुच भरपूर। वे प्रशंसा करने में कोई कंजूसी नहीं करते। न-न, दूसरों की नहीं, अपनी। दूसरे की प्रशंसा करने में उन्हें ख़तरा दिखाई देता है। कहीं ऐसा न हो कि जिसकी तारीफ़ कर रहे हैं, वह कल को कुर्सी के सामने अपनी कुर्सी रखकर बैठ जाए। राजनीति में दूसरे की तारीफ़ करना कभी-कभी अपनी ही कुर्सी के पाए काटने जैसा होता है।
हाँ, किसी ऐसे आदमी की तारीफ़ की जा सकती है जिससे भविष्य में भी कोई ख़तरा न हो। वह तारीफ़ सुनकर गदगद हो जाए और बदले में दो-चार कसीदे पढ़ दे। राजनीति में इसे लेन-देन कहते हैं। बाक़ी लेन-देन में हिसाब रखना पड़ता है, इसमें दोनों पक्ष एक-दूसरे को महान बताकर हिसाब बराबर कर लेते हैं।
अपनी प्रशंसा के मामले में नेताओं की भूख असीमित होती है। पूरी हाँडी अकेले चट कर जाएँगे, फिर पूछेंगे—कुछ और है? प्रशंसा की पाचन शक्ति इतनी ग़ज़ब की होती है कि सौ आदमी मिलकर तारीफ़ करें तो भी पेट नहीं भरता। लेकिन किसी दूसरे की तारीफ़ सुनते ही अपच हो जाती है। मुँह का स्वाद बिगड़ता है और निंदा रस की उल्टियाँ शुरू हो जाती हैं।
अब मोदी जी को ही देखिए। राजनीति में पच्चीस साल हो गए। मुख्यमंत्री रहे, प्रधानमंत्री बने। इस दौरान गोदी मीडिया, भक्तों और चारणों ने प्रशंसा के इतने कीर्तिमान स्थापित किए कि प्रशंसा ख़ुद शर्माने लगे। कभी वे विश्वगुरु बनते हैं, कभी महानायक, कभी युगपुरुष। उनकी छींक में भी कोई गूढ़ मंत्र खोज लिया जाता है। सामान्य आदमी छींकता है तो रूमाल ढूँढ़ता है, नेता छींकता है तो उसमें अंधभक्त राष्ट्र का भविष्य देखने लगते हैं। इतनी प्रशंसा के बाद भी भूख बची है तो मानना पड़ेगा कि मामला असाधारण है। शायद प्रशंसा में कोई ऐसा विटामिन है जिसकी कमी दूर नहीं हो रही। भक्तों की भी अपनी सीमा है। एक ही आदमी को रोज़ महान बताओ, दोपहर में विश्वगुरु बनाओ और शाम को अवतार घोषित कर दो। अगले दिन क्या करोगे? देवताओं की सूची में भी आख़िर कितने पद खाली होंगे!
खुद की प्रशंसा!
ऐसे में मोदी जी को ख़ुद ही अपनी प्रशंसा के लिए मैदान में उतरना पड़ता है। भूख आदमी से क्या-क्या नहीं करवाती! कोई आधी रात को रसोई में पहुँच जाता है, कोई मिठाई का डिब्बा खोल लेता है। कई बार तो जूठन भी चाँटने लगता है। कोई भुक्खड़ अपनी महानता का प्रसंग ख़ुद ही छेड़ देता है। वैसे भूख सबको लगती है, बस थाली का आकार अलग-अलग होता है।
मोदी जी के इस कथन को भी इसी संदर्भ में देखना चाहिए। उन्होंने कहा कि वे आज भी सीखना चाहते हैं। सुनकर मन प्रसन्न हुआ। पच्चीस साल बाद भी सीखने की इच्छा बची हुई है, यह कम उपलब्धि नहीं। कुछ लोग पच्चीस साल में सीख जाते हैं, कुछ पच्चीस साल तक दूसरों को सिखाते रहते हैं। तीसरी श्रेणी उन लोगों की है जो पच्चीस साल तक सिखाने के बाद घोषणा करते हैं कि अब वे सीखना चाहते हैं।
मगर भाई, इतने साल कर क्या रहे थे? जनता को उम्मीद थी कि आप अपनी ग़लतियों से सीखेंगे। नोटबंदी से, बेरोज़गारी से, किसानों के आंदोलन से, कोरोना के दौरान हुई परेशानियों से। मगर हर बार लगा कि ग़लती से कुछ नहीं सीखा, उल्टे विद्यार्थी ने पाठ्यपुस्तक बंद करके अलमारी में रख दी।
कहावत है कि ग़लती करना बुरा नहीं, ग़लती दोहराना बुरा है। राजनीति में इसका संशोधित संस्करण चलता है—ग़लती करो, उसे उपलब्धि बताओ और फिर उपलब्धि की प्रशंसा करवाओ। इससे ग़लती का बोझ भी उतर जाता है और प्रशंसा की एक नई खेप भी आ जाती है। सीखने के लिए आदमी को मानना पड़ता है कि उसे सभी कुछ नहीं आता। बस, यहीं गड़बड़ हो जाती है। नेता यह मान ले तो नेता कैसा! वह तो जनता को समझाने के लिए पैदा हुआ है। अर्थव्यवस्था उसकी बात न माने तो अर्थव्यवस्था को समझाने लगता है। बेरोज़गार नौकरी माँगे तो उसे राष्ट्र-निर्माण का पाठ पढ़ाता है। किसान अपनी उपज का दाम माँगे तो उसे राष्ट्र-हित समझाता है। जनता के पास समस्या होती है, सत्ता के पास व्याख्या। समस्या जस की तस रहती है, व्याख्या बदल जाती है। फिर घोषणा होती है कि जनता से बहुत कुछ सीखा है।
दरअसल, सीखने की इच्छा ज़ाहिर करने के पीछे विनम्रता का प्रदर्शन भी होता है। राजनीति में विनम्र होना ज़रूरी नहीं, विनम्र दिखना ज़रूरी है। हाथ जोड़िए, सिर झुकाइए, आवाज़ में करुणा घोलिए और अपनी साधारण पृष्ठभूमि का ऐसा क़िस्सा सुनाइए कि लोग भूल जाएँ कि आप अब सत्ता के शिखर पर हैं। यह अलग बात है कि हाथ जोड़ने के बाद वही हाथ सत्ता के तमाम औज़ारों पर भी पहुँच जाते हैं।
विनम्रता का मुखौटा बड़ा उपयोगी होता है। इससे अहंकार भी सुरक्षित रहता है और जनता को विनम्रता भी दिखाई देती है। समस्या तब आती है जब मुखौटा खिसक जाता है। तब आदमी अपने चेहरे को सँभालने के बजाय आईने को दोष देने लगता है।
महानता का भी एक उद्योग है। एक आदमी घटना सुनाता है, दूसरा उसमें भावुकता मिलाता है, तीसरा उसे ऐतिहासिक बताता है और चौथा घोषणा कर देता है कि ऐसा प्रसंग दुनिया में पहली बार हुआ है। कुछ दिनों बाद मूल घटना से ज़्यादा उसका महिमा-मंडन याद रह जाता है।
इस उद्योग में सवाल पूछना असभ्यता है। कोई डिग्री के बारे में पूछ ले या किसी दावे का प्रमाण माँग ले तो समर्थकों को लगता है कि राष्ट्रीय सम्मान पर हमला हो गया। सम्मान इतना कमज़ोर है कि एक सवाल से टूट जाता है, लेकिन महानता इतनी मज़बूत है कि रोज़ नए प्रमाणपत्र जारी करती है।
जो सचमुच पढ़ता-लिखता है, उसे अपनी विद्वत्ता का ढोल हर समय नहीं पीटना पड़ता। लेकिन जिसे पढ़ने से ज़्यादा पढ़े-लिखे दिखाई देने में दिलचस्पी हो, वह हर जगह ज्ञान का मंच खोजता है। शिक्षा पर भाषण देगा, विद्यार्थियों को सलाह देगा, परीक्षा पर चर्चा करेगा। बस, कोई उससे पूछ न बैठे—महाराज, आपने ख़ुद कौन-सा पाठ सीखा?
यह वैसा ही है जैसे कोई आदमी तैरना नहीं जानता, मगर नदी किनारे खड़े होकर तैराकों को प्रशिक्षण देता रहे। कोई कहे कि गुरुजी, आप भी पानी में उतरिए, तो जवाब मिले—मेरा काम तैरना नहीं, तैराकी को प्रोत्साहित करना है।
राजनीति में ऐसी अनेक विधाएँ हैं जिनमें प्रदर्शन ही उपलब्धि माना जाता है। वैसे मोदी जी ने कुछ सीखा ज़रूर होगा। पच्चीस साल कोई कम समय नहीं होता। उन्होंने सीखा होगा कि चुनाव चोरी कैसे की जाती है, विपक्षी नेताओं को कैसे तोड़ा जाता है, सरकारों को कैसे गिराया जाता है, मीडिया में छवि कैसे बनाई जाती है। अस्सी-बीस की राजनीति के ज़रिए कैसे देश को उलझाए रखा जाता है।
उन्होंने यह भी सीखा होगा कि जब कोई आपकी प्रशंसा न करे तो उसकी निंदा शुरू कर देनी चाहिए। इससे ध्यान अपनी कमियों से हटकर दूसरे की कमियों पर चला जाता है। इसीलिए नेहरू, इंदिरा गांधी और कांग्रेस का नाम बार-बार लेते हैं। वर्तमान का हिसाब माँगने वाले को अतीत का बही-खाता पकड़ा देते हैं। कोई पूछता है कि आपने क्या किया, तो बताने लगते हैं कि सत्तर साल में क्या नहीं हुआ। दुकानदार से पूछिए कि सामान ख़राब क्यों है, वह पड़ोसी दुकानदार की बुराइयाँ गिनाने लगता है। घर में पानी न आए तो मालिक बताने लगता है कि पिछली सरकार के समय नल ही नहीं था। आदमी शिकायत लेकर आया था, उसे इतिहास का व्याख्यान मिल गया।
पुराने नेताओं की कमियाँ गिनाने से आज की सरकार की कमियाँ अपने आप अच्छाइयों में नहीं बदल जातीं। मगर अपना आईना धुँधला हो तो पड़ोसी के घर की खिड़की पर पत्थर मारना आसान होता है। सीखने की एक और शर्त है—पुरानी धारणाओं को अनलर्न करना। लेकिन अगर दिमाग़ में अनलर्न करने का बटन ही ख़राब हो तो नई सीख कहाँ से आएगी? कंप्यूटर में नई फ़ाइल खोलने की कोशिश करो तो पुराना प्रोग्राम खुल जाता है। आदमी सवाल नया सुनता है, जवाब वही पुराना देता है।
संघ की वैचारिक ट्रेनिंग पर भी यही सवाल लागू होता है। यदि कुछ धारणाएँ इतनी पक्की कर दी जाएँ कि उन पर सवाल उठाना ही अपराध लगे, तो स्वतंत्र चिंतन के लिए जगह कहाँ बचेगी? मशीन भी अनुशासित होती है। बटन दबाइए, वही काम करेगी। संघ के पाठ्यक्रम में सॉफ्टवेयर अपडेट करने का प्रावधान नहीं होता।
जिसे सचमुच सीखना होता है, वह अपने लिए शिक्षक ढूँढ़ लेता है। वह भारत यात्रा पर निकल सकता है। कुली, ड्राइवर, मज़दूर, किसान—कोई भी उसका शिक्षक हो सकता है। वह उन लड़कियों से भी सीख सकता है जो अपने अधिकारों के लिए सड़कों पर उतरती हैं। वह दलितों, आदिवासियों और उन लोगों के अनुभव सुन सकता है जिनकी तकलीफ़ें उसकी बनाई हुई तस्वीर में जगह नहीं पातीं। लेकिन इसके लिए सुनने की आदत चाहिए। प्रशंसा सुनने में सिर अपने आप हिलता है, आलोचना सुनने में सिरदर्द होने लगता है। जो नेता केवल प्रशंसकों से सीखता है, वह अपनी प्रशंसा करने के नए तरीक़े सीखता है, जनता की तकलीफ़ें नहीं।
लेकिन लोगों के बीच जाकर सुनने का अभ्यास और मंच पर खड़े होकर उन्हें समझाने का अभ्यास एक जैसे नहीं हैं। पहली स्थिति में अपनी धारणाएँ बदलने की गुंजाइश होती है, दूसरी में केवल माइक की दिशा बदलती है। यही तो सीखने की असली मुसीबत है। आदमी दूसरों को सिखाने निकले तो उसकी प्रतिष्ठा बढ़ती है, ख़ुद सीखने बैठ जाए तो उसे अपनी अज्ञानता का पता चल सकता है। और इतने वर्षों की महानता के बाद अज्ञानता का पता चलना कोई मामूली हादसा नहीं होगा। भक्तों को नई व्याख्या खोजनी पड़ेगी, चारणों को नई उपमा और गोदी मीडिया को नया नरैटिव। सीखने की सबसे बड़ी बाधा किताब का बंद होना नहीं, अपने को किताब समझ बैठना है।
मोदी जी को सीखना पसंद है। बस, सीखने के लिए उन्हें अपने भीतर बैठे सर्वज्ञानी को थोड़ी देर छुट्टी पर भेजना होगा।
लेकिन मुश्किल यह है कि सर्वज्ञानी ख़ुद प्रधानमंत्री हो तो उसे छुट्टी पर भेजने का आदेश जारी कौन करे?