उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले समाजवादी पार्टी (सपा) के अध्यक्ष अखिलेश यादव गुरुवार, 22 अक्टूबर को रामपुर जिला जेल में पार्टी के वरिष्ठ नेता और राष्ट्रीय महासचिव आजम खान से मुलाकात करने वाले हैं। द टेलीग्राफ की रिपोर्ट के मुताबिक, इस मुलाकात में आगामी विधानसभा चुनाव की रणनीति पर चर्चा होने की संभावना है। आजम खान के परिवार की ओर से सपा नेतृत्व पर उपेक्षा के आरोप लगाए जाने और मुस्लिम मतदाताओं के बीच पार्टी के समर्थन को लेकर उठते सवालों के बीच इस मुलाकात को राजनीतिक रूप से अहम माना जा रहा है।
आजम खान समाजवादी पार्टी के संस्थापक सदस्यों में शामिल रहे हैं और पश्चिमी उत्तर प्रदेश, खासकर रामपुर तथा मुरादाबाद मंडल की राजनीति में उनका लंबे समय से प्रभाव रहा है। उनकी जेल में मौजूदगी, परिवार की नाराजगी और मुस्लिम मतदाताओं को लेकर दूसरे दलों की सक्रियता ने सपा के सामने चुनावी चुनौती को और महत्वपूर्ण बना दिया है।

क्या मुस्लिम वोटों के खिसकने के डर से सक्रिय हुए अखिलेश?

द टेलीग्राफ की रिपोर्ट में कहा गया है कि अखिलेश यादव अब तक आजम खान से जेल में मुलाकात करने से बचते रहे थे। रिपोर्ट के अनुसार, सपा के परंपरागत मुस्लिम वोट बैंक को खोने की आशंका ने पार्टी नेतृत्व को आजम खान तक पहुंचने के लिए प्रेरित किया हो सकता है। हालांकि, यह रिपोर्ट का राजनीतिक आकलन है; अखिलेश यादव ने मुलाकात का यही कारण सार्वजनिक रूप से नहीं बताया है।
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मुरादाबाद में सपा नेता फिरोज खान ने कहा कि अखिलेश यादव और आजम खान दोनों पार्टी के बड़े नेता हैं, इसलिए मुलाकात में राजनीति सहित कई विषयों पर चर्चा होना स्वाभाविक है। उन्होंने यह भी कहा कि उन्हें बातचीत के सटीक एजेंडे की जानकारी नहीं है। फिरोज खान के मुताबिक, आजम खान की तबीयत भी ठीक नहीं है और उनका हालचाल जानना भी इस मुलाकात का एक कारण है।

नवंबर 2025 से जेल में बंद हैं आजम खान

78 वर्षीय आजम खान नवंबर 2025 से जेल में बंद हैं। द टेलीग्राफ की रिपोर्ट के अनुसार, उनके खिलाफ डराने-धमकाने, मनी लॉन्ड्रिंग, जालसाजी, जमीन पर कब्जे और चुनाव आचार संहिता के उल्लंघन सहित कई मामलों में आरोप हैं। इससे पहले भी वह दो बार जेल जा चुके हैं—एक बार 27 महीने और दूसरी बार 23 महीने तक। आजम खान से अखिलेश यादव की पिछली जेल मुलाकात मार्च 2024 में हुई थी, जब लोकसभा चुनाव नजदीक थे। इसके बाद दोनों नेताओं के बीच जेल में मुलाकात नहीं हुई थी।

आजम खान की पत्नी तजीन फातिमा, जो सपा की पूर्व राज्यसभा सदस्य और विधायक रह चुकी हैं, पार्टी नेतृत्व पर उनके परिवार की अनदेखी करने का सार्वजनिक रूप से आरोप लगा चुकी हैं। उनका कहना रहा है कि आजम खान ने 1992 में समाजवादी पार्टी की स्थापना के समय से ही मुलायम सिंह यादव और अखिलेश यादव का साथ दिया, लेकिन उनके परिवार को अपेक्षित समर्थन नहीं मिला।

अब्दुल्ला आजम को लेकर भी उठे सवाल

आजम खान के बेटे अब्दुल्ला आजम, जो पूर्व विधायक रह चुके हैं, भी जेल में बंद हैं। उन पर दो स्थायी खाता संख्या (PAN) रखने का आरोप है। द टेलीग्राफ की रिपोर्ट के अनुसार, लखनऊ स्थित सपा मुख्यालय में अखिलेश यादव द्वारा अब्दुल्ला आजम की अनदेखी किए जाने के आरोप भी पहले सामने आए थे। इससे आजम खान के परिवार और पार्टी नेतृत्व के रिश्तों को लेकर राजनीतिक चर्चाएं होती रही हैं।
पिछले महीने आजम खान से जेल में मुलाकात के बाद सपा महासचिव और अखिलेश यादव के चाचा शिवपाल सिंह यादव ने कहा था कि अगर 2027 में सपा की सरकार बनती है तो वह उत्तर प्रदेश के गृह मंत्री होंगे। इस बयान पर प्रतिक्रिया देते हुए अखिलेश यादव ने कहा था कि वह शिवपाल यादव को यह लिखकर देंगे कि उन्हें क्या कहना है। इस टिप्पणी को पार्टी के भीतर नेतृत्व और राजनीतिक भूमिकाओं को लेकर चल रही चर्चाओं के संदर्भ में देखा गया।

आजम खान पर कार्रवाई को लेकर भाजपा और ईडी पर सवाल

रामपुर से भाजपा विधायक आकाश सक्सेना ने आजम खान और उनके परिवार के सदस्यों के खिलाफ बड़ी संख्या में मुकदमे दर्ज कराए हैं। आजम खान के परिवार के एक करीबी सूत्र ने द टेलीग्राफ से कहा कि एक धारणा यह है कि भाजपा आजम खान को निशाना बनाकर पूरे उत्तर प्रदेश में हिंदू मतदाताओं के ध्रुवीकरण का संदेश देना चाहती है। सूत्र के मुताबिक, विधानसभा चुनाव नजदीक आने के साथ प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) भी आजम खान से जुड़े मनी लॉन्ड्रिंग मामले की जांच तेज कर रहा है।
सूत्र ने दावा किया कि भाजपा और केंद्रीय व राज्य एजेंसियों की कार्रवाई से मुस्लिम मतदाताओं के सपा के पीछे एकजुट होने की संभावना भी बढ़ सकती है। हालांकि, यह आजम खान के परिवार के करीबी सूत्र का राजनीतिक आकलन है, न कि किसी स्वतंत्र रूप से स्थापित निष्कर्ष का। रिपोर्ट के मुताबिक, ईडी ने जेल में बंद आजम खान से लगभग दो सप्ताह पहले पूछताछ की थी।

मुस्लिम मतदाताओं को लेकर सपा पर भी उठ रहे सवाल

आजम खान से अखिलेश यादव की प्रस्तावित मुलाकात ऐसे समय हो रही है, जब कुछ सुन्नी धर्मगुरुओं ने समाजवादी पार्टी पर मुस्लिम मतदाताओं को अपने साथ बांधे रखने के लिए भाजपा के कथित मुस्लिम-विरोधी रुख का डर दिखाने का आरोप लगाया है। बरेली के सुन्नी धर्मगुरु मौलाना शहाबुद्दीन रजवी ने द टेलीग्राफ से कहा कि उन्हें भाजपा और सपा की राजनीति में कोई बुनियादी अंतर दिखाई नहीं देता। उनका आरोप था कि दोनों दल अलग-अलग तरह की नफरत की राजनीति पर निर्भर करते हैं और सपा ने आजम खान तथा मुस्लिम समुदाय का राजनीतिक इस्तेमाल किया है।
रजवी ने यह भी कहा कि यदि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपनी पार्टी के दूसरे स्तर के नेताओं को अल्पसंख्यक समुदाय के खिलाफ कथित आपत्तिजनक बयान देने से रोकते हैं, तो मुस्लिम मतदाताओं का एक हिस्सा भाजपा की ओर भी जा सकता है। यह बयान मुस्लिम वोटों को लेकर विपक्षी राजनीति में उभरती बहस को रेखांकित करता है। हालांकि, किसी समुदाय के मतदाता किस दल को समर्थन देंगे, यह आगामी चुनाव में राजनीतिक परिस्थितियों और मतदाताओं के फैसले पर निर्भर करेगा।

2027 के चुनाव से पहले क्यों अहम है यह मुलाकात?

आजम खान का प्रभाव केवल रामपुर तक सीमित नहीं माना जाता। मुरादाबाद मंडल और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के कई क्षेत्रों में उनका राजनीतिक नेटवर्क सपा के लिए महत्वपूर्ण रहा है। 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले अखिलेश यादव के सामने कई चुनौतियां हैं:
  • मुस्लिम मतदाताओं का समर्थन बनाए रखना: आजम खान के परिवार की नाराजगी और दूसरे दलों की सक्रियता के बीच सपा को अपने परंपरागत समर्थन को मजबूत करना होगा।
  • पश्चिमी उत्तर प्रदेश में उम्मीदवारों का चयन: आजम खान का क्षेत्रीय राजनीतिक अनुभव टिकट वितरण और चुनावी रणनीति में उपयोगी हो सकता है।
  • गठबंधन की राजनीति: कांग्रेस के साथ संभावित गठबंधन और सीटों के बंटवारे को लेकर भी पश्चिमी उत्तर प्रदेश में सपा के सामने राजनीतिक समीकरण साधने की चुनौती होगी।
  • आजम खान से जुड़े मामलों को चुनावी मुद्दा बनाना: उनके खिलाफ चल रही कानूनी कार्रवाई और जौहर विश्वविद्यालय से जुड़े विवाद को सपा चुनाव प्रचार में उठा सकती है।
बहरहाल, अखिलेश यादव और आजम खान की प्रस्तावित मुलाकात को केवल एक औपचारिक राजनीतिक मुलाकात के रूप में देखना पर्याप्त नहीं होगा। इसके पीछे सपा के संगठनात्मक रिश्तों, मुस्लिम मतदाताओं के बीच अपनी पकड़ बनाए रखने और 2027 के विधानसभा चुनाव की तैयारी जैसे महत्वपूर्ण पहलू हैं।