इलाहाबाद हाईकोर्ट के जस्टिस विनोद दिवाकर ने जजों की असहमति और सहमति दर्ज नहीं होने पर चिंता जताई और कहा कि फुल कोर्ट मीटिंग में सरकार की तरह बहुमत जुटाकर फैसले कराने जैसा माहौल होता है। उन्होंने कहा कि जिला अदालतों में काफी पद खाली हैं।
इलाहाबाद हाईकोर्ट के जस्टिस विनोद दिवाकर ने हाईकोर्ट के प्रशासनिक कामकाज पर गंभीर सवाल उठाए हैं। उन्होंने कहा है कि हाईकोर्ट की फुल कोर्ट बैठकें कई बार इस तरह होती हैं जैसे किसी सरकार में विश्वास मत के दौरान सदस्यों को व्हिप जारी करके बहुमत जुटाया जाता है। जस्टिस दिवाकर ने यह भी कहा कि फुल कोर्ट की बैठकों में अलग-अलग जजों की सहमति और असहमति को दर्ज नहीं किया जाता। इससे यह पता ही नहीं चलता कि किसी बड़े फ़ैसले पर किस न्यायाधीश की क्या राय थी और निर्णय किस तरह लिया गया।
जस्टिस दिवाकर ने खुलासा किया कि पिछले दस वर्षों में इलाहाबाद हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीशों ने केवल 16 फुल कोर्ट बैठकें बुलाई हैं। जबकि हाईकोर्ट के नियमों के अनुसार सामान्य नीतिगत मामलों, अदालत की शक्तियों और स्थिति को प्रभावित करने वाले विषयों तथा न्याय प्रशासन की वार्षिक रिपोर्ट पर कम से कम हर तीन महीने में फुल कोर्ट में विचार किया जाना चाहिए।
जस्टिस दिवाकर की ये टिप्पणियाँ उत्तर प्रदेश की जिला अदालतों में मुक़दमों की सुनवाई में हो रही असाधारण देरी से जुड़ी याचिकाओं पर दिए गए फ़ैसले का हिस्सा हैं। बार एंड बेंच की रिपोर्ट के अनुसार जस्टिस दिवाकर ने कहा कि जिला अदालतों में न्यायिक प्रक्रिया के ठहराव की समस्या पर हाईकोर्ट के प्रशासनिक स्तर पर प्रभावी ध्यान नहीं दिया गया है। फ़ैसले में जस्टिस दिवाकर ने न्यायिक प्रशासन में जवाबदेही, पारदर्शिता और संस्थागत विमर्श की कमी के साथ-साथ न्यायिक अधिकारियों और कर्मचारियों के हजारों खाली पदों का मुद्दा भी उठाया है।
'नियमों का पालन क्यों नहीं?'
जस्टिस विनोद दिवाकर ने अपने फ़ैसले में कहा कि इलाहाबाद हाईकोर्ट के नियमों के अनुसार सामान्य नीतिगत मामलों और अदालत की शक्तियों तथा स्थिति को प्रभावित करने वाले विषयों को फुल कोर्ट के सामने रखा जाना अनिवार्य है। इसके अलावा न्याय प्रशासन की वार्षिक रिपोर्ट पर भी फुल कोर्ट में विचार होना चाहिए। यह रिपोर्ट सरकार को भेजी जानी होती है।
लेकिन जस्टिस दिवाकर के अनुसार पिछले दस वर्षों में अदालत की शक्तियों और संस्थागत स्थिति से जुड़े किसी सामान्य नीतिगत मामले को फुल कोर्ट की बैठक में नहीं रखा गया। उन्होंने कहा कि इस दौरान मुख्य न्यायाधीशों की ओर से केवल 16 फुल कोर्ट बैठकें आयोजित की गईं।
फ़ैसले में कहा गया है कि पिछले एक दशक से न्याय प्रशासन की वार्षिक रिपोर्ट न तो फुल कोर्ट के सामने रखी गई और न ही नियमों के अनुसार सरकार को भेजी गई।
‘फुल कोर्ट बैठकें सरकार के विश्वास मत जैसी क्यों?’
जस्टिस दिवाकर ने फुल कोर्ट की बैठकों के तौर-तरीक़े पर भी सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि ऐसा लगता है कि हाईकोर्ट की पिछली दो फुल कोर्ट बैठकें इस तरह हुईं जैसे किसी सरकार में विश्वास मत के दौरान सदस्यों को व्हिप जारी करके बहुमत सुनिश्चित किया जाता है। उनके अनुसार, यह न्यायाधीश के पद की गरिमा के ख़िलाफ़ है।
जस्टिस दिवाकर ने केवल बैठकों की संख्या पर ही सवाल नहीं उठाया, बल्कि यह भी कहा कि किसी सामूहिक संस्थागत निर्णय में जजों के स्वतंत्र विचारों का रिकॉर्ड होना चाहिए। फ़ैसले में कहा गया है, 'जब कोई सामूहिक संस्था अपने सदस्यों के विचारों को दर्ज किए बिना कोई प्रस्ताव पारित करती है तो उस विचार-विमर्श का कोई प्रमाण रिकॉर्ड पर नहीं रहता, जिसके लिए उस मंच का अस्तित्व है।' फुल कोर्ट हाईकोर्ट के सभी न्यायाधीशों का सामूहिक मंच होता है। इसका मक़सद अहम प्रशासनिक और नीतिगत विषयों पर संस्थागत विचार-विमर्श करना है। ऐसे में यदि बैठकों में सदस्यों की अलग-अलग राय दर्ज नहीं होती तो निर्णय प्रक्रिया की पारदर्शिता और जवाबदेही पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
CJ की समितियों के कामकाज पर भी सवाल
जस्टिस दिवाकर ने हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीशों की प्रशासनिक कार्यप्रणाली पर भी सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि मुख्य न्यायाधीश की ओर से प्रशासनिक कामकाज के लिए बनाई गई विभिन्न समितियों की कार्यवाही और उनके मिनट्स कभी फुल कोर्ट के सामने नहीं रखे गए। इससे यह लगता है कि ये समितियाँ खुद हाईकोर्ट की व्यवस्था से आज़ाद होकर काम कर रही हैं।
जस्टिस दिवाकर ने कहा कि ऐसी स्थिति में हाईकोर्ट के भीतर इन मुद्दों को उठाने के लिए कोई प्रभावी संस्थागत मंच मौजूद नहीं रहता। उन्होंने कहा कि यदि न्यायाधीशों को अपनी चिंताएँ केवल न्यायिक आदेशों के माध्यम से ही सामने रखनी पड़ें तो उन्हें ऐसे वातावरण में काम करना पड़ता है जो न तो न्यायिक कार्य के अनुकूल है और न ही इस महान संस्था की गरिमा के अनुरूप।यूपी की जिला अदालतों में 7834 पद खाली
जस्टिस दिवाकर ने प्रशासनिक व्यवस्था की कमियों को जिला अदालतों में कर्मचारियों और न्यायिक अधिकारियों की भारी कमी से भी जोड़ा है। फ़ैसले के अनुसार, उत्तर प्रदेश की जिला न्यायपालिका में कर्मचारियों के कुल 28552 स्वीकृत पदों के मुकाबले 7834 पद खाली हैं। इसका मतलब है कि जिला अदालतों में कर्मचारियों के लगभग 27.4 प्रतिशत पद रिक्त हैं।
न्यायिक अधिकारियों की स्थिति भी चिंताजनक बताई गई है। राज्य में न्यायिक अधिकारियों के 4625 स्वीकृत पदों के मुकाबले केवल 2603 अधिकारी उपलब्ध हैं। यानी 2022 पद खाली हैं। हालाँकि, सितंबर में न्यायिक अधिकारियों के 900 अतिरिक्त पद स्वीकृत किए गए थे। फ़ैसले में सितंबर 2026 तक की स्थिति का ज़िक्र करते हुए हाईकोर्ट रजिस्ट्री और जिला न्यायपालिका में कुल 10352 रिक्तियों का आँकड़ा दिया गया है। इनमें शामिल हैं-
- न्यायिक अधिकारियों के 1122 रिक्त पद।
- जिला न्यायपालिका के कर्मचारियों के 7834 रिक्त पद।
- हाईकोर्ट रजिस्ट्री के 1396 रिक्त पद।
जस्टिस दिवाकर के अनुसार, प्रशासनिक विवेकाधिकार के इस्तेमाल के लिए स्पष्ट और व्यवस्थित ढाँचे की कमी का सीधा असर न्याय प्रशासन पर पड़ रहा है।
उच्च न्यायिक सेवा की भर्ती में भी देरी
फ़ैसले में न्यायिक अधिकारियों की भर्ती प्रक्रिया में देरी को पर भी चिंता जताई गई है। दिसंबर 2023 में उच्च न्यायिक सेवा के 83 पदों के लिए विज्ञापन जारी किया गया था। इसकी लिखित परीक्षा अगस्त 2026 में आयोजित हुई, लेकिन फैसले के समय तक परिणाम घोषित नहीं किया गया था। जस्टिस दिवाकर ने कहा कि सितंबर 2022 के बाद से उच्च न्यायिक सेवा में कोई नियुक्ति नहीं हुई है। सिविल जज (जूनियर डिवीजन) की भर्ती की स्थिति भी बताई गई है। इस पद के लिए आखिरी भर्ती अधिसूचना 10 दिसंबर 2022 को 303 पदों के लिए जारी की गई थी। इसका परिणाम 30 अगस्त 2023 को घोषित हुआ था। इसके बाद से सिविल जज (जूनियर डिवीजन) के पदों पर कोई नई भर्ती नहीं हुई है।
फ़ैसला मुख्य न्यायाधीश, केंद्र सरकार को भेजने का निर्देश
न्यायमूर्ति विनोद दिवाकर ने अपने फ़ैसले में हाईकोर्ट के प्रशासनिक कामकाज से जुड़े मुद्दों को मुख्य न्यायाधीश के सामने रखने का निर्देश दिया है। उन्होंने कहा कि फ़ैसले को मुख्य न्यायाधीश के समक्ष रखा जाए ताकि वे इसकी जाँच कर सकें और उचित समझे जाने वाले आगे के क़दम उठा सकें।
इसके अलावा फ़ैसले की एक प्रति केंद्रीय कानून मंत्रालय के न्याय विभाग के सचिव को भेजने का निर्देश दिया गया है। न्याय विभाग के सचिव से कहा गया है कि वे इसे कानून और न्याय मंत्रालय के स्वतंत्र प्रभार वाले राज्य मंत्री के विचार के लिए पेश करें। जस्टिस दिवाकर ने यह भी निर्देश दिया है कि फ़ैसले में उठाए गए मुद्दों से संबंधित नोट की एक प्रति भारत सरकार के कैबिनेट सचिव को भेजी जा सकती है।