इलाहाबाद हाई कोर्ट ने कहा है कि उत्तर प्रदेश सरकार 'गुंडा एक्ट' को लगातार दमन के हथियार के रूप में इस्तेमाल कर रही है। इसने कहा है कि उसके सामने आए कई मामलों से यह पता चलता है कि सरकार इसे दमन के हथियार के तौर पर इस्तेमाल करने की नीति पर काम कर रही है।

इलाहाबाद हाईकोर्ट की जस्टिस सुभाष विद्यार्थी की बेंच ने गोंडा के एक निवासी ज़ाहिद अली के खिलाफ जारी आदेशों को रद्द करते हुए यह टिप्पणी की। उस आदेश के तहत ज़ाहिद अली को ‘गुंडा’ घोषित कर छह महीने के लिए जिले से बाहर रहने का आदेश दिया गया था। बार एंड बेंच की रिपोर्ट के अनुसार अदालत ने कहा कि किसी आपराधिक मामले में बरी हो चुके व्यक्ति की उस मामले में कथित संलिप्तता को बाद में उसे ‘गुंडा’ घोषित करने का आधार नहीं बनाया जा सकता। कोर्ट ने यह भी कहा कि अकेले 2020 में दर्ज एक आपराधिक मामले से यह साबित नहीं होता कि कोई व्यक्ति आदतन अपराध करता है।
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दरअसल, ज़ाहिद अली के इस मामले में फ़ैसला देते हुए ही इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश में उत्तर प्रदेश कंट्रोल ऑफ गुंडाज एक्ट 1970 के इस्तेमाल को लेकर यूपी सरकार के ख़िलाफ़ यह बड़ी टिप्पणी की है। कोर्ट ने कहा कि अदालतों द्वारा लगातार इसके दुरुपयोग की ओर ध्यान दिलाए जाने के बावजूद राज्य में इस कानून का इस्तेमाल कथित तौर पर दमन के एक हथियार के रूप में किया जा रहा है।

जस्टिस सुभाष विद्यार्थी ज़ाहिद अली बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और चार अन्य मामले में सुनवाई कर रहे थे। अदालत ने गोंडा के ज़िला मजिस्ट्रेट और देवीपाटन मंडल के कमिश्नर के उन आदेशों को रद्द कर दिया, जिनके आधार पर ज़ाहिद अली को ‘गुंडा’ घोषित किया गया था।

'गुंडा एक्ट का इस्तेमाल बहुत सावधानी से हो'

हाईकोर्ट ने कहा कि गुंडा एक्ट एक शक्तिशाली क़ानून है। इसका उद्देश्य ऐसे लोगों पर नियंत्रण रखना है जो वास्तव में सार्वजनिक व्यवस्था के लिए ख़तरा पैदा करते हैं। अदालत के मुताबिक़ गुंडा एक्ट का इस्तेमाल बहुत सीमित और स्पष्ट मामलों में किया जाना चाहिए, जहां सार्वजनिक अव्यवस्था या सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने की वास्तविक जरूरत हो।

कोर्ट ने कहा कि अदालतें पहले भी कई बार राज्य सरकार को याद दिला चुकी हैं कि इस क़ानून का इस्तेमाल निर्दोष लोगों के ख़िलाफ़ दमन के साधन के रूप में नहीं किया जा सकता है। किसी व्यक्ति को किसी गंभीर अपराध में दोषी ठहराए बिना सिर्फ उसके खिलाफ दर्ज मामलों के आधार पर ऐसी कार्रवाई करना क़ानून का मक़सद नहीं है।

'चेतावनी के बावजूद लगातार आ रहे केस'

हाईकोर्ट ने इस मामले में राज्य के रवैये पर गंभीर टिप्पणी की। अदालत ने कहा कि उसके सामने लगातार ऐसे मामले आ रहे हैं, जिनसे संकेत मिलता है कि राज्य सरकार गुंडा एक्ट का इस्तेमाल दमन के एक हथियार के रूप में करने पर कायम है। कोर्ट ने मौजूदा मामले को क़ानून के दुरुपयोग का एक साफ़ उदाहरण बताया।

यह टिप्पणी इसलिए अहम है क्योंकि गुंडा एक्ट के तहत किसी व्यक्ति को जिले से बाहर करने जैसी कार्रवाई की जा सकती है। ऐसे में कोर्ट ने इस तरह की कार्रवाई के लिए कानून में तय शर्तों और उसके सावधानीपूर्वक इस्तेमाल पर जोर दिया।

मामले में पुलिस ने ज़ाहिद अली को ‘गुंडा’ घोषित करने के लिए उनके ख़िलाफ़ दर्ज दो आपराधिक मामलों का हवाला दिया था। लेकिन हाईकोर्ट ने पाया कि इनमें से एक मामले में ज़ाहिद अली पहले ही बरी हो चुके थे। अदालत ने साफ़ कहा कि जिस आपराधिक मामले में कोई व्यक्ति बरी हो चुका है, उसमें उसकी कथित संलिप्तता को बाद में उसे ‘गुंडा’ घोषित करने का आधार नहीं बनाया जा सकता है।

पुलिस को बरी होने की जानकारी थी?

अदालत ने यह भी ध्यान दिया कि ज़ाहिद अली ने ज़िला मजिस्ट्रेट के सामने अपनी आपत्ति दाखिल करते समय इस तथ्य का उल्लेख नहीं किया था कि वह एक मामले में बरी हो चुके हैं। इस वजह से कोर्ट ने कहा कि केवल इस आधार पर ज़िला मजिस्ट्रेट को गलती का जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता है, क्योंकि उनके सामने उस समय यह तथ्य नहीं रखा गया था।

लेकिन अदालत ने इसके साथ ही एक अहम सवाल उठाया। कोर्ट ने कहा कि पुलिस को ज़ाहिद अली के बरी होने की जानकारी होनी चाहिए थी। इसके बावजूद उनके खिलाफ उस मामले में संलिप्तता का उल्लेख किया गया। अदालत की राय थी कि बरी होने की जानकारी होने के बावजूद उस मामले को उनके खिलाफ पेश करने से ज़ाहिद अली की गलत तस्वीर ज़िला मजिस्ट्रेट के सामने पेश करने की कोशिश दिखाई देती है।
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कमिश्नर ने भी ठीक से विचार नहीं किया

ज़ाहिद अली ने बाद में जिला मजिस्ट्रेट के आदेश के खिलाफ देवीपाटन मंडल की कमिश्नर के सामने अपील की थी। इस अपील में उन्होंने अपने बरी होने का तथ्य भी बताया था। लेकिन हाईकोर्ट ने पाया कि कमिश्नर ने उनके द्वारा उठाए गए आधारों पर पर्याप्त रूप से विचार नहीं किया और ज़िला मजिस्ट्रेट के आदेश को बरकरार रखा। हाईकोर्ट ने इस प्रक्रिया पर भी सवाल उठाया।

हाईकोर्ट ने मामले के सबसे अहम पहलू के रूप में यह देखा कि ज़ाहिद अली के खिलाफ जिस एक आपराधिक मामले का हवाला दिया गया था, वह 2020 का था। अदालत ने कहा कि केवल एक आपराधिक मामले में संलिप्तता से यह साबित नहीं होता कि कोई व्यक्ति आदतन अपराध करता है, अपराध करने की कोशिश करता है या अपराध में मदद करता है। गुंडा एक्ट के तहत किसी व्यक्ति को ‘गुंडा’ घोषित करने के लिए केवल एक पुराने मामले का होना पर्याप्त नहीं माना जा सकता।

अदालत ने इस मामले में समय के अंतर को भी महत्वपूर्ण माना। कोर्ट ने कहा कि कथित घटना और 2020 में दर्ज केस के बाद ज़ाहिद अली को वर्ष 2026 में गुंडा घोषित करने और जिले से बाहर करने के बीच काफी लंबा अंतर था। अदालत के मुताबिक 2020 में आपराधिक मामला दर्ज होने और 2026 में गुंडा घोषित किए जाने के बीच कोई सही और तार्किक संबंध दिखाई नहीं देता। कोर्ट ने यह भी कहा कि रिकॉर्ड में ऐसा कोई आरोप नहीं था कि ज़ाहिद अली कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए खतरा थे।

अदालत के सामने ऐसा पर्याप्त आधार नहीं था, जिससे यह साबित हो कि उनकी गतिविधियों के कारण तत्काल सार्वजनिक व्यवस्था को खतरा पैदा हो रहा था।

हाईकोर्ट ने दोनों आदेश रद्द किए

इन सभी पहलुओं को देखते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट ने गोंडा के ज़िला मजिस्ट्रेट और देवीपाटन मंडल के कमिश्नर के आदेशों को रद्द कर दिया। इसका सीधा मतलब है कि ज़ाहिद अली को ‘गुंडा’ घोषित करने और उन्हें छह महीने के लिए गोंडा जिले से बाहर करने की कार्रवाई अब प्रभावी नहीं रहेगी। अदालत ने इस मामले में गुंडा एक्ट के इस्तेमाल की सीमा भी स्पष्ट की। कोर्ट के अनुसार इस कानून का इस्तेमाल सामान्य आपराधिक मामलों या पुराने मामलों के आधार पर किसी व्यक्ति के खिलाफ नहीं किया जा सकता, जब तक उसके खिलाफ कानून में निर्धारित शर्तों के अनुरूप ठोस आधार मौजूद न हो।

गुंडा एक्ट के इस्तेमाल पर फिर उठे सवाल

इलाहाबाद हाईकोर्ट की यह टिप्पणी उत्तर प्रदेश में गुंडा एक्ट के इस्तेमाल को लेकर व्यापक बहस के बीच काफ़ी अहम है। कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए राज्य को कुछ विशेष शक्तियां दी गई हैं, लेकिन अदालत ने साफ़ किया है कि इन शक्तियों का इस्तेमाल बहुत सावधानी और स्पष्ट आधार के साथ होना चाहिए।

इस मामले में हाईकोर्ट ने खास तौर पर तीन बातों को अहम माना, एक मामले में ज़ाहिद अली का बरी होना, 2020 के मामले और 2026 की कार्रवाई के बीच लंबा अंतर और सार्वजनिक व्यवस्था के लिए खतरे का स्पष्ट आरोप न होना। इन्हीं आधारों पर अदालत ने कहा कि ज़ाहिद अली को ‘गुंडा’ घोषित करने के लिए जरूरी कानूनी आधार मौजूद नहीं था।