देश ख़तरे में है।
नहीं, सीमा पर युद्ध नहीं छिड़ा है। रुपया अभी भी पीएम की प्रतिष्ठा के हिसाब से गिर रहा है। महँगाई अपनी ड्यूटी निभा रही है। बेरोज़गारी भी संविधान में मिले अपने अधिकारों का भरपूर उपयोग कर रही है। लोकतंत्र भी सरकारी विज्ञापनों में स्वस्थ, प्रसन्न और पुष्ट दिखाई देता है।
तो संकट इनसे कहीं बड़ा है। संकट ये है कि जेन ज़ी ने प्रधानमंत्री को गाली दे दी है। हमेशा चरित्र को लेकर डंडा लेकर खड़े रहने वाले कह रहे हैं मेरी भैंस को डंडा क्यों मारा।
संस्कृत के आचार्य, हिंदी के अध्यापक और भारतीय संस्कृति के स्वयंभू संरक्षक एक साथ मूर्छित हो रहे हैं। जिस पीढ़ी को अपने पुरखों के चरणों में बैठकर विनम्रता सीखनी थी, वह मीम बना रही है। जिसे श्रद्धा रखनी थी, वह मज़ाक उड़ा रही है। जिसे हाथ जोड़कर प्रणाम करना था, वह उन पर जूते-चप्पल चला रही है।
यह चरित्र का अभूतपूर्व संकट नहीं तो और क्या है? जब कोई नौजवान प्रधानमंत्री को कुछ न समझे, भाषण सुनकर भाव-विभोर होने के बजाय उसकी पैरोडी बनाने लगे, तब यह मान लेना चाहिए कि उसके चरित्र निर्माण में कहीं न कहीं कमी रह गई है।
इस देश का दुर्भाग्य रहा है कि इसने बाँध बनाए, उद्योग लगाए, सड़कें बनाईं, पुल बनाए मगर अपने चरित्र निर्माण के बारे में गंभीरता से नहीं सोचा, सोचा तो योजना नहीं बनाई, बनाई तो उस पर अमल नहीं किया।
देश की समस्या ये भी रही है कि जब इलाज के लिए डॉक्टर नहीं पहुँचते तो नीम हकीम पहुँच जाते हैं, झोला छाप डॉक्टर पहुंच जाते हैं, झाड़-फूँक वाले पहुंच जाते हैं।
इसलिए ऐसे शून्य में देश के चारित्रिक स्वास्थ्य को ठीक करने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ आगे आया। सौ साल पहले उसने चरित्र निर्माण का ठेका ले लिया और अब ये स्थायी बन गया है।
हमारे समाज की एक विडंबना ये भी है कि जिनका अपना चरित्र सबसे गड़बड़ होता है वे दूसरों के चरित्र को सुधारने में लगे रहते हैं। आरएसएस का तो सौ साल का चरित्र इतना दाग़दार है कि वह दुनिया की सबसे बड़ी वाशिंग मशीन से भी साफ़ न हो, मगर वह चरित्र सुधार में लगा हुआ है।
इस देश में लोग स्कूल खोलते हैं, अस्पताल खोलते हैं, कारख़ाने खोलते हैं। संघ ने चरित्र निर्माण का कारख़ाना खोला। लगभग एक सदी से यह कारख़ाना चल रहा है। सरकारें आईं और गईं, संविधान बना, युद्ध हुए, आर्थिक नीतियाँ बदलीं, मगर चरित्र निर्माण का उद्योग चलता रहा।
दरअसल, संघ के ध्वजाधारियों की थीसिस थी कि भारत की सबसे बड़ी समस्या गरीबी, अशिक्षा या बीमारी नहीं है। भारत की सबसे बड़ी समस्या चरित्र है। राष्ट्र का चरित्र गिरा हुआ है। या तो वह चरित्रहीन है, या दुश्चरित्र है, या फिर अभी तक संघ की परिभाषा वाला चरित्र प्राप्त नहीं कर पाया है। लेकिन इस बात पर वह अडिग है कि चरित्र निर्माण आवश्यक है।
इस देश में सबसे अच्छी बात यही है कि यहाँ कोई भी किसी के चरित्र पर सवाल कर सकता है। वह भी जो ख़ुद चरित्रहीन हो।
लिहाज़ा, संघियों ने इसका सर्टिफिकेट खुद बनाया, ख़ुद उस पर ठप्पा लगाया और फिर फ्रेम करके देश भर में टाँग दिया।
तो ये तो स्वयंसिद्ध है कि ये संघ चरित्रवान है और इसीलिए राष्ट्र के चरित्र निर्माण का ठेका भी उसी के पास है। इसी मक़सद से उसने देश भर में चरित्र निर्माण की फैक्ट्रियाँ खोलीं। शाखा लगाईं, स्कूल खोले और प्रचारकों को दुनिया भर में दौड़ाया।
उन्हीं भगीरथ प्रयासों का सुफल है कि आपको संघ परिवार द्वारा उत्पादित एक से एक चरित्रवान दिख रहे हैं। उसी के द्वारा निर्मित सच्चरित्र प्रचारक आज सत्ता के शीर्ष पर बैठे हैं। आप कभी उन्हें ग़ालियाँ देना तो दूर अपशब्द बोलते भी नहीं देखेंगे।
उन्हें सार्वजनिक जीवन की मर्यादा और पद की गरिमा का इतना ख्याल रहता है कि वे ख़ुद को दी गई ग़ालियाँ उसी तरह पी जाते हैं जैसे भोले बाबा विष पी जाते हैं और उफ़ भी नहीं करते। और तो और ग़ालियाँ देने वालों तक को तुरंत माफ़ कर देते हैं। वे स्वयं कभी ऐसा कुछ नहीं करते कि उन्हें माफ़ी मांगनी पड़े।
आप संघ से निकले चरित्रवानों को देख लीजिए। वे कभी आपको झूठ बोलते नहीं मिलेंगे। उनका चरित्र ही इस तरह से गढ़ा गया है कि सच के सिवा वे कुछ बोल ही नहीं सकते। अगर कोई सिर पर कट्टा रखकर झूठ बोलने के लिए मजबूर करेगा तो भी वे झूठ बोलने के बजाय मरना पसंद करेंगे।
ये संघ के चरित्र निर्माण का ही परिणाम है कि पूरी राजनीति से झूठ ऐसे ग़ायब हो गया है जैसे राम मंदिर से चढ़ावा। आज से बारह साल पहले समूची भारत भूमि में असत्य का राज था और आज हर तरफ सत्य का बोलबाला है। मुकेश कुमार के व्यंग्य से
उलटबांसी स्तंभ
केंद्रीय मंत्रिमंडल से लेकर राज्यों के मुख्यमंत्री, सांसद, विधायक यहाँ तक कि एक छोटा सा कार्यकर्ता भी झूठ बोलने से पहले सौ बार सोचता है और फिर झूठ नहीं बोलने का फ़ैसला करता है।
बीजेपी की आईटी सेल को देखिए, दिन-रात वह झूठ के ख़िलाफ़ लड़ती रहती है। विपक्षी दल इतना झूठ फैलाते हैं मगर वह उफ़ नहीं करती और अपने अभियान से तनिक भी विचलित नहीं होती।
अगर राजा हरिश्चंद्र की कहानी सच है और वे आज अवतरित हो जाएं तो गर्व से उनका सीना 56 इंच का हो जाएगा। इतने सारे सत्यवादियों से उनका सामना होगा कि वे ख़ुद को बौना महसूस करने लगेंगे। संभव है कि किसी शाखा में प्रवेश लेकर पुनः प्रशिक्षण लेना चाहें।
चरित्र का दूसरा पक्ष निजी जीवन से जुड़ा है, आचरण से जुड़ा है। साधारण आदमी पत्नी को छोड़ दे तो गैर-जिम्मेदार कहलाता है। महापुरुष छोड़ दे तो त्यागी कहलाता है। साधारण आदमी अपने निजी जीवन के बारे में सवालों से घिर जाए तो सफाई देता फिरता है। महापुरुषों के मामले में सवाल ही असभ्यता माने जाते हैं।
हमारी परंपरा में त्याग का बड़ा महत्व है। कुछ लोगों ने धन त्यागा, कुछ ने सुख त्यागा, कुछ ने राज्य त्यागा। आधुनिक राजनीति ने इस परंपरा को आगे बढ़ाते हुए जवाबदेही तक का त्याग कर दिया।
यह भी एक प्रकार का तप है। इसीलिए समय-समय पर जब सीडी, डीवीडी, वीडियो, ऑडियो या अन्य प्रमाण सार्वजनिक जीवन में आते हैं तो चरित्र को कोई विशेष क्षति नहीं पहुँचती। यदि प्रमाण आपके पक्ष में हों तो वे सत्य हैं। यदि आपके विरुद्ध हों तो वे षड्यंत्र हैं। और यदि बहुत अधिक हों तो विदेशी साज़िश हैं।
जहाँ तक भ्रष्टाचार की बात है तो उसे रोकने के लिए चरित्र निर्माण के दौरान ही सदाचार की एक चिप दिमाग़ में फिट कर दी जाती है। यही वज़ह है कि उन्हें कभी भ्रष्ट आचरण करते हुए कभी नहीं देखा गया। बल्कि इसके उलट भ्रष्टाचारियों को सुपथ पर लाने के लिए हर संभव प्रयास किए जाते रहे हैं।
हाँ, उन्हें बदनाम करने के लिए तरह-तरह के षड़यंत्र ज़रूर रचे गए। पार्टी अध्यक्ष को पैसे देते हुए वीडियो बना लिए गए, एक नेता को धन लेने के बाद ये कहते हुए दिखा दिया गया कि पैसा ख़ुदा तो नहीं मगर ख़ुदा से कम भी नहीं है। मगर आख़िर में हुआ क्या। सचाई की जीत हुई।
अब अगर कोई अच्छे परिधान पहने, दिन में पाँच बार बदले या महंगे चश्मे, जूते, कलम, कार, हवाई जहाज़ इस्तेमाल करे तो इसे चरित्र से जोड़कर नहीं देखा जाना चाहिए। ये उसके शौक भी हो सकते हैं और शौक तो हर किसी को रखना चाहिए। विलासिता और सादगी का चरित्र से कोई लेना-देना नहीं है।
एप्स्टीन फाइल्स वगैरा सब अमेरिका जैसे पतित देश में होती हैं। हाँ, कभी किसी का किसी पर दिल आ जाए और उसे अपने प्रिय को सुरक्षित रखने के लिए निगरानी करनी पड़े तो ये कोई पाप नहीं है। जंग और मोहब्बत में इतना तो जायज़ है ही।
असली बात ये है कि राष्ट्रवादी चरित्र होना चाहिए। राष्ट्रवादी चरित्र का मतलब है दूसरे धर्मों और उनके मानने वालों से तीव्रतम घृणा। हिंसा का भाव सदैव मन में हिलोरे लेते रहना चाहिए।
गौरक्षक इसके जीते जागते उदाहरण हैं। त्यौहारों के मौक़ों पर चरित्रवान काँवडिए भी इसका प्रदर्शन करते रहते हैं। रामनवमी और हनुमान जयंती जैसे मौक़ों पर विधर्मियों को परेशान करना, उकसाना, हमले करना भी सच्चरित्र नागरिक होने की पहचान है।
उनकी चारित्रिक दृढ़ता अभूतपूर्व होती है। वे हत्याएं, बलात्कार और दूसरे अपराध करते हुए या ऐसा करने वालों को जय-जयकार करने से वे कतई पीछे नहीं हटते। चाहे उनकी कितनी ही निंदा-भर्त्सना होती रहे वे निष्ठापूर्वक जुटे रहते हैं।
सबसे ज़्यादा गिरावट नारियों के चरित्र में हुई है। वे ख़ुद को मर्दों के बराबर समझने लगी हैं और तमाम तरह के हक़ मांग रही हैं। ये दुश्चरित्र महिलाएं हैं। इन्हें घर में रहना चाहिए। घरों में रहकर पति की सेवा करना चाहिए और बच्चे पैदा करनी चाहिए।
आदर्श स्त्री वही है जिसके चरित्र की चिंता उसे छोड़कर बाकी सबको हो। वह क्या पहने, कहाँ जाए, किससे प्रेम करे, किससे विवाह करे—इन प्रश्नों पर समाज सदियों से शोध करता आया है।
चरित्र निर्माण कार्यक्रम का ये बहुत बड़ा लक्ष्य है कि नारियों को काबू में करना है क्योंकि वह बेलगाम हो जाएगी और फिर वह सिगरेट पिएंगी, लिव इन में रहने लगेंगी, ग़ालियाँ देंगी और जाने क्या-क्या करेंगी।
राष्ट्र बाद में सुधरेगा। पहले लड़की के कपड़े सुधरने चाहिए। और ग़ाली तो बिल्कुल नहीं देना चाहिए। वह केवल मर्द दे सकते हैं।
लेकिन चरित्र का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष अभी बाकी है। वह है—घृणा। आधुनिक राष्ट्रवादी चरित्रशास्त्र में चरित्र का पहला लक्षण यह है कि आप किससे घृणा करते हैं। अपने धर्म से प्रेम करना पर्याप्त नहीं है। दूसरे के धर्म से नफ़रत करना भी आना चाहिए। यदि किसी अजनबी आदमी की टोपी, दाढ़ी, नाम, भोजन या प्रार्थना देखकर आपकी राष्ट्रीय चेतना जागृत हो जाए तो समझिए चरित्र निर्माण सही दिशा में चल रहा है।
पहले लोग अपने पड़ोसियों को पड़ोसी समझते थे। अब वे उन्हें जनसांख्यिकीय खतरा समझने लगे हैं। यह चरित्र निर्माण की महान उपलब्धि है। चरित्रवान नागरिक सुबह उठकर यह नहीं सोचता कि आज कौन-सा काम करना है। वह पहले यह सोचता है कि राष्ट्र को किससे खतरा है। यदि उसे कोई खतरा नहीं मिलता तो वह व्हाट्सऐप खोल लेता है। वहाँ कुछ न कुछ मिल ही जाता है।
और अब जेन ज़ी पर वापस लौटते हैं। उसका सबसे बड़ा अपराध यह नहीं है कि उसने गालियाँ दीं। गालियाँ तो इस देश की एक प्राचीन सांस्कृतिक विरासत हैं। यहाँ सांसदों से लेकर पीएम तक, सबने अपने-अपने ढंग से इस परंपरा को समृद्ध किया है।
उसका अपराध यह है कि उसने संघ के चरित्र प्रमाणपत्र को मानने से पहले चरित्र की जाँच शुरू कर दी है। वह संघ के उत्पाद का इस्तेमाल करने से पहले उसकी गुणवत्ता पूछती है। वह कारख़ाने की दीवार पर लिखे विज्ञापन के बजाय माल का निरीक्षण करती है। वह पूछती है कि अगर सौ साल से चरित्र निर्माण हो रहा है तो फिर यह झूठ कहाँ से आया, यह नफ़रत कहाँ से आई, यह हिंसा कहाँ से आई, यह पाखंड कहाँ से आया?
यहीं वह गलती कर बैठती है। क्योंकि चरित्र निर्माण की किसी भी सफल परियोजना में सवाल पूछने की भूमिका बहुत सीमित होती है। श्रद्धा चाहिए, जिज्ञासा नहीं। अनुशासन चाहिए, तर्क नहीं। प्रमाणपत्र चाहिए, प्रमाण नहीं।
संघ की मुश्किल यही है। उसने सौ साल तक चरित्रवान बनाए। लेकिन अब उसे ऐसी पीढ़ी मिल गई है जो चरित्र से पहले चरित्र निर्माता का बायोडाटा माँग रही है।
उसे इस पीढ़ी पर गोमूत्र का छिड़काव करना चाहिए। उसे गोबर से लीपना चाहिए। नफ़रत और हिंसा से लैस करना चाहिए। शायद वह इस दिशा में सोच भी रहा हो। लोग कहते हैं संघ बहुत दूर की सोचता है। हो सकता है उसके पास अगले सौ साल का रोड मैप भी हो।
बहरहाल, अभी तो संकट गंभीर है। ग़ाली तो केवल उसका लक्षण है। बीमारी कहीं गहरी है और इसलिए बोर्ड अभी भी टँगा हुआ है— “असुविधा के लिए खेद है। राष्ट्र के चरित्र की मरम्मत जारी है।”