मणिपुर में क़रीब एक साल के राष्ट्रपति शासन के बाद अब बीजेपी ने नया मुख्यमंत्री चुन लिया है। वरिष्ठ बीजेपी नेता युमनाम खेमचंद सिंह को पार्टी ने मणिपुर का अगला मुख्यमंत्री बनाने का फ़ैसला किया है। मंगलवार को नई दिल्ली में बीजेपी विधायक दल की बैठक में उन्हें विधायक दल का नेता चुना गया। अब वे जल्द ही मुख्यमंत्री पद की शपथ लेंगे।

मणिपुर विधानसभा में कुल 60 सीटें हैं। बीजेपी के पास अभी 37 विधायक हैं। 2022 के चुनाव में बीजेपी को 32 सीटें मिली थीं, लेकिन बाद में जेडीयू के 5 विधायक बीजेपी में शामिल हो गए। एक सीट विधायक की मौत से खाली है। बीजेपी के पास पूरा बहुमत है। एनडीए के अन्य सहयोगी दलों के विधायकों की बैठक जल्द होगी, जहां खेमचंद सिंह को गठबंधन का नेता चुना जाएगा।
यह फ़ैसला राष्ट्रपति शासन ख़त्म होने से ठीक 10 दिन पहले आया है। राष्ट्रपति शासन 13 फरवरी 2025 को लगाया गया था और अब इसका एक साल पूरा होने वाला है। संविधान के अनुसार, एक साल से ज्यादा राष्ट्रपति शासन नहीं चल सकता, इसलिए चुनी हुई सरकार बनाना ज़रूरी हो गया था।

कैसे खाली हुआ था मुख्यमंत्री पद?

पहले मुख्यमंत्री एन. बीरेन सिंह थे। मई 2023 से मणिपुर में मैतेई और कुकी-जो समुदायों के बीच जातीय हिंसा शुरू हुई। इसमें सैकड़ों लोग मारे गए, हजारों बेघर हुए। कुकी समूहों ने बीरेन सिंह पर पक्षपात का आरोप लगाया और उनके इस्तीफे की मांग की।

धीरे-धीरे बीजेपी के अंदर भी असंतोष बढ़ा। कई विधायकों ने बीरेन सिंह को राजनीतिक बोझ बताया। अक्टूबर 2024 में 19 भाजपा विधायकों ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को चिट्ठी लिखी और बीरेन सिंह को हटाने की मांग की। नवंबर में खेमचंद सिंह ने खुद बीरेन सिंह से इस्तीफा देने को कहा था।

फरवरी 2025 में स्थिति बिगड़ी। कांग्रेस ने अविश्वास प्रस्ताव लाने की तैयारी की। बीजेपी के कई विधायक दिल्ली पहुंचे और नेतृत्व से मिले। 9 फरवरी 2025 को बीरेन सिंह ने इस्तीफा दे दिया। 13 फरवरी को राष्ट्रपति शासन लगा दिया गया। विधानसभा निलंबित कर दी गई।

केंद्र सरकार शुरू में हिचकिचा क्यों रही थी?

2025 के ज्यादातर समय केंद्र सरकार सतर्क रही। उसका मानना था कि राष्ट्रपति शासन से राज्य में कुछ हद तक शांति लौट आई है। अगर कोई अस्थिर सरकार बनाई गई तो यह नाजुक शांति को खराब कर सकती है। हथियार छोड़ने का काम पूरा नहीं हुआ था, पहाड़ी और घाटी इलाकों में लोगों की आवाजाही पर अभी भी विवाद था, और उग्रवादी समूहों से बातचीत चल रही थी। फिर भी, कुछ अच्छी चीजें आगे बढ़ने में मदद कर रही थीं। कूकी समूहों के साथ समझौते हुए जिससे लोगों की आवाजाही आसान हुई। हथियारबंद संघर्ष रोकने का समझौता फिर से शुरू हुआ। सितंबर 2025 में प्रधानमंत्री मोदी की मणिपुर यात्रा हुई। यह हिंसा शुरू होने के बाद उनकी पहली यात्रा थी। इन सबको शांति लौटने के संकेत के रूप में दिखाया गया। केंद्र सरकार पर संवैधानिक दबाव भी था। राष्ट्रपति शासन को एक साल से ज्यादा बढ़ाने के लिए राष्ट्रीय आपातकाल लगाना पड़ता है। इसलिए केंद्र को मजबूरन फैसला लेना पड़ा।

खेमचंद सिंह कौन हैं?

युमनाम खेमचंद सिंह मैतेई समुदाय से हैं। वे दो बार विधायक चुने गए हैं- 2017 और 2022 में सिंगजामेई सीट से। 2017 में वे मणिपुर विधानसभा के स्पीकर बने और पूरे 5 साल पद पर रहे। 2022 चुनाव के बाद बीरेन सिंह सरकार में मंत्री बने। उनके पास ग्रामीण विकास, पंचायती राज, नगर प्रशासन, आवास विकास और शिक्षा जैसे अहम विभाग थे। वे ताइक्वांडो में ब्लैक बेल्ट धारक हैं और खेल को बढ़ावा देने वाले नेता माने जाते हैं।

खेमचंद सिंह बीरेन सिंह के आलोचक रहे हैं। उन्होंने हिंसा के दौरान बीरेन सिंह से इस्तीफा मांगा था। अब उनका नाम चुनना एक नया संदेश देता है।

नई सरकार के सामने क्या मुश्किलें?

नई सरकार को बहुत बड़ी चुनौतियां मिलेंगी। राज्य में अभी भी सामाजिक विभाजन है। विस्थापित लोग राहत शिविरों में हैं। पहाड़ी और घाटी इलाकों में आवाजाही सीमित है। हथियार जमा नहीं हुए हैं। समुदायों के बीच अविश्वास है। विधानसभा चुनाव 2027 में होने हैं। नई सरकार को लोगों का भरोसा जीतना होगा। पुनर्वास, रास्ते खोलना, संवाद और सुरक्षा में पारदर्शिता जरूरी है।

केंद्र सरकार ने अब चुनी हुई सरकार बनाना जरूरी समझा, क्योंकि राष्ट्रपति शासन से शांति लौटी लेकिन राजनीतिक वैधता नहीं। मोदी की सितंबर 2025 की मणिपुर यात्रा और कुकी समूहों से समझौते भी मददगार रहे। यह फैसला मणिपुर में राजनीतिक स्थिरता लाने की दिशा में बड़ा कदम है। लेकिन क्या नई सरकार इसमें सफल हो पाएगी?