सहारनपुर कलेक्ट्रेट परिसर में तोड़ी गई मस्जिद के मामले में याचिकाकर्ता ने इलाहाबाद HC में दावा किया कि उनका सौ से अधिक वर्षों से कब्जा है। फिर भी सहारनपुर मजिस्ट्रेट ने 16 जुलाई 2026 को बेदखली का आदेश दिया और 6.41 करोड़ का हर्जाना लगाया।
सहारनपुर में डीएम कैंपस में मस्जिद गिरा दी गई।
उत्तर प्रदेश के सहारनपुर कलेक्ट्रेट परिसर में हाल ही में तोड़ी गई मस्जिद के मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 6.41 करोड़ रुपये के हर्जाने की वसूली पर रोक लगा दी है। इसके साथ ही हाईकोर्ट ने इस पूरी डिमोलिशन की कार्रवाई को लेकर उत्तर प्रदेश सरकार और स्थानीय प्रशासन को नोटिस जारी कर तीन हफ्ते में जवाब मांगा है। याचिकाकर्ता का दावा है कि विवादित जमीन पर मस्जिद 100 साल से ज्यादा समय से मौजूद थी और वह लंबे समय से उसके कब्जे में है।
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सहारनपुर कलेक्ट्रेट परिसर में मस्जिद को गिराए जाने से जुड़े मामले में यह बड़ा आदेश दिया है। यह आदेश जस्टिस रोहित रंजन अग्रवाल की पीठ ने मोहम्मद तनवीर अहमद की याचिका पर सुनवाई करते हुए दिया। याचिका में सार्वजनिक परिसर (अनधिकृत कब्जाधारियों की बेदखली) अधिनियम, 1971 की धारा 5 के तहत शुरू की गई बेदखली की कार्रवाई को चुनौती दी गई है।
हाईकोर्ट ने मामले को विचार करने योग्य मानते हुए उत्तर प्रदेश सरकार और स्थानीय प्रशासन को नोटिस जारी किया है। राज्य सरकार को तीन सप्ताह के भीतर अपना जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया गया है। अदालत ने अपने आदेश में कहा कि 16 जुलाई 2026 के सहारनपुर सिटी मजिस्ट्रेट के आदेश से लगाए गए हर्जाने की वसूली अगली तारीख तक स्थगित रहेगी। मामले की अगली सुनवाई 12 अक्टूबर को होगी।
दावा- मस्जिद 100 साल से ज्यादा पुरानी
मोहम्मद तनवीर अहमद ने हाईकोर्ट में कहा कि जब प्रशासन ने उन्हें विवादित जमीन से बेदखल करने की कार्रवाई शुरू की, तब उन्होंने इसका विरोध किया था। याचिकाकर्ता के मुताबिक उन्होंने संबंधित अधिकारियों के सामने लिखित जवाब भी दाखिल किया था। इसमें उन्होंने बताया था कि विवादित जमीन पर मस्जिद मौजूद है और वह जमीन उनके कब्जे में 100 साल से अधिक समय से है।याचिका के अनुसार, कब्जे के दावे की इन दलीलों के बावजूद सहारनपुर के सिटी मजिस्ट्रेट ने 16 जुलाई 2026 को बेदखली का आदेश पारित कर दिया। इसी आदेश में उनके ऊपर 6.41 करोड़ रुपये का हर्जाना भी लगाया गया।
इसके बाद इस आदेश को सहारनपुर के जिला जज के सामने चुनौती दी गई, लेकिन 2 सितंबर 2026 को अपील खारिज कर दी गई। इसके बाद याचिकाकर्ता ने हाईकोर्ट का रुख किया।
बेदखली के तीन दिन के भीतर मस्जिद गिराई
याचिकाकर्ता ने हाईकोर्ट में यह भी कहा कि प्रशासन ने मस्जिद को गिराने में काफी तेजी दिखाई। उनका दावा है कि सिटी मजिस्ट्रेट के 16 जुलाई के बेदखली आदेश के तीन दिन के भीतर ही मस्जिद को गिरा दिया गया। याचिकाकर्ता ने यह भी दलील दी कि विवादित जमीन के मूल मालिक याकूब खान और वाहिद खान थे। उनके मुताबिक, इन लोगों ने जमीन को नमाज पढ़ने और श्रद्धालुओं के इस्तेमाल के लिए वक्फ संपत्ति के तौर पर समर्पित किया था। हालाँकि, यह दावा अभी अदालत में विवादित है और इस पर अंतिम फैसला नहीं हुआ है।सरकार ने कहा- जमीन कलेक्ट्रेट की है
उत्तर प्रदेश सरकार की ओर से अतिरिक्त महाधिवक्ता मनीष गोयल ने याचिकाकर्ता की दलीलों का विरोध किया। राज्य सरकार ने अदालत को बताया कि सरकारी रिकॉर्ड में विवादित जमीन कलेक्ट्रेट की संपत्ति के रूप में दर्ज है।
सरकार ने याचिकाकर्ता के दावे में कथित इनकंसिस्टेंसीज यानी विसंगतियों की ओर भी अदालत का ध्यान दिलाया। राज्य की ओर से कहा गया कि याचिकाकर्ता ने अपने लिखित जवाब में याकूब खान और वाहिद खान को जमीन का मूल मालिक बताया है, लेकिन यह साफ़ नहीं किया कि जमीन को वक्फ के लिए कब समर्पित किया गया था। सरकार के मुताबिक, याचिकाकर्ता की ओर से इस दावे के समर्थन में कोई वक्फ डीड यानी वक्फ दस्तावेज भी पेश नहीं किया गया।
मूल मालिकों ने कभी दावा क्यों नहीं किया: सरकार
राज्य सरकार ने यह भी कहा कि जिन लोगों को याचिकाकर्ता ने जमीन का मूल मालिक बताया है उन्होंने खुद कभी अदालत का रुख कर इस संपत्ति पर अपना अधिकार नहीं जताया। सरकार की दलील थी कि यदि याकूब खान और वाहिद खान वास्तव में इस जमीन के मालिक थे तो उनके द्वारा संपत्ति पर अधिकार का दावा किया जाना चाहिए था। इस बात को भी राज्य सरकार ने याचिकाकर्ता के मामले में कथित विरोधाभास के तौर पर पेश किया।
जमीन पर पोस्ट ऑफिस भी है: सरकार
राज्य सरकार ने अदालत में यह भी बताया कि विवादित जमीन पर एक पोस्ट ऑफिस चल रहा है। सरकार का कहना है कि जिस परिसर में मस्जिद बनी थी, वहां के कुछ कमरे किराए पर लिए गए थे और इसी आधार पर बेदखली की कार्रवाई शुरू की गई। इस तरह, मामले में मुख्य विवाद यह है कि विवादित जमीन का कानूनी मालिक कौन है और मस्जिद किस अधिकार के आधार पर वहां मौजूद थी।
हाईकोर्ट ने कहा- मामला विचार करने योग्य
दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद हाईकोर्ट ने मामले को तुरंत खारिज नहीं किया। अदालत ने कहा कि मामला 'विचार करने योग्य' है। इसके बाद अदालत ने उत्तर प्रदेश सरकार और संबंधित प्रशासन को नोटिस जारी किया और तीन सप्ताह के भीतर जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया। अदालत ने साथ ही 6.41 करोड़ रुपये के हर्जाने की वसूली पर अंतरिम रोक लगा दी।
यह रोक फिलहाल अंतरिम है। इसका मतलब यह नहीं है कि अदालत ने मस्जिद की जमीन के मालिकाना हक या बेदखली के मामले में अंतिम फैसला याचिकाकर्ता के पक्ष में दे दिया है।अब 12 अक्टूबर को होगी अगली सुनवाई
इस मामले की अगली सुनवाई 12 अक्टूबर 2026 को होगी। तब तक राज्य सरकार और स्थानीय प्रशासन को अपना जवाब अदालत में दाखिल करना होगा। अगली सुनवाई में अदालत यह देख सकती है कि विवादित जमीन का रिकॉर्ड क्या कहता है, मस्जिद के लंबे समय से मौजूद होने के दावे का क्या आधार है और बेदखली तथा हर्जाने की कार्रवाई कानूनी प्रक्रिया के मुताबिक हुई या नहीं।
फिलहाल हाईकोर्ट के आदेश से याचिकाकर्ता को एक अंतरिम राहत मिली है। मस्जिद के स्वामित्व, जमीन के अधिकार और बेदखली की वैधता पर अंतिम फैसला अभी बाकी है।