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चुप्पी ओढ़े मुसलमान और हाशिये पर क़ौमी तंज़ीमें

पश्चिम उत्तर प्रदेश में पहले दो चरणों में होने वाले मतदान के लिए नामांकन का समय ख़त्म हो चुका है। उत्तर प्रदेश में बाक़ी के चरणों में होने वाले मतदान के लिए सीटों पर क़रीब-क़रीब सभी प्रमुख दलों के प्रत्याशी तय होते जा रहे हैं। बीजेपी और कांग्रेस के बामुश्किल डेढ़ दर्ज़न प्रत्याशी तय होने बाक़ी रह गए हैं। पश्चिम उत्तर प्रदेश में जहाँ पहले चुनाव होने जा रहा है, क़रीब 14 सीटों पर 25 से 45 फ़ीसदी तक अल्पसंख्यक मतदाता हैं। आश्चर्यजनक रूप से हर बार मुसलिम राजनीति के केंद्र में रहने वाले इन इलाक़ों में रहस्यमय चुप्पी का नज़ारा है। शायद आज़ादी के बाद यह पहली बार है कि ज़्यादातर दलों से सबसे कम मुसलिम प्रत्याशी इस बार के चुनाव में उतरे हैं। अमूमन हर चुनाव से पहले अपनी माँगें, घोषणापत्र से लेकर तमाम वाजिब ग़ैर-वाजिब माँगें लेकर सामने आने वाली संस्थाएँ, उलेमा, नुमाइंदे कहीं नज़र तक नहीं आ रहे हैं।

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एआईएमआईएम, उलेमा काउंसिल जैसी पार्टियाँ ग़ायब 

विवादास्पद बयानों से सुर्खियाँ बटोरने वाले और बीते कई सालों से हर चुनाव में अपने प्रत्याशी खड़े कर अल्पसंख्यक मतों पर दावेदारी ठोकने वाले ऑल इंडिया मुसलिम इत्तेहादुल मुसलमीन (एआईएमआईएम) और उसके नेता असद्दुद्दीन ओवैसी ने अबकी बार उत्तर प्रदेश में न तो किसी को चुनाव में उतारा है न ही इधर का रुख़ किया है। ओवैसी ने उत्तर प्रदेश को लेकर किसी तरह का बयान तक नहीं दिया है। हाल ही में जब ओवैसी से एआईएमआईएम के यूपी के प्रत्याशियों के बारे में पूछा गया तो उन्होंने चुनाव लड़ने से इनकार कर दिया। उनका कहना था कि वह यूपी या बिहार में चुनाव लड़ कर वोटों का बँटवारा नहीं करवाना चाहते। हालाँकि उनका कहना है कि बिहार में किशनगंज में ज़रूर एआईएमआईएम के प्रदेश अध्यक्ष चुनाव में खड़े हुए हैं और उन्होंने इसकी इजाज़त दे दी है, पर बाक़ी कहीं नहीं। ओवैसी का कहना है कि दोनों राज्यों में उनकी पार्टी का नेतृत्व ज़रूर प्रत्याशी खड़ा करने का दबाव बनाए हुए हैं पर उनकी सहमति नहीं है। बहरहाल, यूपी में कुछ जगहों पर स्थानीय नेतृत्व ने एआईएमआईएम ने कैंडीडेट भी घोषित किए हैं पर ओवैसी की उसमें कोई सहमति नहीं हैं।

इसी तरह का हाल बाटला हाउस कांड के बाद शक्ल में आयी उलेमा काउंसिल का है। कभी दर्ज़न भर सीटों पर अपने प्रत्याशी खड़े कर अल्पसंख्यक मतों के स्वाभाविक दावेदार सपा, बसपा, कांग्रेस के लिए परेशानी खड़ी करने वाली उलेमा काउंसिल भी इस बार के चुनाव में सन्नाटे में पड़ी है। यहाँ तक कि आजमगढ़ में जहाँ इस पार्टी का गठन हुआ था, अब तक कोई उम्मीदवार सामने नहीं आया है।

पीस पार्टी का हाल

कभी पसमांदा मुसलमानों ख़ासकर जुलाहों में ख़ासा प्रभाव जमा लेने वाली पीस पार्टी का हाल इन चुनावों में यह हो गया है कि उसे कहीं किसी गठबंधन में जगह तक नहीं मिल रही है। पहले सपा-बसपा-रालोद गठबंधन में और बाद में कांग्रेस से समझौते की आस लगाए बैठी पीस पार्टी को कहीं जगह न मिलने पर शिवपाल यादव की पार्टी प्रगतिशील लोकतांत्रिक समाजवादी पार्टी (प्रलोसपा) ने अपने साथ जोड़ा है। पीस पार्टी को उत्तर प्रदेश में प्रत्याशी भी बामुश्किल से मिल रहे हैं। पीस पार्टी ने बहराइच, श्रावस्ती, खलीलाबाद, बस्ती जैसी कुछ सीटों पर अपने प्रत्याशी खड़े कर मानो औपचारिकता निभा रही है।

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वोटों के सौदागरों की दुकानें भी बंद

अमूमन हर चुनाव से पहले चोंगा पहन कर जलसे, प्रेस कॉन्फ़्रेंस कर अल्पसंख्यक मतों पर दावेदारी जताते हुए अपनी माँगें रख अहमियत जताने वाले तमाम चेहरे भी इस चुनाव में ग़ायब हैं। हाल के दिनों में आतंकवाद मुसलमान के सवाल पर आंदोलन कर प्रदेश की राजनीति में अपना एक मुकाम बनाने वाले संगठन रिहाई मंच से जुड़े एक कार्यकर्ता बताते हैं कि मंच चुनावी राजनीति में कोई दखल नहीं दे रहा है। वहीं इसके संस्थापक व संजरपुर के रहने वाली मसीउद्दीन संजरी ने तो आजमगढ़ में खुल कर गठबंधन की वकालत की है। शिया और सुन्नी दोनों ही फिरकों के मौलानाओं की ओर से न तो इस बार कोई अपीलें जारी हो रही हैं न ही कोई फतवे।

आज़म ख़ान और इमरान मसूद की चुप्पी

अपने बड़बोले बयानों से ख़ुद अपनी पार्टी को अक्सर असहज कर देने वाले सपा नेता आज़म ख़ान इस बार सन्नाटे में हैं। रामपुर से लोकसभा चुनाव में उतरे आज़म ख़ान न तो पश्चिम में कहीं प्रचार करने गए न ही कोई ख़ास बयान दिया है। इसी हफ़्ते वो सपा कार्यालय में दिखे और जयाप्रदा को लेकर कुछ विवादास्पद बोल भी गए पर उसके तुरंत बाद न केवल ख़ुद को सुधारा बल्कि चुप्पी भी साध ली।

पिछले लोकसभा चुनावों में विवादास्पद बयान देकर सुर्खियों में आए सहारनपुर के कांग्रेस प्रत्याशी इमरान मसूद इस बार अपने क्षेत्र के मुसलिम इलाक़ों में नहीं, बल्कि दलित बस्तियों व शहरी सवर्णों के इलाक़े में ही दिन-रात घूम रहे हैं। उनके साथ चलने वाले भी मुसलिम कार्यकर्ता नहीं, बल्कि उनके ख़ास दोस्त भीम आर्मी के चंद्रशेखर रावण के लोग हैं।

कुमार तथागत
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