मद्रास हाईकोर्ट ने तमिलनाडु सरकार को सख्त निर्देश दिया है कि बकरीद (ईद-उल-अजहा) पर किसी भी दिन पूरे राज्य में किसी भी गाय या बछड़े की हत्या न होने दी जाए। अदालत ने कहा कि गाय की कुर्बानी इस्लाम का अनिवार्य धार्मिक हिस्सा नहीं है। जस्टिस जीआर स्वामीनाथन और जस्टिस वी लक्ष्मीनारायणन की डिवीजन बेंच ने यह फ़ैसला एक जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए दिया। कोयंबटूर के रहने वाले के. सूर्या ने याचिका दायर कर कहा था कि बकरीद के मौके पर खुली जगहों और बिना अनुमति वाले इलाकों में गायों की बलि की तैयारी हो रही है, इस पर रोक लगाई जाए। अदालत ने याचिका को स्वीकार करते हुए राज्य सरकार को सख्ती से कार्रवाई करने के निर्देश दिए।

अदालत ने पुलिस अधिकारी द्वारा दाखिल हलफनामे पर भी नाराजगी जताई, जिसमें अस्थायी जगहों पर अनुमति देने की बात कही गई थी। जजों ने कहा कि कानून ऐसा करने की इजाजत नहीं देता।

सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले का ज़िक्र किया

मद्रास हाईकोर्ट ने संविधान के आर्टिकल 48 का हवाला दिया। इसमें राज्य को गायों, बछड़ों और दूध देने वाले व काम आने वाले मवेशियों की हत्या रोकने की दिशा में काम करने को कहा गया है। सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसलों का ज़िक्र करते हुए बेंच ने कहा, 'बहुत से मुसलमान बकरीद के दिन गाय की कुर्बानी नहीं देते। इस्लाम में मुसलमान के धार्मिक विश्वास को दिखाने के लिए गाय की बलि ज़रूरी नहीं है। बकरीद पर किसी भी जानवर की कुर्बानी दी जा सकती है, लेकिन गाय की हत्या ही एकमात्र तरीका नहीं है। गाय की बलि न तो अनिवार्य है और न ही धार्मिक प्रथा का ज़रूरी हिस्सा।'
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तमिलनाडु के क़ानून का हवाला दिया

अदालत ने तमिलनाडु एनिमल प्रिजर्वेशन एक्ट का भी ज़िक्र किया। इस कानून के अनुसार गाय की हत्या तभी हो सकती है जब वह 10 साल से ज्यादा उम्र की हो, काम करने और प्रजनन के लिए पूरी तरह अयोग्य हो और कोई स्थायी बीमारी, चोट या विकृति हो। कोर्ट ने कहा कि आर्टिकल 48 के तहत इसे सख्ती से लागू करना चाहिए। इसके साथ ही अदालत ने राज्य सरकार के पहले के एक आदेश को भी मान्य ठहराया, जिसमें दूध उत्पादन और गांव की अर्थव्यवस्था बचाने के लिए गाय वध पर रोक लगाई गई थी।

अदालत के मुख्य निर्देश

  • राज्य सरकार यह सुनिश्चित करे कि बकरीद पर या किसी भी दिन गाय या बछड़े की हत्या न हो।
  • मुख्य सचिव और एडीजीपी (लॉ एंड ऑर्डर) समेत सभी वरिष्ठ अधिकारियों को निर्देश जारी करें कि यह आदेश पूरी तरह लागू हो।
  • पशु वध केवल कानूनी रूप से स्वीकृत कत्लखाने में ही हो सकता है। कोई भी अस्थायी, बनावटी या अनधिकृत जगह पर वध नहीं किया जा सकता।
  • पुलिस या प्रशासन खुद से कोई अस्थायी कत्लखाने नहीं बना सकता।

क्यों अहम है यह फ़ैसला?

यह फ़ैसला बकरीद से पहले आया है। कोर्ट ने साफ़ किया कि पशु वध सार्वजनिक जगहों पर नहीं हो सकता और इसे पूरी तरह क़ानून के दायरे में रखना होगा। राज्य सरकार को अब इस आदेश का पालन सुनिश्चित करना होगा और सभी जिला प्रशासन व पुलिस को निर्देश जारी करने होंगे।

अदालत ने कहा कि यह आदेश भंग करने की कोई गुंजाइश नहीं है और सभी अधिकारी इसे लागू करने के लिए बाध्य हैं। यह फैसला पूरे तमिलनाडु राज्य पर लागू होगा।

पश्चिम बंगाल में भी सरकार का प्रतिबंध

कलकत्ता हाईकोर्ट ने भी सरकार के नोटिफिकेशन पर रोक लगाने से इनकार करते हुए हाल में फ़ैसला दिया था कि गाय की कुर्बानी इस्लाम की अनिवार्य धार्मिक प्रथा नहीं है। इसने सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसलों का हवाला दिया था। यह फ़ैसला तब आया जब पश्चिम बंगाल की शुभेंदु अधिकारी सरकार ने 13 मई को पश्चिम बंगाल पशु वध नियंत्रण अधिनियम, 1950 को सख्ती से लागू करने का नोटिफिकेशन जारी किया। इसके लिए गाय, बैल, बछड़े, भैंस आदि की कुर्बानी के लिए सरकारी पशु चिकित्सक का फिटनेस सर्टिफिकेट अनिवार्य किया गया। केवल उम्रदराज़ या काम नहीं आने वाले या बीमार पशुओं के लिए ही अनुमति दी गई। जन्म देने वाले या दूध देने वाले पशुओं पर रोक लगाई गई। खुले में या सार्वजनिक स्थानों पर हत्या को पूरी तरह प्रतिबंधित किया गया और केवल तय जगहों पर अनुमति दी गई है।
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यूपी के वाराणसी में बकरा बाज़ार सील

उत्तर प्रदेश में तो बकरीद से ठीक पहले वाराणसी में दशकों पुराने प्रसिद्ध बेनियाबाग बकरा बाजार को नगर निगम ने सील कर दिया है। नगर निगम का कहना है कि भीड़भाड़ और गंदगी की शिकायतों के आधार पर यह कार्रवाई की गई है। इस अचानक फ़ैसले से सैकड़ों व्यापारी और पशु विक्रेता भड़क गए हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि त्योहार के पीक सीजन में पहले से बिना किसी नोटिस के बाजार बंद कर दिया गया। बेनियाबाग बकरा बाजार पूर्वी उत्तर प्रदेश का सबसे बड़ा और मशहूर मौसमी पशु बाजार है। यह क़रीब 40 साल से चल रहा था। काशी विश्वनाथ मंदिर से सिर्फ एक किलोमीटर दूर यह बाजार बकरीद से लगभग एक हफ्ते पहले खुलता है। गोरखपुर, गाजीपुर, मऊ और जौनपुर समेत आसपास के जिलों से सैकड़ों व्यापारी यहां आते हैं।

कुछ रिपोर्टों के अनुसार मंडी में इस बार पूर्वांचल और अन्य जिलों के क़रीब 250 व्यापारी आए। इस मंडी का 22 लाख का टेंडर होने की बात सामने आ रही है। मंडी का टेंडर लेने वालों ने भी कहा कि अचानक ऐसा हुआ है और उन्हें कुछ बताया भी नहीं गया। दैनिक भास्कर की रिपोर्ट के अनुसार ठेका लेने वाले बाबू माडल ने बताया, 'हमने स्मार्ट सिटी से ठेका लिया था, जो करीब 22 से 24 लाख का है। अचानक नगर निगम की टीम पहुंची और एक घंटे का समय देकर इसे बंद कर दिया है। हमें पहले से कोई सूचना नहीं थी इस बारे में और न ही कोई कारण बताया गया है।' व्यापारी परेशान हैं। उन्होंने तो यहाँ तक मांग की कि हमें नगर निगम 2 दिन का समय दे तो हम अपने जानवर लेकर यहां से चले जाएंगे।