ऐसा भारतीय राजनीति के इतिहास में शायद पहली बार हुआ है कि किसी दूसरे देश की प्रधानमंत्री हमारे यहाँ इतनी बड़ी राजनीतिक शक्ति बन जाएँ कि दिल्ली से लेकर देवरिया तक, संसद से लेकर पान की दुकान तक, हर जगह उन्हीं की चर्चा हो।
पहले राजनीति जाति से हिलती थी, धर्म से हिलती थी, महँगाई से हिलती थी, घोटालों से हिलती थी। अब राजनीति मुस्कान से हिल रही है। एक सेल्फी से हिल रही है। एक हैशटैग से हिल रही है। "छपरा हिले, बलिया हिले, पटना हिलेला" वाले गाने को राष्ट्रीय राजनीतिक गान घोषित कर देना चाहिए, क्योंकि इस समय तो पूरा इंडिया ही हिलेला हो रहा है।
और हिले भी क्यों न?
मैडम जॉर्जिया मेलोनी ने काम ही ऐसा कर दिया है। उन्होंने हमारे प्रधानमंत्री की दशकों की तपस्या को सोशल मीडिया की रीलों में बदल दिया है। जो व्यक्ति कभी विश्वगुरु, आत्मनिर्भरता, पंचप्राण और अमृतकाल जैसी भारी-भरकम चीज़ों से पहचाना जाता था, वह अचानक इंटरनेट पर "मेलोडी" के नाम से ट्रेंड करने लगा। यह कोई छोटी क्षति नहीं है।
एक राष्ट्रीय नेता को मीम सामग्री में बदल देना किसी जैविक हथियार से कम खतरनाक नहीं माना जाना चाहिए।
बताइए, यह कोई बात हुई कि कोई नेता यह कह दे कि मोदी जी सबसे लपककर गले इसलिए मिलते हैं मानो मेलोनी से मिल रहे हों? यह तो सीधा-सीधा चरित्र पर हमला है। आदमी विदेश नीति चला रहा है और लोग उसे रोमांस नीति से जोड़ने लगें, इससे बड़ा अन्याय क्या होगा?
माना कि हम भारतीयों के मन में स्त्री-पुरुष संबंधों को लेकर कुछ अतिरिक्त कल्पनाशक्ति भरी हुई है, वह तुरंत अंदर से गुदगुदी महसूस करने लगता है। दो लोग पाँच मिनट बात कर लें तो हम उनकी शादी तक की कल्पना कर लेते हैं। कोई मुस्कुरा दे तो हम प्रेमकथा लिख देते हैं। कोई सेल्फी आ जाए तो हम पूरी वेब सीरीज़ बना देते हैं।
कई बार हमारी प्रतिक्रियाएं हमारी ईर्ष्या से भी पैदा होती है। वही कि हाय हुसैन हम न हुए वाला अफ़सोस। मगर आप भी तो ज़रा सोचिए। आप यूरोप की नेता हैं। आपको दुनिया के सबसे संवेदनशील लोकतंत्र की भावनाओं का ख़याल रखना चाहिए था। आपने ही पहले "मेलोडी" कहकर वह सेल्फी डाली थी। उसके बाद जो हुआ, वह इतिहास है। सोशल मीडिया ने उस एक तस्वीर को ऐसा अपनाया जैसे किसी भूखे आदमी को मुफ्त का बुफे मिल गया हो। लोग दिन-रात उसी पर शोध करने लगे। अंतरराष्ट्रीय संबंधों का ऐसा मानवीकरण शायद संयुक्त राष्ट्र के इतिहास में भी नहीं हुआ होगा।
भारत में शब्द कभी सिर्फ़ शब्द नहीं होते। यहाँ मितरों कहकर चुनाव जीते जाते हैं और "मेलोडी" से मीम बन जाते हैं। राजनीति में कई गठबंधन विचारधारा से बनते हैं, कई स्वार्थ से और कुछ केवल कैमरे के सामने मुस्कुरा देने से।
और फिर हमारे मोदी जी कोई सामान्य व्यक्ति तो हैं नहीं। वे तपस्वी हैं। त्यागी हैं। ब्रह्मचारी हैं। उनका चरित्र इतना निर्मल है कि चाँद पर दाग़ मिल सकते हैं, लेकिन उनकी छवि पर नहीं।
मैं पुरानी बातों में नहीं जाऊँगा, मगर यह तो आप भी जानती ही हैं कि उन्होंने देश के लिए अपनी पत्नी का त्याग बहुत पहले ही कर दिया था। राजनीति के इतिहास में ऐसे उदाहरण कम मिलते हैं जहाँ किसी नेता ने प्रधानमंत्री बनने से कई दशक पहले ही प्रधानमंत्री जैसी तैयारी शुरू कर दी हो। लोग चुनाव जीतने के बाद त्याग करते हैं, उन्होंने तो त्याग का अग्रिम भुगतान कर दिया था।
इसलिए उनकी तपस्या का सम्मान कीजिए। जिस आदमी ने गृहस्थी को राष्ट्रहित में स्थगित कर दिया हो, उसे आप इंस्टाग्राम की रीलों में मत घसीटिए। यह किसी साधु के आश्रम के बाहर डिस्को खोलने जैसा है।
हमारे यहाँ कहा भी गया है कि त्यागी पुरुष को संसार नहीं हराता, संसार की स्त्रियाँ हराती हैं। विश्वामित्र से लेकर विश्वगुरु तक इतिहास गवाह है। उनका दोष नहीं है। दोष परिस्थितियों का है। दोष वैश्विक राजनीति का है। और सबसे अधिक दोष आपकी मुस्कान का है। फिर आपने ये भी कह दिया हम सोशल मीडिया के सबसे ज़्यादा मशहूर कपल हैं। कपल शब्द सुनते ही किसी के भी कान लाल हो जाते हैं।
आपको शायद अंदाज़ा नहीं कि आपकी वजह से भारत का कितना नुकसान हुआ है। मैं तो यहाँ तक कहूँगा कि पिछले कुछ वर्षों में देश की जो दुर्गति हुई है, उसके पीछे आर्थिक नीतियाँ, बेरोज़गारी, महँगाई या प्रशासनिक विफलताएँ नहीं, बल्कि आप हैं। आपके चक्कर में बंदा अपने काम पर ध्यान दे पाए तब न! वह जब भी विदेश यात्रा की योजना बनाता होगा, उसके मन में जी-20, जी-7, ब्रिक्स या संयुक्त राष्ट्र नहीं, कहीं न कहीं रोम का नक्शा चमक जाता होगा।
हिंदू शास्त्रों में भी स्पष्ट लिखा गया है कि पुरुष को उसके कर्तव्य पथ से विचलित करने की सबसे बड़ी शक्ति नारी है। अब देखिए, शास्त्रों की बात सही निकली न? जिसने विपक्ष, मीडिया, आंदोलनों, चुनावों, किसानों और अर्थव्यवस्था तक से कभी विचलित न होने का अद्भुत रिकॉर्ड बनाया हो, वह अगर किसी चीज़ से विचलित दिखाई दे रहा है तो मामला गंभीर है।
मैं तो कहता हूँ कि भारत की विदेश नीति का सबसे बड़ा संकट चीन-पाकिस्तान नहीं, आकर्षण है, मोहिनी मंत्र है, वशीकरण है। सीमा पर घुसपैठ का समाधान मिल सकता है, लेकिन मन में घुसपैठ का नहीं। भू-राजनीति का पहला नियम है—जिस देश को जीत न सको, उसके नेताओं को व्यस्त कर दो।
वैसे यह भी सच है कि गोरी चमड़ी हमारी एक पुरानी राष्ट्रीय कमजोरी रही है। अगर वह चमड़ी विलायती हो, सत्ता में हो और कैमरे के सामने मुस्कुरा भी दे, तो मामला बीमारी की श्रेणी में पहुँच जाता है। इतिहास गवाह है कि इस रोग में व्यक्ति लोकलाज भूल जाता है। फिर उसे घर, परिवार, समाज, संसद, संविधान—किसी की चिंता नहीं रहती।
ग़ालिब ने डेढ़ सौ साल पहले ही चेतावनी दे दी थी—
"इश्क़ ने ग़ालिब निकम्मा कर दिया,
वरना हम भी आदमी थे काम के।"
मगर मेरी चिंता इससे भी आगे की है। मुझे तो कहीं-कहीं यह पूरा मामला अंतरराष्ट्रीय साज़िश जैसा भी लगता है। क्या पता सीआईए और मोसाद ने मिलकर कोई अत्याधुनिक "ऑपरेशन मेलोडी" शुरू कर रखा हो?
क्या पता विश्वगुरु परियोजना को रोकने के लिए यह कोई भावनात्मक मिसाइल दागी गई हो? जब दुनिया की सारी ताक़तें भारत की प्रगति से भयभीत हैं, तब यह संभावना पूरी तरह ख़ारिज भी नहीं की जा सकती। लोकतंत्र में प्रमाण से ज़्यादा महत्वपूर्ण कल्पना होती है। प्रमाण अदालत में काम आता है, कल्पना टीवी डिबेट में। और भारत वह महान देश है जहाँ हर घटना के पीछे या तो मुग़ल होते हैं, या नेहरू, या फिर कोई विदेशी साज़िश।
मैं तो राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार से आग्रह करूँगा कि इस मामले की जाँच कराई जाए। देश को जानने का अधिकार है कि कहीं कोई हनी ट्रैप, इमोशनल ट्रैप, डिप्लोमैटिक ट्रैप या इंस्टाग्राम ट्रैप तो नहीं चल रहा। हालाँकि, एक और संभावना है। कहीं यह सब सोनिया गाँधी की कोई दूरगामी रणनीति तो नहीं?
आख़िर वे भी इटली से हैं। मेलोनी भी इटली से हैं। इटली छोटा सा देश है। लोग एक-दूसरे को जानते-पहचानते ही होंगे। हो सकता है वहाँ किसी पुराने व्हाट्सऐप ग्रुप में दोनों जुड़ी हों। हो सकता है किसी फैमिली फ़ंक्शन में मुलाक़ात हुई हो। हो सकता है राहुल जी के राजनीतिक भविष्य के लिए कोई बहुस्तरीय भूमध्यसागरीय योजना चल रही हो। राजनीति में कुछ भी असंभव नहीं है।
मोहन भागवत जी को भी इस विषय पर ध्यान देना चाहिए। आप लोग वर्षों से "इटली कनेक्शन" पर शोध करते रहे हैं, लेकिन यह वाला कोण आपकी नज़र से कैसे छूट गया? राम माधव को तुरंत एक विशेष कार्यबल का प्रमुख बनाया जाए। मामला गंभीर है। कहीं ऐसा न हो कि आपका स्वयंसेवक संघ से पहले इंस्टाग्राम का स्वयंसेवक बन जाए।
लेकिन चलिए, षड्यंत्रों को छोड़ भी दें। तथ्य यह है कि आपकी वजह से भारत की राजनीति में अनावश्यक उथल-पुथल मची हुई है। सोशल मीडिया ऐसा व्यवहार कर रहा है मानो देश में बेरोज़गारी, महँगाई, शिक्षा, स्वास्थ्य, सीमा सुरक्षा, लोकतंत्र, संविधान जैसी कोई समस्या बची ही न हो। हर तरफ़ वही तस्वीरें, वही मीम, वही रील, वही "मेलोडी"।
इतिहास में क्लियोपेट्रा ने साम्राज्य हिलाए थे। हेलन के कारण युद्ध हुए थे। मगर सोशल मीडिया के युग में पहली बार किसी प्रधानमंत्री की मुस्कान और किसी दूसरी प्रधानमंत्री की सेल्फी ने पूरे देश को राजनीतिक विश्लेषक बना दिया है।
पहले लोग पूछते थे कि देश कहाँ जा रहा है। अब लोग पूछ रहे हैं कि प्रधानमंत्री कहाँ जा रहे हैं।
इसलिए मैडम, आपसे विनम्र निवेदन है। कृपया हमारे प्रधानमंत्री को बख़्श दीजिए। यह बंदा पहले ही बहुत परेशान है। विपक्ष पीछे पड़ा है। सहयोगी पीछे पड़े हैं। अपने लोग पीछे पड़े हैं। कभी भागवत जी कटाक्ष कर देते हैं, कभी कोई पुराना स्वयंसेवक। संसद में भी चैन नहीं, सोशल मीडिया में भी चैन नहीं।
ऐसे में आप अपने नयनों के बाण चलाना बंद कर दीजिए। मुस्कुराइए भी तो राजनयिक सीमा के भीतर। मिलिए भी तो कम-से-कम दो मीटर की दूरी से। सेल्फी लेते समय बीच में किसी संयुक्त राष्ट्र अधिकारी को खड़ा कर लिया कीजिए।
और अगर मोदी जी भावावेश में कुछ अतिरिक्त उत्साह दिखा दें—जो कि इस उम्र के मनुष्य के नाते संभव है—तो कृपया आप ही संयम रखिए। आखिर भारतीय संस्कृति में महिलाओं से यही अपेक्षा की जाती है। पुरुषों को तो हम बहुत कुछ माफ़ कर देते हैं, लेकिन महिलाओं को नहीं। हमारी परंपरा का यह महान लोकतांत्रिक सिद्धांत आप समझ ही गई होंगी।
मैं जानता हूँ कि आप दोनों में वैचारिक समानताएँ भी हैं। आप मुसोलिनी की विरासत को सराहती रहती हैं और इधर हमारे यहाँ भी मुसोलिनी के प्रशंसकों की कई पीढ़ियाँ राष्ट्र निर्माण में लगी हुई हैं। राजनीतिक शैली में भी कुछ समानताएँ दिखाई देती हैं। लेकिन कृपया, बस यहीं तक।
इसके आगे मत जाइए। क्योंकि अगर भारतीय राजनीति में अगला बड़ा संकट किसी आर्थिक नीति, युद्ध, महामारी या चुनावी हार से नहीं, बल्कि एक मुस्कान और एक सेल्फी से पैदा हो गया, तो इतिहासकारों को लोकतंत्र की किताबें फिर से लिखनी पड़ जाएँगी।
इसलिए, मैडम मेलोनी, एक भारतीय नागरिक की करबद्ध प्रार्थना स्वीकार कीजिए। भारत को नुकसान मत पहुँचाइए। विश्वगुरु परियोजना को बचाइए।
और सबसे महत्वपूर्ण—कृपया हमारे अंदरूनी मामलों में दख़ल मत दीजिए।
भारत की संप्रभुता को फिलहाल कोई खतरा नहीं है, लेकिन भारतीय प्रधानमंत्री की एकाग्रता पर गंभीर संकट मंडरा रहा है।