हम सॉफ़्टवेयर निर्यात करते हैं, इंजीनियर निर्यात करते हैं, डॉक्टर निर्यात करते हैं। फिर चुनावी विशेषज्ञ क्यों नहीं? आज दुनिया में चुनाव सबसे बड़ा राजनीतिक उद्योग है। भारतीय चुनाव व्यवस्था पर मुकेश कुमार का तीखा राजनीतिक व्यंग्य।
घर की मुर्गी दाल बराबर। ज्ञानेश कुमार की भी यही हालत है। जिन कामों के लिए उनका मान-सम्मान होना चाहिए, उन्हीं कामों के लिए उनकी लानत-मलामत हो रही है। चुनाव प्रक्रिया में उन्होंने नाना प्रकार के प्रयोग किए हैं, लोकतंत्र को मज़बूत बनाया। उनके लिए उन्हें इनाम-ओ-इकराम मिलना चाहिए था, मगर कुछ लोग मुक़दमा चलाने और जेल भेजने की बातें कर रहे हैं।
दुनिया में प्रतिभा की यही त्रासदी है कि अपने देश में वह विवाद कहलाती है और विदेश में विशेषज्ञता।
लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि पूरी दुनिया पारखियों से खाली हो गई है। भारत में लोग चाहे ज्ञानेश कुमार की क़द्र न करें, मगर विदेशों में उनकी पूछ-परख बढ़ रही है। और आने वाले दिनों में और बढ़ेगी।
कुछ समय पहले ट्रम्प ने भारतीय चुनाव आयोग की प्रशंसा ऐसे ही नहीं की थी। वे दूर बैठे आयोग की कार्यकुशलता का अध्ययन कर रहे थे। उन्हें मालूम था कि ज्ञानेश कुमार जैसे व्यक्ति के नेतृत्व में ही आयोग वह सब कर पा रहा है जिसकी कल्पना साधारण लोग नहीं कर सकते।
मोदी की तरह ट्रम्प भी जानते हैं कि चुनाव जीतने के दो ही रास्ते हैं—या तो जनता को बदल दो या मतदाता सूची को। ज़ाहिर है कि जनता बदलना बहुत कठिन काम है। इसीलिए उन्होंने बड़ी विनम्रता से प्रधानमंत्री मोदी से कहा है कि ज्ञानेश कुमार को कुछ समय के लिए अमेरिका भेज दिया जाए।
अमेरिकी राष्ट्रपति जब विनम्रता से बात करता है तो वह निवेदन नहीं करता, हुक्म देता है। और जब कठोरता से बात करता है तो वह हुक्म नहीं देता, अल्टीमेटम देता है।
ट्रम्प ने कहा कि अमेरिकी चुनाव प्रणाली संकट में है। भारत और दूसरे देशों से घुसपैठिये भर गए हैं, मतदाता सूचियाँ संदिग्ध हैं और मिड-टर्म चुनाव सामने हैं। ऐसी कठिन घड़ी में उन्हें ज्ञानेश कुमार जैसे विशेषज्ञ की आवश्यकता है।
मोदी सरकार इस निवेदन से पस-ओ-पेश में है। दिक्कत यह है कि उसे भी इस महान कलाकार की सख़्त ज़रूरत है। कई राज्यों में चुनाव हैं। अगर ज्ञानेश कुमार चले गए तो चुनाव कौन जितवाएगा? चुनावी धांधलियों का प्रबंधन कौन करेगा? विपक्ष को कौन उलझाएगा? आचार संहिता का उल्लंघन कौन नज़रअंदाज़ करेगा? रेवड़ियाँ कौन बँटवाएगा? मतदाताओं को कौन लुभाएगा, बहकाएगा? और ईडी, सीबीआई, इनकम टैक्स जैसी संस्थाएँ चुनाव में अपनी अहम भूमिका निर्वाह कैसे करेंगी?
हर सरकार कुछ समर्पित अधिकारियों पर चलती है। सफल सरकारें कुछ ऐसे पूर्ण समर्पित अधिकारियों पर चलती हैं जिनके बिना लोकतंत्र भी असहाय महसूस करने लगे।
सरकार ने पहले पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त राजीव कुमार को भेजने का प्रस्ताव रखा। सिफ़ारिश भी की कि वे भी कम प्रतिभाशाली नहीं हैं। उन्होंने संस्थाओं को वहाँ तक पहुँचाया है जहाँ वे अपने पैरों से शायद कभी न पहुँच पातीं।
मगर ट्रम्प नहीं माने। उन्होंने साफ़ कहा- हमें तो ज्ञानेश ही चाहिए। पता नहीं उन्हें किसने समझा दिया कि असली ब्रांड वही हैं। दूसरे को भेजना वैसा ही होगा जैसे किसी और को सर्जन समझकर ऑपरेशन थिएटर में भेज दिया जाए। किसी और को सुपाड़ी नहीं दी जा सकती।
फिर सरकार ने सुझाव दिया कि ज्ञानेश कुमार वर्क फ्रॉम होम कंट्री कर सकते हैं। आख़िर भारत में भी बहुत-सा काम ऑनलाइन ही हो रहा है। सीमा खन्ना और मनीष गर्ग जैसे सहयोगी भी उपलब्ध रहेंगे।
डिजिटल इंडिया का सबसे बड़ा लाभ यह है कि अब लोकतंत्र की मरम्मत भी ऑनलाइन हो सकती है।
लेकिन ट्रम्प इस प्रस्ताव से संतुष्ट नहीं हुए। उन्होंने उल्टा कह दिया कि यदि ज़रूरत हो तो सीमा खन्ना और मनीष गर्ग को भी साथ भेज दिया जाए।
इस झटके के बाद सरकार ने नई रणनीति बनाई। मामला इतना जटिल बना दो कि ट्रम्प खुद ही पीछे हट जाएँ। उन्हें बताया जाए कि ज्ञानेश कुमार अकेले कुछ नहीं करते। उनके पीछे गृहमंत्री अमित शाह हैं। मगर यह दाँव उल्टा पड़ सकता था। सरकार को डर लगा कि कहीं ट्रम्प अमित शाह को भी एक्सपोर्ट करने की माँग न कर बैठें। तब कहा गया कि ज्ञानेश कुमार को सुप्रीम कोर्ट की छतरी भी मिली हुई है। बिना उस छतरी के वे कुछ नहीं कर सकते।
विदेश मंत्री जयशंकर को मार्को रुबियो को टटोलने भेजा गया। मगर वहाँ से जो संकेत आए, वे और भी भयावह थे। रुबियो ने बताया कि ट्रम्प को अमित शाह और सुप्रीम कोर्ट से भी कोई आपत्ति नहीं है। ज़रूरत पड़ी तो सबके लिए उपयुक्त पद बना लिए जाएँगे। मिड-टर्म चुनाव सिर पर हैं और अमेरिका कोई जोखिम नहीं लेना चाहता।
सरकार की चिंता बढ़ गई। सूची में कई राज्यों के चुनाव अधिकारियों के नाम जोड़े गए। कुछ ऑब्ज़र्वर भी शामिल किए गए। गृह मंत्रालय और पीएमओ के अधिकारियों को भी सूची में डाल दिया गया। सरकार को लगा कि इतनी लंबी सूची देखकर ट्रम्प डर जाएँगे। लेकिन ट्रम्प लोकतंत्र बचाने के मिशन पर निकले हुए थे।
मार्को रुबियो ने संदेश भेजा—“इफ मिस्टर मोदी कैन अफोर्ड, देन ही शुड ऑल्सो कम। वी डोंट वांट टू टेक एनी चांस।”
पहले तो मोदी जी के हाथों से तोते उड़ गए। उन्हें लगा कि कहीं सचमुच में ट्रम्प की सेवा में जाना पड़े। अगर ऐसा हुआ तो रोज़ फ़ज़ीहत होगी। लेकिन फिर उन्हें इस आपदा में अवसर दिखाई देने लगा। उन्हें लगा कि यदि ज्ञानेश कुमार की विशेषज्ञता की अंतरराष्ट्रीय माँग है तो क्यों न “डेमोक्रेसी सर्विसेज़ लिमिटेड” शुरू कर दी जाए।
चुनाव करवाना अब पुरानी तकनीक है। असली विज्ञान चुनाव जितवाना है। दुनिया भर में डेटा कंपनियाँ हैं, रणनीतिकार हैं, प्रचार एजेंसियाँ हैं। मगर सौ फ़ीसदी सफलता की गारंटी देने वाली एजेंसी अभी तक नहीं बनी। भारत यह कमी पूरी कर सकता है।
हम सॉफ़्टवेयर निर्यात करते हैं, इंजीनियर निर्यात करते हैं, डॉक्टर निर्यात करते हैं। फिर चुनावी विशेषज्ञता क्यों नहीं? आज दुनिया में चुनाव सबसे बड़ा राजनीतिक उद्योग है। मगर जीत बेचने वाली कंपनी अभी बाज़ार में नहीं उतरी है।
लोकतंत्र में वोटर देवता होता है मगर चुनाव जिताने वाला देवाधिदेव। योजना यह बनी कि चुनाव आयोग के भीतर ही एक नया विभाग बनाया जाए। छोटे-बड़े देशों को चुनाव जिताने की सेवाएँ दी जाएँ। टैग लाइन ये हो सकती है- अमेरिका केवल लोकतंत्र एक्सपोर्ट करता है। भारत लोकतंत्र का रिज़ल्ट एक्सपोर्ट कर सकता है।
छोटे देशों के लिए विशेष पैकेज भी तैयार किए जा सकते हैं—चुनाव भी होगा, विपक्ष भी रहेगा और परिणाम भी सुरक्षित रहेगा। जैसे अमेरिका डेमोक्रेसी एक्सपोर्ट करने या आरोपित करने का काम करता है, भारत भी चुनाव करवाने की प्रक्रिया को एक्सपोर्ट कर सकता है। ख़ास तौर पर छोटे देशों में तो इसका बहुत बड़ा मार्केट है। अमेरिका के डेमोक्रेसी कार्यक्रम के साथ भी इसको जोड़ा जा सकता है। आगे चलकर इसे इस तरह से डिज़ायन भी किया जा सकता है कि जो शासक चुनाव करवाने से डरते हैं, वे तो ज़रूर उसकी सेवाएं लें।
लेकिन ये तो बाद की बात है। अभी तो असली संकट ये है कि अमेरिकी राष्ट्रपति इस तरह के प्रस्तावों को मान नहीं रहे हैं। उन्होंने ट्रेड डील को भी इससे जोड़ दिया है और ये भी कहा है कि ईरान और रूस से तेल लेने पर लगाई गई पाबंदियाँ भी हटा ली जाएंगी, बशर्ते भारत ज्ञानेश कुमार को भेजने के लिए राज़ी हो जाए। साथ में धमकी भी दी गई है कि अगर ऐसा न किया तो सौ के बजाय दो सौ फ़ीसदी टैरिफ वसूला जाएगा।
अब देखना है कि भारतरत्न के दावेदार ज्ञानेश कुमार का क्या होता है। वे तो ज़रूर चाहेंगे कि यहाँ हर दिन हो रही फ़ज़ीहत से निकल जाएं और उस शहर में रहें जहाँ उन्हें दौलत और शोहरत दोनों मिल सकते हैं।
रही बात मोदी की तो वे ट्रम्प की बात को नहीं टालेंगे, टाल ही नहीं सकते। इससे संभावना यही बन रही हैं कि किसी दिन अमेरिका से एक चार्टेड प्लेन इंदिरा गाँधी इंटरनेशनल एयरपोर्ट पर उतरेगा और मोदी जी की सबसे दुर्लभ चीज़ यानी ज्ञानेश कुमार को उठाकर ले जाएगा।