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पत्रकारों को कमरे में बंद किया, योगी सरकार पर उठ रहे सवाल

उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार पर पत्रकारों को परेशान करने का आरोप एक बार फिर लग रहा है। मुख्यमंत्री का मज़ाक उड़ाने वाले वीडियो को शेयर करने वाले प्रशांत कन्नौजिया की गिरफ़्तारी और सुप्रीम कोर्ट से मिली फटकार के बाद उन्हें छोड़ने की घटना के ज़्यादा दिन नहीं हुए हैं। ताज़ा घटना में योगी एक बार फिर सवालों के घेरे में हैं। 

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आरोप लग रहा है कि मुख्यमंत्री ने बीते दिनों मुरादाबाद के सरकारी अस्पताल का मुआयना किया तो प्रशासन ने स्थानीय पत्रकारों को एक कमरे में बंद कर दिया ताकि ने योगी से कठिन सवाल न पूछ सकें। समाचार एजेन्सी एआईएनएस के मुताबिक़, प्रशासन ने पत्रकारों को इमर्जेंसी में दो घंटे तक बंद रखा और बाहर से ताला लगा दिया, ताकि बाहर न निकल सकें और न ही कोई सवाल पूछ सकें।

मामला क्या है?

पत्रकारों का यह भी आरोप है कि ज़िला मजिस्ट्रेट राकेश कुमार सिंह ने अस्पताल के बाहर ही गार्डों को तैनात कर दिया था और उन्हें निर्देश दिया गया था कि वे किसी को अंदर न घुसने दें। फिर भी किसी तरह कुछ पत्रकार अंदर घुस गए तो उन्हें घर में बंद कर बाहर से ताला लगा दिया गया। मुख्यमंत्री के लौट जाने के बाद पत्रकारों के कमरे का ताला खोल दिया गया। 

ज़िला प्रशासन ने इससे इनकार किया है। पर उसने यह ज़रूर माना है कि पत्रकारों से कहा था कि वे वार्ड में न जाएँ क्योंकि ऐसा करने से मरीज़ों को परेशानी होती है। ज़िला मजिस्ट्रेट ने पत्रकारों से दो टूक कह दिया के भविष्य में कभी रिपोर्टिंग के लिए अस्पताल न आएँ। सिंह ने बाद में समाचार एजेन्सी को कहा, ‘यह सच नहीं है। मुख्यमंत्री के मुआयना के दौरे डॉक्टर आए तो मैंने उनसे सिर्फ़ यह गुजारिश कि वे वार्ड में न जाएँ।’

कांग्रेस ने की आलोचना

इस पर कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी ने राज्य सरकार की तीखी आलोचना की है। उन्होंने कहा,  'पत्रकारों को बंधक बनाया जा रहा है, सवाल से बचा जा रहा है और समस्याओं से कन्नी काटी जा रही है। लोकसभा चुनाव में बहुमत हासिल करे वाली बीजेपी आम जनता के सवालों से मुँह चुरा रही है।'

मामला प्रशांत कन्नौजिया का

यह पहला मौका नहीं है जब उत्तर प्रदेश में पत्रकारों को निशाना बनाया गयाहै। मुरादाबाद की घटना के कुछ दिन पहले प्रशांत कन्नौजिया का मामला सामने आया था। कन्नौजिया ने अपने ट्विटर और फ़ेसबुक अकाउंट पर जो वीडियो शेयर किया था, उसमें एक महिला लखनऊ में मुख्यमंत्री आवास के बाहर पत्रकारों से बात कर रही है। महिला का दावा है कि वह मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से एक साल से वीडियो कॉन्फ़्रेंसिंग पर बातचीत कर रही है और उनसे शादी करना चाहती है।

प्रशांत ने इस वीडियो को अपने फ़ेसबुक अकाउंट से वायरल किया था। इसी को आधार बनाते हुए यूपी में हजरतगंज थाने की पुलिस ने मुक़दमा लिखा और आनन-फानन में प्रशांत को दिल्ली के विनोद नगर स्थित उनके आवास से हिरासत में ले लिया। हजरतगंज पुलिस ने आईपीसी की धारा 500 व आईटी एक्ट की धारा 66 के तहत चालान काटते हुए प्रशांत को जेल भेज दिया। पुलिस का कहना है कि अभियुक्त ने सुनियोजित साज़िश के तहत मुख्यमंत्री को बदनाम करने का प्रयास किया और सोशल मीडिया का सहारा लिया।

इसके साथ ही नोएडा पुलिस ने नेशन लाइव न्यूज़ चैनल पर दो मुक़दमे दर्ज किए थे। एक मुक़दमा मानहानि संबंधी धारा 505, 502, 501 व 153 में जबकि दूसरा जालसाज़ी के संबंध में धारा 419, 420, 467, 468 व 471 का दर्ज करते हुए चैनल हेड इशिका सिंह व संपादक अनुज शुक्ला को गिरफ़्तार कर लिया गया था। पुलिस का कहना है कि चैनल नेशन लाइव बिना किसी अनुमति के दिखाया जा रहा था। इस चैनल पर इस मामले को लेकर पैनल चर्चा का कार्यक्रम आयोजित किया गया था। 

पत्रकार की पिटाई

उत्‍तर प्रदेश के शामली में जीआरपी पुलिस ने एक न्यूज़ चैनल के पत्रकार को जमकर पीट दिया। पत्रकार की पिटाई का यह वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो गया है। वीडियो में जीआरपी के थानेदार राकेश कुमार और एक सिपाही सुनील एक साथी न्यूज़ 24 चैनल के पत्रकार को सबके सामने बुरी तरह पीटते दिख रहे हैं। इस दौरान वहाँ कई पुलिसकर्मी भी मौजूद रहे। पत्रकार शामली जनपद में ही चैनल के लिए रिपोर्टिंग करते हैं और उनका नाम अमित शर्मा बताया जा रहा है। बता दें कि महज एक वीडियो को ट्वीट करने के मामले में हुई पत्रकार प्रशांत कन्नौजिया की गिरफ़्तारी और फिर रिहाई को लेकर पहले ही उत्तर प्रदेश की योगी सरकार की पुलिस की ख़ासी किरकिरी हो चुकी है। 

रेंगने लगे पत्रकार?

इस पूरे मामले में सबसे बड़ा सवाल यह है कि मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद से जिस तरह से मीडिया को रेंगने के लिए मजबूर किया गया है, क्या वह कम चिंता का विषय है? टीवी चैनलों को सरकार और मोदी-अमित शाह का भोंपू और मुखपत्र बना दिया गया है। मोदी और अमित शाह के ख़िलाफ़ टीवी चैनलों पर एक शब्द नहीं चल सकता। जहाँ चलता है, वहाँ के संपादकों का क्या हाल होता है, यह एबीपी न्यूज़ के उदाहरण से साफ़ है। पत्रकार पुण्य प्रसून वाजेपी को इसलिए पद से हटा दिया गया कि उन्होंने प्रधानमंत्री के एक कार्यक्रम में किए गए दावे का खंडन करने वाली ख़बर चलाई थी और उस पर कार्यक्रम किया था।  यह आम है कि हर मामले में सिर्फ़ विपक्ष को कठघरे में खड़ा किया जाता है। राहुल गाँधी को रोज़ जोकर साबित करने की कोशिश की जाती है। मोदी से एक भी सवाल नहीं होता। हिंदू-मुसलमान के विषय में पत्रकारिता के सारे उसूल ताक़ पर रख दिए गए हैं। जमकर सांप्रदायिकता फैलाई जा रही है।

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