इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश पुलिस के कामकाज पर गंभीर सवाल उठाते हुए कहा है कि राज्य में नागरिकों की स्वतंत्रता की स्थिति बेहद शर्मनाक है। अवैध हिरासत के मामले में सीसीटीवी फुटेज उपलब्ध नहीं कराने पर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश पुलिस को कड़ी फटकार लगाई है। अदालत ने कहा कि राज्य में नागरिकों के मौलिक अधिकारों की बहुत कम परवाह है। कोर्ट ने कहा कि इन अधिकारों का उल्लंघन पुलिस के लिए नियमित प्रक्रिया जैसा बन गया है। कोर्ट ने बिजनौर के एक थाने की एसएचओ के खिलाफ नाराजगी जताते हुए इसे उनके सर्विस रिकॉर्ड में शामिल करने और मौजूदा पद पर बने रहने पर विचार करने का निर्देश दिया। इसके साथ ही पीड़ित परिवार को 20 हजार रुपये का हर्जाना देने का आदेश भी दिया।
जस्टिस अतुल श्रीधरन और जस्टिस अचल सचदेव की पीठ ने यह टिप्पणी एक अवैध हिरासत से जुड़े मामले में की। अदालत के सामने एक व्यक्ति की बेटी ने बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका दाखिल की थी। आरोप था कि पुलिस ने उसके पिता को औपचारिक गिरफ्तारी से पहले दो दिनों तक ग़ैरक़ानूनी तरीक़े से हिरासत में रखा था।
बार एंड बेंच की रिपोर्ट के अनुसार हाईकोर्ट ने 3 नवंबर के अपने आदेश में पुलिस द्वारा सीसीटीवी फुटेज उपलब्ध नहीं कराने पर कड़ी नाराजगी जताई। अदालत ने कहा कि जब भी पुलिस हिरासत से जुड़े मामलों में सीसीटीवी फुटेज मांगी जाती है तो ज्यादातर मामलों में पुलिस यही जवाब देती है कि किसी न किसी वजह से फुटेज उपलब्ध नहीं है।
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कोर्ट ने कहा- नागरिक स्वतंत्रता की स्थिति शर्मनाक

हाईकोर्ट ने अपने आदेश में उत्तर प्रदेश पुलिस के रवैये पर गंभीर टिप्पणी की। अदालत ने कहा, 'उत्तर प्रदेश राज्य में नागरिक स्वतंत्रता को लेकर जो स्थिति है वह शर्मनाक है। पुलिस को नागरिकों के मौलिक अधिकारों और नागरिक स्वतंत्रता की बहुत कम परवाह दिखाई देती है। इन अधिकारों का उल्लंघन उत्तर प्रदेश पुलिस के लिए नियमित प्रक्रिया जैसा बन गया है।'
पीठ ने कहा कि यह स्थिति बेहद चिंताजनक है। अदालत ने पुलिस के उस रवैये पर सवाल उठाया, जिसमें अवैध हिरासत के आरोपों की जांच के लिए ज़रूरी सीसीटीवी फुटेज उपलब्ध नहीं कराई जाती। अदालत के मुताबिक़ बार-बार एक ही तरह का जवाब देना न्यायिक प्रक्रिया और सच्चाई सामने लाने में बाधा पैदा करता है।

कोर्ट ने मांगी गई थी CCTV फुटेज

यह मामला बिजनौर जिले के नांगल थाना क्षेत्र से जुड़ा है। याचिकाकर्ता एक व्यक्ति की बेटी थी। उसने अदालत को बताया था कि पुलिस ने उसके पिता को 7 सितंबर को औपचारिक रूप से गिरफ्तार करने से पहले दो दिनों तक अवैध हिरासत में रखा था। पुलिस ने उसके पिता को एक कथित हनीट्रैप से जुड़ी शिकायत के सिलसिले में गिरफ्तार किया था।

अवैध हिरासत के आरोप की सच्चाई जानने के लिए हाईकोर्ट ने 13 अक्टूबर को पुलिस को संबंधित अवधि की सीसीटीवी फुटेज पेश करने का निर्देश दिया था। अदालत का उद्देश्य यह पता लगाना था कि व्यक्ति को औपचारिक गिरफ्तारी से पहले पुलिस थाने में रखा गया था या नहीं। लेकिन पुलिस ने अदालत को बताया कि सीसीटीवी फुटेज उपलब्ध नहीं है।

पुलिस की ओर से दी गई जानकारी के मुताबिक़ 5 सितंबर को थाने में हुई एक घटना के कारण सीसीटीवी सिस्टम काम नहीं कर रहा था। थाने की जनरल डायरी में पुलिस ने सीसीटीवी खराब होने की वजह आंधी-तूफान को बताया था।

तूफान का बहाना स्वीकार नहीं किया जा सकता: कोर्ट

हाईकोर्ट ने पुलिस के इस जवाब को स्वीकार करने से इनकार कर दिया। अदालत ने कहा कि अवैध हिरासत के मामले में पुलिस इस तरह का बहाना नहीं बना सकती। पीठ ने टिप्पणी की कि यदि पुलिस यह कहती है कि सीसीटीवी फुटेज उपलब्ध नहीं है तो अदालत इस बात को गंभीरता से लेगी कि कहीं सच्चाई छिपाने के लिए जानबूझकर फुटेज तो नहीं रोकी जा रही है।
अदालत ने कहा, "इस तरह का कोई भी बयान अदालत के लिए यह मानने के लिए पर्याप्त होगा कि याचिकाकर्ताओं का यह दावा सही है कि संबंधित व्यक्ति को गैरकानूनी रूप से हिरासत में रखा गया था और सच्चाई को छिपाने के लिए जानबूझकर सीसीटीवी फुटेज उपलब्ध नहीं कराई जा रही है।' अदालत ने यह भी कहा कि बार-बार सीसीटीवी फुटेज उपलब्ध नहीं होने का जवाब मिलना एक गंभीर समस्या है। ऐसे मामलों में पुलिस की जवाबदेही तय होनी चाहिए।
इलाहाबाद हाईकोर्ट की यह टिप्पणी उत्तर प्रदेश पुलिस की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े करती है। अदालत ने कहा कि अवैध हिरासत के मामलों में सीसीटीवी फुटेज का उपलब्ध न होना बार-बार सामने आ रहा है। यदि पुलिस बार-बार तकनीकी खराबी, बिजली की समस्या, तूफान या अन्य कारणों से फुटेज उपलब्ध नहीं कराती तो इससे जांच की निष्पक्षता और पुलिस की जवाबदेही पर सवाल उठते हैं।

हाईकोर्ट ने रिहाई का दिया आदेश

पुलिस द्वारा सीसीटीवी फुटेज उपलब्ध नहीं कराने और अवैध हिरासत के आरोपों को देखते हुए हाईकोर्ट ने बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका स्वीकार कर ली। अदालत ने याचिकाकर्ता के पिता को रिहा करने का आदेश दिया।
बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका का इस्तेमाल तब किया जाता है, जब किसी व्यक्ति को गैरकानूनी तरीके से हिरासत में रखे जाने का आरोप हो। इस याचिका के जरिए अदालत से यह मांग की जाती है कि हिरासत में रखे गए व्यक्ति को उसके सामने पेश किया जाए और हिरासत की वैधता की जांच की जाए। इस मामले में हाईकोर्ट ने पुलिस के रवैये पर सवाल उठाते हुए पीड़ित परिवार को राहत दी।
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हाईकोर्ट ने नांगल थाने की स्टेशन हाउस ऑफिसर अन्नू कुमारी के रवैये पर भी नाराजगी जताई। अदालत ने कहा कि एसएचओ ने जानबूझकर सीसीटीवी फुटेज उपलब्ध नहीं कराई। पीठ ने निर्देश दिया कि अदालत की नाराजगी को एसएचओ अन्नू कुमारी के सर्विस रिकॉर्ड में दर्ज किया जाए। इसके साथ ही राज्य सरकार को यह भी विचार करना चाहिए कि उन्हें मौजूदा पद पर आगे बनाए रखा जाए या नहीं।

पीड़ित परिवार को हर्जाना मिलेगा

हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार को याचिकाकर्ताओं को 20 हजार रुपये की लागत यानी हर्जाना देने का भी आदेश दिया। यह राशि अदालत की कार्यवाही में पीड़ित परिवार को हुई परेशानी और मामले में पुलिस के रवैये को ध्यान में रखते हुए दी गई है।