इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पत्रकार सत्यम वर्मा को राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (NSA) के तहत हिरासत में लेने के आदेश में इस्तेमाल किए गए ‘आंदोलनजीवी’ शब्द पर गंभीर सवाल उठाए हैं। अदालत ने पूछा कि यह शब्द सरकारी हिरासत आदेश में कहां से आया और इसे आधिकारिक दस्तावेज में शामिल करने का आधार क्या था? अदालत ने यह सवाल नोएडा के जिला मजिस्ट्रेट मेधा रूपम की ओर से जारी हिरासत के आधारों की सुनवाई के दौरान उठाया।
जस्टिस अतुल श्रीधरन और जस्टिस अचल सचदेव की पीठ ने 7 और 8 अक्टूबर को वर्मा की बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका पर दोनों पक्षों की दलीलें सुनीं। इसके बाद अदालत ने अपना फैसला सुरक्षित रख लिया। सुनवाई के दौरान पीठ ने वर्मा की राजनीतिक विचारधारा, साहित्य और एक संगठन से उनके कथित जुड़ाव को हिरासत का आधार बनाए जाने पर भी सवाल किए।

सरकारी दस्तावेज में ‘आंदोलनजीवी’ शब्द क्यों?

Live Law की रिपोर्ट के मुताबिक, सुनवाई के दौरान जस्टिस अतुल श्रीधरन ने उत्तर प्रदेश सरकार के अतिरिक्त महाधिवक्ता मनीष गोयल से पूछा:
“यह ‘आंदोलनजीवी’ शब्द कहां से आया? यह किसी आधिकारिक दस्तावेज में कैसे शामिल हो गया?” यह सवाल उस समय उठा जब अदालत सत्यम वर्मा के खिलाफ जारी हिरासत आदेश और उसमें दर्ज कारणों की जांच कर रही थी। मामले का एक महत्वपूर्ण पहलू यह है कि हिरासत के आधारों में वर्मा को कथित तौर पर अतार्किक, हठी और हिंसक ‘आंदोलनजीवी’ बताया गया है। दस्तावेज में उनकी विचारधारा को भी औद्योगिक अशांति और सार्वजनिक व्यवस्था के लिए खतरा पैदा करने वाली गतिविधियों से जोड़ा गया है। अदालत ने इस बात पर भी सवाल किया कि किसी व्यक्ति की विचारधारा, उसके पास मौजूद साहित्य या किसी संगठन से उसके जुड़ाव को अपने आप में हिरासत का आधार कैसे बनाया जा सकता है।
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क्या है पूरा मामला?

यह मामला अप्रैल 2026 में नोएडा में मजदूरों के प्रदर्शन और उससे जुड़ी हिंसा के बाद पत्रकार सत्यम वर्मा को राष्ट्रीय सुरक्षा कानून के तहत हिरासत में लिए जाने से संबंधित है। गौतम बुद्ध नगर की जिला मजिस्ट्रेट मेधा रूपम ने 12 मई 2026 को राष्ट्रीय सुरक्षा कानून की धारा 3(2) और 3(3) के तहत वर्मा की निवारक हिरासत का आदेश जारी किया था। वर्मा ने इस आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती दी है। अपनी याचिका में उन्होंने हिरासत आदेश के अलावा राज्य सरकार के 20 मई के अनुमोदन आदेश और 10 जून के पुष्टि आदेश को भी चुनौती दी है। उन्होंने इन आदेशों को रद्द करने, तत्काल रिहाई और कथित अवैध हिरासत के लिए मुआवजे की मांग की है।

हिरासत आदेश में क्या-क्या आरोप लगाए गए?

जिला मजिस्ट्रेट के 12 मई के आदेश में कहा गया कि अप्रैल में मजदूरों के आंदोलन के दौरान हुई औद्योगिक अशांति और हिंसा से गौतम बुद्ध नगर के औद्योगिक विकास, निवेश और रोजगार पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है। हिरासत के आधारों में कहा गया कि नोएडा में बड़ी संख्या में औद्योगिक इकाइयां हैं। यदि हिंसक घटनाएं बार-बार होती हैं, तो इससे उद्योग संचालकों और निवेशकों के बीच भय का माहौल पैदा हो सकता है तथा औद्योगिक गतिविधियां प्रभावित हो सकती हैं।
आदेश में वर्मा पर आरोप लगाया गया कि वे रिवोल्यूशनरी वर्कर्स पार्टी ऑफ इंडिया (RWPI) से जुड़े थे और संगठन की गतिविधियों तथा साहित्य के जरिए युवाओं को प्रभावित कर उन्हें हिंसक गतिविधियों की ओर प्रेरित किया जा रहा था। दस्तावेज में ‘मास कम्युनिकेशन के जरिए नैरेटिव निर्माण’ का भी उल्लेख है। आरोप लगाया गया कि मजदूरों और आम लोगों के बीच सरकार तथा प्रशासन के खिलाफ सोच विकसित करके सार्वजनिक शांति भंग करने की कोशिश की गई। प्रशासन का दावा था कि यदि कथित गतिविधियों को नहीं रोका गया, तो इससे भविष्य में सार्वजनिक शांति, औद्योगिक क्षेत्र और राज्य के औद्योगिक विकास को गंभीर नुकसान हो सकता है। ये प्रशासन के आरोप हैं, जिनकी सत्यता पर अदालत में चुनौती दी गई है।

क्या सोशल मीडिया पोस्ट से कॉपी किए गए हिरासत के आधार

सत्यम वर्मा की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता कॉलिन गोंसाल्वेस ने दलील दी कि हिरासत के आधार उनकी राजनीतिक विचारधारा, RWPI से कथित संबंधों तथा साहित्य पढ़ने, लिखने, अनुवाद करने और प्रकाशित करने जैसी गतिविधियों को अपराध की तरह पेश करते हैं। याचिका में एक गंभीर आरोप यह भी लगाया गया है कि 12 मई को जारी हिरासत के आधार 14 अप्रैल 2026 को ‘The Chronology’ नाम के सोशल मीडिया अकाउंट पर प्रकाशित एक पोस्ट का सीधे, बिना सत्यापन के और शब्दशः पेश किया गया था। वर्मा की याचिका के मुताबिक, इस पोस्ट का शीर्षक था:
“Revolutionary Workers' Party of India (RWPI): A Multi-Front Agitation Syndicate- Inside Story of Noida Violence”
याचिका में यह भी आरोप है कि पुलिस स्टेशन फेज-2 के निरीक्षक की 9 मई की रिपोर्ट भी उसी सोशल मीडिया पोस्ट से ‘कट-कॉपी-पेस्ट’ की गई थी। इसी रिपोर्ट को बाद में हिरासत के आधार के रूप में इस्तेमाल किया गया। वर्मा का दावा है कि संबंधित पोस्ट में नोएडा के न्यूनतम वेतन विवाद को कई असंबंधित घटनाओं से जोड़ने की कोशिश की गई थी। इनमें मुंबई में ग़ज़ा के समर्थन में हुए प्रदर्शन, सीएए-एनआरसी विरोधी आंदोलन, दिल्ली में प्रदूषण के खिलाफ प्रदर्शन और भगत सिंह जन अधिकार यात्रा शामिल थी। 

नोएडा हिंसा के समय लखनऊ में होने का दावा

वर्मा की याचिका का एक प्रमुख आधार यह है कि हिरासत आदेश में उन्हें 13 अप्रैल 2026 को नोएडा में हुई हिंसा से जोड़ा गया, जबकि उनके मुताबिक उस समय वे लखनऊ में थे। उनके वकील ने अदालत को बताया कि सीसीटीवी फुटेज के अनुसार वर्मा को 13 अप्रैल को दोपहर लगभग 2:13 बजे लखनऊ में देखा गया था। याचिका में कहा गया है कि इसके कुछ ही समय बाद उन्हें लखनऊ के हसनगंज थाने की पुलिस ने हिरासत में ले लिया।
वर्मा ने अपने दावे के समर्थन में सीसीटीवी फुटेज और मोबाइल फोन के कॉल डिटेल रिकॉर्ड (CDR) का हवाला दिया है।
याचिका में आरोप लगाया गया है कि हिरासत का आदेश देने वाले अधिकारी के सामने ये महत्वपूर्ण दस्तावेज प्रस्तुत नहीं किए गए, जबकि एक अन्य आरोपी के कॉल डिटेल रिकॉर्ड का इस्तेमाल किया गया। वर्मा का यह भी कहना है कि हिरासत के आधार के रूप में जिन 11 एफआईआर का उल्लेख किया गया, उनमें से किसी में भी उन्हें आरोपी के तौर पर नामजद नहीं किया गया था। इन दलीलों के जरिए उनकी ओर से यह सवाल उठाया गया है कि जब कथित घटना में उनकी मौजूदगी और भूमिका ही विवादित है, तो उनके खिलाफ निवारक हिरासत का आदेश किस आधार पर जारी किया गया। 

पत्रकारिता, विचारधारा और साहित्य को हिरासत का आधार बनाने पर सवाल

सत्यम वर्मा की ओर से दलील दी गई कि किसी व्यक्ति का राजनीतिक विचार रखना, अकादमिक साहित्य पढ़ना, पत्रकारिता करना या किसी संगठन से वैचारिक जुड़ाव होना अपने आप में निवारक हिरासत का पर्याप्त आधार नहीं हो सकता। उनके वकील ने तर्क दिया कि भाषण या लेखन के लिए आपराधिक जिम्मेदारी तय करने के लिए हिंसा भड़काने से आवश्यक संबंध स्थापित करना होगा। केवल असहमति या किसी विचारधारा से जुड़ाव को हिंसक गतिविधियों का प्रमाण नहीं माना जा सकता। याचिका में संविधान के अनुच्छेद 19(1)(a), 19(1)(c), 21 और 22(5) के तहत मौलिक अधिकारों के उल्लंघन का भी आरोप लगाया गया है।

वर्मा पर आरोप लगाया गया कि उनकी प्रोफेशनल कमाई का इस्तेमाल कथित अशांति को बढ़ावा देने के लिए किया गया। उनका कहना है कि यह आय उनके पेशे से हुई थी और औपचारिक बैंकिंग माध्यमों से प्राप्त हुई थी। याचिका में सुप्रीम कोर्ट के उन फैसलों का भी हवाला दिया गया है, जिनमें हिरासत की असाधारण शक्ति के सीमित इस्तेमाल पर जोर दिया गया है। वर्मा की दलील है कि इस कानून का इस्तेमाल सामान्य आपराधिक न्याय प्रक्रिया के विकल्प के तौर पर या नियमित जमानत प्रक्रिया को निष्प्रभावी करने के लिए नहीं किया जा सकता।

राज्य सरकार की मंजूरी और प्रतिवेदन को लेकर भी आपत्ति

याचिका में हिरासत से जुड़ी प्रक्रिया पर भी सवाल उठाए गए हैं। वर्मा का आरोप है कि राज्य सरकार का 20 मई 2026 का अनुमोदन आदेश उन्हें उपलब्ध नहीं कराया गया। उनके मुताबिक, इससे उन्हें संविधान के अनुच्छेद 22(5) के तहत प्रभावी प्रतिवेदन देने के अधिकार पर असर पड़ा। याचिका में कहा गया है कि उन्होंने 21 मई को अपना वैधानिक प्रतिवेदन प्रस्तुत किया था, लेकिन उसे दबा दिया गया और राष्ट्रीय सुरक्षा कानून की धारा 11(1) के तहत आवश्यक विचार के लिए सलाहकार बोर्ड के सामने नहीं रखा गया। इसके अलावा, वर्मा ने हिरासत के आधारों में प्रतिवेदन देने के लिए केवल 12 दिन की अवधि बताए जाने और सरकार की मंजूरी के बाद प्रतिवेदन पर विचार नहीं किए जाने संबंधी कथित निर्देशों पर भी आपत्ति जताई है। याचिका में 26 मई को जारी हिरासत के अतिरिक्त आधारों तथा सलाहकार बोर्ड के समक्ष प्रतिवेदन के निपटारे की प्रक्रिया को भी चुनौती दी गई है।

फैसला सुरक्षित

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 7 और 8 अक्टूबर को मामले की सुनवाई के बाद फैसला सुरक्षित रख लिया है। इसका अर्थ है कि अदालत ने दोनों पक्षों की दलीलें सुन ली हैं, लेकिन अंतिम निर्णय सुनाना अभी बाकी है। सत्यम वर्मा की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता कॉलिन गोंसाल्वेस के साथ अधिवक्ता अभिषेक द्विवेदी, दीक्षा द्विवेदी और माणिक गुप्ता पेश हुए। मामले का केंद्रीय प्रश्न केवल ‘आंदोलनजीवी’ शब्द के इस्तेमाल तक सीमित नहीं है। अदालत के सामने यह भी विचारणीय है कि क्या हिरासत के लिए प्रस्तुत सामग्री पर्याप्त और विश्वसनीय थी, क्या वर्मा को कथित हिंसा से जोड़ने वाला आवश्यक आधार मौजूद था और क्या निवारक हिरासत की प्रक्रिया में कानूनी तथा संवैधानिक आवश्यकताओं का पालन किया गया।