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मथुरा मसजिद पर ध्रुवीकरण तेज़, यूपी चुनाव में बनेगा मुद्दा?

क्या बीजेपी उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2022 के पहले ही मथुरा की ईदगाह मसजिद को बड़ा मुद्दा बनाने और उस आधार पर राज्य में राजनीतिक व सांप्रदायिक ध्रुवीकरण करने में कामयाब होगी? 

यह सवाल इसलिए उठ रहा है कि बीजेपी नेता व राज्य के उप मुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य के बयान के बाद इस मुद्दे पर राजनीतिक सरगर्मी तेज़ हो गई है। कई राजनीतिक दल इस मुद्दे पर मैदान में उतर चुके हैं और उन्होंने मोर्चा संभाल लिया है। 

क्या है मामला?

याद दिला दें कि केशव प्रसाद मौर्य ने बुधवार को ट्वीट कर कहा था, ''अयोध्या काशी में भव्य मंदिर निर्माण जारी है, मथुरा की तैयारी है।''

पूर्व मुख्यमंत्री और बहुजन समाज पार्टी (बीएसपी) की नेता मायावती ने इस पर बीजेपी पर ज़ोरदार हमला किया है। उन्होंने ट्वीट किया,  ''यूपी के डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्य द्वारा विधानसभा चुनाव के नजदीक दिया गया बयान कि अयोध्या-काशी में मंदिर निर्माण जारी है, अब मथुरा की तैयारी है, यह बीजेपी की हार की आम धारणा को पुख्ता करता है। इनके इस आख़िरी हथकंडे से अर्थात हिन्दू-मुसलिम राजनीति से भी जनता सावधान रहे।''

मायावती के ठीक पहले एक और पू्र्व मुख्यमंत्री और समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव ने बुधवार को आपत्ति जताई थी। उन्होंने कहा था,

बीजेपी का एजेंडा ग़रीबों को लूटने और अमीरों की जेब भरने का है। वे हमेशा अमीरों के लाभ के लिए काम करते रहे हैं। लेकिन आने वाले चुनाव में रथ यात्रा या नया मंत्र कोई काम नहीं आएगा।


अखिलेश यादव, नेता, समाजवादी पार्टी

इसके पहले समाजवादी पार्टी के सांसद शफीकुर्रहमान बर्क ने मौर्य के इस बयान पर तीखी टिप्पणी की थी। 

उन्होंने कहा था, "बाबरी मसजिद को तोड़कर जो मंदिर बनाया गया है, वह भी क़ानून और इंसाफ के ख़िलाफ़ किया गया है। हिंदुस्तान में मुसलमानों को ज़बरदस्ती दबाया और कुचला जा रहै है। अब वे मथुरा की बात कर रहे हैं।"

बर्क ने इसके आगे कहा, यदि ऐसा हुआ तो हिंदुस्तान के मुसलमान मैदान में आ जाएंगे। मुसलमान भी किसानों की तरह धरने पर बैठने के लिए मजबूर हो जाएगा।

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बीजेपी की नीयत पर सवाल क्यों?

बीजेपी की नीयत पर सवाल इसलिए भी उठ रहा है कि सुप्रीम कोर्ट में पूजा स्थल (विशेष प्रावधान) अधिनियम 1991 को चुनौती देने वाले अश्विनी  उपाध्याय भारतीय जनता पार्टी से जुड़े हैं। 

उन्होंने अदालत में याचिका दायर कर कहा है कि इस अधिनियम से न्यायिक पुनर्विचार के मौलिक अधिकार का उल्लंघन होता है, जिसकी गारंटी संविधान में दी गई है।

उन्होंने यह भी कहा है कि इस अधिनियम की वजह से जैन, बौद्ध, सिख और हिन्दू समुदाय से जुड़ा कोई व्यक्ति अपने धार्मिक स्थल को फिर से बहाल करने की माँग नहीं कर सकता, जिसे 15 अगस्त 1947 के पहले विदेशी हमलावरों ने नष्ट कर दिया था। 

बता दें कि इस क़ानून में यह प्रावधान है कि 15 अगस्त 1947 को जिस पूजा स्थल की जो स्थिति थी, उसे ही बरक़रार रखा जाएगा और उसमें किसी तरह का बदलाव नहीं किय जाएगा, सिर्फ अयोध्या स्थित राम जन्मभूमि मंदिर-बाबरी मसजिद को अपवाद माना गया था।

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