डिलिमिटेशन के मुद्दे पर एमके स्टालिन ने तमिलनाडु में ब्लैक फ्लैग प्रोटेस्ट का ऐलान क्यों किया? क्या यह विरोध बड़ा आंदोलन बनेगा?
एमके स्टालिन और नरेंद्र मोदी
डिलिमिटेशन पर तमिलनाडु के सीएम एमके स्टालिन ने 1950-60 के दशक जैसे विरोध-प्रदर्शन की चेतावनी के बाद अब गुरुवार को बड़े प्रदर्शन की घोषणा कर दी है। डीएमके अध्यक्ष एम.के. स्टालिन ने बुधवार को केंद्र सरकार की प्रस्तावित डिलिमिटेशन प्रक्रिया के ख़िलाफ़ पूरे राज्य में काला झंडा दिखाते हुए विरोध प्रदर्शन का ऐलान कर दिया है। यह विरोध गुरुवार यानी 16 अप्रैल को होगा। स्टालिन ने चेतावनी दी है कि अगर केंद्र तमिलनाडु और दक्षिण भारतीय राज्यों की बात नहीं मानता तो उसे भारी कीमत चुकानी पड़ेगी।
एमके स्टालिन ने कहा, 'हमारे सिर पर लटकी तलवार अब हमारे गले तक आ पहुँची है।' उन्होंने डीएमके के सांसदों और जिला सचिवों की आपातकालीन वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग मीटिंग की अध्यक्षता की। इस मीटिंग में डिलिमिटेशन के मुद्दे पर विस्तार से चर्चा हुई।
क्या है स्टालिन का आरोप?
स्टालिन ने कहा है कि केंद्र की बीजेपी सरकार संसद में जो संशोधन लाने जा रही है, वह तमिलनाडु और पूरे दक्षिण भारत के साथ बड़ा और ऐतिहासिक अन्याय है। उन्होंने सवाल किया कि क्या भारत की प्रगति में योगदान देने के लिए तमिलनाडु और दक्षिण के राज्यों को सजा दी जा रही है?स्टालिन का कहना है कि दक्षिण के लोग विन्ध्य पर्वत के दक्षिण में रहने वाले हर व्यक्ति में ग़ुस्सा भरा हुआ है। उन्होंने कहा, 'भाजपा आग से खेल रही है। कल पूरे तमिलनाडु में घरों और सार्वजनिक जगहों पर काले झंडे फहराए जाएंगे।'
अगर केंद्र नहीं माना तो क्या होगा?
स्टालिन ने साफ चेतावनी दी है कि 'यदि केंद्र तमिलनाडु की आवाज का सम्मान नहीं करता और पीछे नहीं हटता तो उसे भारी कीमत चुकानी पड़ेगी।' उन्होंने यह बात सिर्फ डीएमके अध्यक्ष के रूप में नहीं, बल्कि एक 'आत्मसम्मान वाले तमिल' के रूप में कही। उन्होंने कहा कि यह मुद्दा किसी एक पार्टी या व्यक्ति का नहीं है। यह हमारे लोगों के अधिकारों की रक्षा का सवाल है। स्टालिन ने पूरे भारत के सभी पार्टियों और सांसदों से अपील की कि वे लोकतंत्र की रक्षा के लिए एकजुट हों।
रणनीति क्या बनी?
बुधवार सुबह 11 बजे धर्मपुरी से वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के ज़रिए मीटिंग हुई। इसमें डीएमके सांसदों और जिला सचिवों ने हिस्सा लिया। मीटिंग में संसद में डिलिमिटेशन पर क्या रुख अपनाया जाए, इसकी रणनीति तय की गई।
स्टालिन ने मंगलवार को भी चेतावनी दी थी कि अगर तमिलनाडु को नुकसान पहुंचाया गया या उत्तर भारतीय राज्यों की राजनीतिक ताक़त बढ़ाई गई तो पूरे राज्य को ठप कर देने वाले बड़े आंदोलन होंगे।
उन्होंने मंगलवार को कहा था कि फिर से 1950-60 के दशक वाली डीएमके देखने को मिल सकती है जब पार्टी ने राज्य के अधिकारों और हिंदी थोपने के खिलाफ बड़े आंदोलन चलाए थे।
1950-60 के दशक में क्या हुआ था?
तमिलनाडु में 1950-60 का दशक भारत में हिंदी विरोध से जुड़ा रहा है। हालाँकि, तमिलनाडु में हिंदी विरोधी आंदोलन का इतिहास बहुत पुराना है। साल 1937 में जब मद्रास प्रान्त में इंडियन नेशनल कांग्रेस की सरकार बनी थी और सरकार के मुखिया चक्रवर्ती राजगोपालाचारी ने हिंदी को अनिवार्य करने की कोशिश की थी तब द्रविड़ आंदोलन के नेता 'पेरियार' के नेतृत्व में हिंदी विरोधी आंदोलन हुआ था। आंदोलन इतना तीव्र और प्रभावशाली था कि सरकार को झुकना पड़ा था। इस विरोध का असर काफी लंबे समय तक रहा।जब देश आज़ाद हुआ था तब राज्यों के गठन को लेकर भाषा को आधार मानने पर विचार किया गया था। लेकिन इस विचार पर कई नेता राजी नहीं हुए। इसमें पंडित जवाहर लाल नेहरू भी सबसे मुखर रहे। उनका मानना था कि पहले से ही धर्म के आधार पर बंटे देश में भाषा के आधार पर बांटना सही नहीं होगा। इसी कारण भाषा के अधार पर राज्यों के गठन का विरोध हुआ।
इसके बाद 50 और 60 के दशकों में भी जब हिंदी को थोपने की कोशिश की गयी तब भी जमकर आंदोलन हुआ। कई जगह हिंसा भी हुई। हिंसा में कुछ लोगों की जान भी गयी।
आज़ादी के बाद हिंदी विरोध के नाम पर सबसे पहला बवाल 25 जनवरी 1965 को तमिलनाडु के मदुरई में हुआ जहाँ कुछ स्थानीय छात्रों और कांग्रेस के लोगों के बीच टक्कर हुई। इस मामले ने कैसा तूल पकड़ा, इसे ऐसे भी समझ सकते हैं कि ये बवाल तब दो महीने तक चला और इसमें आगजनी, गोलीबारी, लूट जैसे मामले तक देखने को मिले।
70 लोग मारे गए थे
स्थिति को नियंत्रित करने के लिए पैरामिलिट्री तक की मदद लेनी पड़ी और इसमें क़रीब 70 लोगों की मौत हुई। तनावपूर्ण स्थिति संभालने के लिए लोगों को विश्वास दिलाया गया कि अंग्रेजी का इस्तेमाल आधिकारिक भाषा के रूप में किया जाए और ये तब तक हो जब तक गैर हिंदी भाषी राज्य चाहें।
1965 के इस आंदोलन से डीएमके को फायदा पहुँचा और 1967 के चुनाव में उसने हिंदी को एक बड़ा मुद्दा बनाया। उसने इसके दम पर चुनाव जीता और इसके बाद बरसों तक तमिलनाडु में शासन किया।
डिलिमिटेशन पर दक्षिण राज्यों की एकता
स्टालिन पिछले साल भी ग़ैर-बीजेपी शासित राज्यों की बैठक बुला चुके हैं। केरल के मुख्यमंत्री पिनरायी विजयन, तेलंगाना के रेवंत रेड्डी, पंजाब के भगवंत मान और कर्नाटक के उप-मुख्यमंत्री डी.के. शिवकुमार जैसे नेता उसमें शामिल हुए थे।
मंगलवार को तेलंगाना के मुख्यमंत्री रेवंत रेड्डी ने स्टालिन को पत्र लिखा। स्टालिन ने जवाब में कहा- 'हमारी एकता राज्य के अधिकारों की रक्षा और आने वाली पीढ़ियों के लिए न्यायपूर्ण भविष्य सुनिश्चित करने के लिए है। दक्षिण एक स्वर में बोलेगा और सच्चे संघीय ढांचे को मजबूत करेगा।'
रेवंत रेड्डी ने दक्षिण राज्यों और पुदुचेरी को 'हाइब्रिड मॉडल' का सुझाव दिया है, जिसमें अतिरिक्त सीटों का 50% आनुपातिक आधार पर और बाक़ी जीएसडीपी जैसे अन्य मानकों पर बांटा जाए।
विवाद क्या है?
केंद्र सरकार संसद के विशेष सत्र में डिलिमिटेशन से जुड़ा संविधान संशोधन लाने वाली है। इसमें लोकसभा की सीटों को बढ़ाकर 850 तक करने और नई जनगणना के आधार पर सीटों की नई सीमा तय करने की बात है। दक्षिण के राज्य चिंतित हैं कि जनसंख्या नियंत्रण करने वाले राज्यों को नुकसान होगा, जबकि उत्तर के राज्यों की संख्या और ताकत बढ़ जाएगी।
स्टालिन ने कहा कि यह महिलाओं के आरक्षण के नाम पर एक साजिश है, जो तमिलनाडु और दक्षिण के बीच की दूरी बढ़ाएगी। अब 16 अप्रैल को पूरे तमिलनाडु में काले झंडे दिखाए जाएंगे। देखना होगा कि यह विरोध कितना बड़ा रूप लेता है।