Saharanpur mosque demolition: सहारनपुर कलेक्ट्रेट परिसर में शनिवार 5 सितंबर को मस्जिद गिराने पर विवाद बढ़ा। प्रशासन ने अदालत के आदेश का हवाला दिया। बजरंग दल के कार्यकर्ता ने पिछले साल इसकी शिकायत की थी। यूपी में चंद महीनों बाद विधानसभा चुनाव है।
सहारनपुर में डीएम कैंपस में मस्जिद गिरा दी गई। मस्जिद 70 साल पुरानी थी
उत्तर प्रदेश के सहारनपुर में जिला कलेक्ट्रेट परिसर में स्थित एक मस्जिद को प्रशासन ने शनिवार 5 सितंबर की सुबह ढहा दिया। एनडीटीवी की रिपोर्ट में कहा गया कि यह 115 साल पुरानी मस्जिद थी। प्रशासन के मुताबिक यह मस्जिद सरकारी जमीन पर कथित रूप से अवैध बनी हुई थी और अदालत के आदेश के बाद इसे हटाने की कार्रवाई की गई। मस्जिद को लेकर कार्रवाई के दौरान इलाके में भारी पुलिस बल तैनात रहा। इस घटनाक्रम ने राजनीतिक विवाद भी खड़ा कर दिया है। कांग्रेस सांसद इमरान मसूद ने कड़ा बयान देते हुए इस पूरी कार्रवाई को अवैध बताया है। कैराना से समाजवादी पार्टी की लोकसभा सांसद इकरा हसन ने आरोप लगाया कि उन्हें सहारनपुर जाने से रोकने के लिए उनके आवास पर रातभर पुलिस तैनात कर उन्हें हाउस अरेस्ट कर दिया गया।
सुबह करीब पांच बजे हुई कार्रवाई
रिपोर्ट के मुताबिक, कलेक्ट्रेट परिसर स्थित मस्जिद को रातभर चली प्रशासनिक तैयारी के बाद सुबह करीब पांच बजे गिराया गया। मस्जिद को लेकर रात में ही उसके संभावित ध्वस्तीकरण की खबरें सामने आने लगी थीं। आज शनिवार सुबह लोगों को पता चला कि मस्जिद को ढहा दिया गया है। कार्रवाई के दौरान कलेक्ट्रेट परिसर और आसपास के इलाके में सुरक्षा व्यवस्था कड़ी रखी गई। प्रशासन ने पहले ही स्पष्ट किया था कि कार्रवाई अदालत के आदेश के आधार पर की जा रही है। 4 सितंबर को जिला जज की अदालत ने मस्जिद कमेटी की अपील खारिज करते हुए सिटी मजिस्ट्रेट के पहले के आदेश को बरकरार रखा था। इसके बाद प्रशासन ने ध्वस्तीकरण की कार्रवाई की।मस्जिद के खिलाफ शिकायत किसने की थी?
मस्जिद के खिलाफ पिछले साल शिकायत बजरंग दल के पूर्व प्रांतीय संयोजक विकास त्यागी ने की थी। शिकायत में आरोप लगाया गया था कि जिला मजिस्ट्रेट कार्यालय जैसे संवेदनशील सरकारी परिसर के भीतर मस्जिद का निर्माण अवैध रूप से किया गया है। शिकायत में यह भी आरोप लगाया गया था कि परिसर के कुछ हिस्सों का इस्तेमाल धार्मिक गतिविधियों के अलावा व्यावसायिक गतिविधियों के लिए किया जा रहा था। इनमें एक डाकघर और कुछ कमरों को निजी लोगों को किराये पर दिए जाने का दावा भी शामिल था। आरोप था कि मस्जिद कमेटी इन जगहों से किराया वसूल रही थी। सिटी मजिस्ट्रेट कुलदीप सिंह की अदालत ने मामले की सुनवाई के बाद मस्जिद को हटाने का आदेश दिया था। इसके साथ ही कथित अतिक्रमण और सरकारी जमीन के दुरुपयोग के मामले में करीब 6.41 करोड़ रुपये का जुर्माना/क्षतिपूर्ति भी लगाया गया था। हालांकि यह नया निर्माण नहीं था।
- यूपी में 2017 से बीजेपी की सरकार है। लेकिन 115 साल पुरानी मस्जिद को अवैध निर्माण बताकर गिराया गया। आमतौर अभी तक कई मस्जिदें पुराने मंदिर बताकर गिराई गईं। लेकिन डीएम ऑफिस परिसर में इसे अवैध बताया गया।
मस्जिद पक्ष ने क्या दलील दी थी?
मस्जिद पक्ष ने जिला अदालत में सिटी मजिस्ट्रेट के आदेश को चुनौती दी थी। उसका कहना था कि मस्जिद सुन्नी वक्फ बोर्ड में पंजीकृत है और इसलिए इसे वक्फ संपत्ति माना जाना चाहिए। पक्ष ने यह भी दलील दी कि वक्फ संपत्ति से जुड़े विवाद की सुनवाई का अधिकार संबंधित वक्फ प्राधिकरण को है। मस्जिद पक्ष ने 1991 के पूजा स्थल (विशेष प्रावधान) कानून का भी हवाला दिया। उसकी दलील थी कि 15 अगस्त 1947 को मौजूद धार्मिक स्थलों की धार्मिक स्थिति को कानून के तहत संरक्षित किया गया है।
- पक्ष ने पुराने राजस्व रिकॉर्ड का हवाला देते हुए दावा किया कि जमीन वाहिद खान और याकूब खान के नाम दर्ज थी और मस्जिद 1947 से पहले से अस्तित्व में थी। अपने दावे के समर्थन में 1 जनवरी 1911 का बिजली बिल, नगर पालिका के रिकॉर्ड सहित कुछ पुराने दस्तावेज अदालत के सामने पेश किए गए।
कांग्रेस सांसद इमरान मसूद का बयान
कांग्रेस सांसद इमरान मसूद ने कहा- "हमारे लोग रात भर जागते रहे। हमने अधिकारियों से संपर्क करने के लिए लगातार प्रयास किए। सारी जानकारी देने के बावजूद, मस्जिद को न केवल ध्वस्त किया गया, बल्कि वहां संविधान के टुकड़े-टुकड़े कर दिए गए... मस्जिद 1911 से पहले की है। आज तक मस्जिद का स्वामित्व वाहिद खान और याकूब खान के नाम पर ही रजिस्टर्ड है... उच्च न्यायालय में सब कुछ नजरअंदाज कर दिया गया; न तो वक्फ बोर्ड को मामले में पक्षकार बनाया गया और न ही उसे कार्यवाही में शामिल किया गया... मस्जिद को चारों ओर से घेरकर, लोगों को उनके घरों में कैद करके ध्वस्त किया गया... हम इस लड़ाई को कानूनी दायरे में लड़ेंगे... किसी को यह नहीं सोचना चाहिए कि मस्जिद को ध्वस्त करके उन्होंने कोई महान उपलब्धि हासिल कर ली है... आज आप हमारे खिलाफ जो कार्रवाई कर रहे हैं, अंततः वह दूसरों के खिलाफ भी होगी... आज सहारनपुर के लोगों के लिए काला दिन है। सहारनपुर के लोगों को काले बाजूबंद पहनकर इसका विरोध करना चाहिए...।"
वे मस्जिद को बुलडोजर से नहीं गिरा रहे हैं। वे देश के संविधान को रौंद रहे हैं। यह आदेश पूरी तरह से असंवैधानिक है। -इमरान मसूद, कांग्रेस सांसद सहारनपुर
सहारनपुर में 115 साल पुरानी मस्जिद गिराई गई
इकरा हसन हाउस अरेस्ट
मस्जिद गिराए जाने से पहले कैराना से सपा सांसद इकरा हसन ने आरोप लगाया कि उन्हें सहारनपुर जाने से रोकने के लिए उनके कैराना स्थित आवास के बाहर बड़ी संख्या में पुलिस बल तैनात किया गया। इकरा हसन के मुताबिक, वह सहारनपुर जाकर अधिकारियों से मिलना चाहती थीं और कलेक्ट्रेट मस्जिद को लेकर स्थानीय लोगों की चिंताओं को प्रशासन के सामने रखना चाहती थीं। लेकिन उन्हें घर से निकलने की अनुमति नहीं दी गई। सांसद ने सवाल उठाया कि क्या किसी निर्वाचित जनप्रतिनिधि का अपने क्षेत्र के लोगों से जुड़े मुद्दे पर अधिकारियों से मिलना अपराध हो गया है। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र में जनता अपने प्रतिनिधियों को उसकी आवाज उठाने के लिए चुनती है और किसी सांसद को अधिकारियों से मिलने से रोकना लोकतांत्रिक भावना के अनुरूप नहीं है।अखिलेश यादव का सांकेतिक ट्वीट
सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने इस मुद्दे पर सांकेतिक ट्वीट किया। उन्होंने सहारनपुर या मस्जिद का जिक्र नहीं किया। सपा सांसद यादव ने लिखा- सरकार की प्राथमिक जिम्मेदारियों में सांप्रदायिक सौहार्द बनाए रखना शामिल है। इस बीच सपा का आरोप है कि इकरा हसन को इसलिए सहारनपुर जाने से रोका गया क्योंकि वह मस्जिद मामले को लेकर अधिकारियों से बातचीत करना चाहती थीं। पार्टी ने कार्रवाई और सांसद को रोके जाने को लेकर सवाल उठाए हैं।
सरकारी पक्ष ने दावों पर क्या कहा
सरकारी पक्ष ने मस्जिद पक्ष के दस्तावेजों और जमीन के स्वामित्व के दावे पर सवाल उठाए। सरकारी वकीलों ने पुराने राजस्व रिकॉर्ड का हवाला देते हुए कहा कि संबंधित जमीन मूल रूप से सरकारी भूमि थी। सरकार की ओर से अदालत में बताया गया कि खसरा नंबर 539 की करीब 5.780 हेक्टेयर जमीन पठानपुरा क्षेत्र में स्थित है और पुराने फसली रिकॉर्ड में इसे केसर-ए-हिंद के नाम दर्ज किया गया था। रिकॉर्ड में कलेक्ट्रेट-कचहरी का उल्लेख होने की बात भी कही गई। सरकारी पक्ष के अनुसार बाद में यह भूमि भारत सरकार को ट्रांसफर हुई। सरकार ने यह भी दलील दी कि पुराने राजस्व रिकॉर्ड में संबंधित भूमि पर मस्जिद का कोई उल्लेख नहीं मिलता। इसी आधार पर सरकारी पक्ष ने मस्जिद पक्ष के स्वामित्व के दावे पर आपत्ति जताई।मामले में जिला जज सतेंद्र कुमार की अदालत में करीब डेढ़ महीने से अधिक समय तक सुनवाई चली। मस्जिद पक्ष ने 20 जुलाई 2026 को याचिका दाखिल कर सिटी मजिस्ट्रेट के आदेश को चुनौती दी थी। सुनवाई के दौरान कुल 17 तारीखों पर दोनों पक्षों ने अपने दस्तावेज और दलीलें पेश कीं। अदालत ने सुनवाई पूरी करने के बाद सिटी मजिस्ट्रेट के 16 जुलाई के आदेश को बरकरार रखा और मस्जिद पक्ष की याचिका खारिज कर दी। इसके बाद प्रशासन ने शनिवार सुबह मस्जिद को ढहा दिया।
बीएसपी प्रमुख मायावती का बयान
बसपा प्रमुख मायावती ने भी इस मुद्दे पर बयान दिया है। उन्होंने कहा- सहारनपुर की मस्जिद सहित पूरे उत्तर प्रदेश में आए दिन मस्जिदों को काफी आपाधापी में अवैध बताकर उनको ध्वस्त करने का जो सरकारी अभियान चल रहा है वह ठीक नहीं है तथा सरकार को ऐसे निगेटिव हालात से बचने के लिये इस पर तुरन्त रोक लगाकर इसके समाधान के अन्य उपाय ज़रूर करने चाहिये। वैसे भी एक संवैधानिक सेक्युलर सरकार द्वारा सभी धर्मों के मानने वालों एवं उनके धार्मिक स्थलों आदि का एक समान आदर-सम्मान व उनकी सुरक्षा करने का उत्तरदायित्व बनता है। इस्लाम मज़हब में मस्जिदें हर दिन इबादत बल्कि दिन में कई बार जमात के साथ नमाज़ पढ़ने का मुख्य व अभिन्न अंग हैं, जिसको ध्यान में रखकर व भारतीय परम्परा के अनुसार सम्मान देना देश व व्यापक जनहित में ज़रूरी है।
उन्होंने कहा- इसके साथ ही, बिना नियम-क़ानून का समुचित अनुपालन किये हुये किसी भी अभियुक्त का मकान ध्वस्त करके उसके पूरे परिवार को सामूहिक तौर पर सज़ा देकर बेघर बार कर देने की कार्रवाईयों से भी लोग काफी विचलित हैं। ऐसे में बी.एस.पी सरकार की तरह का ’क़ानून द्वारा क़ानून का राज’ का व्यवहार ज़रूरी है। इसलिए सिर्फ सरकार ही नहीं बल्कि माननीय न्यायालय भी इस ओर समुचित ध्यान दें तो यह उचित होगा। लेकिन ऐसे हालात में सभी लोग सौहार्दपूर्ण वातावरण भी ज़रूर बना कर रखें, पार्टी की यह भी अपील है।