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चुनाव के ठीक पहले क्यों उठा मुलायम की आय से अधिक संपत्ति का मामला?

सुप्रीम कोर्ट ने केंद्रीय जाँच ब्यूरो को नोटिस जारी कर कहा है कि वह आय से अधिक जायदाद के मामले में मुलायम सिंह यादव और उनके बेटों की जाँच की प्रगति की जानकारी उसे दे। सर्वोच्च अदालत ने विश्वनाथ चतुर्वेदी की याचिका पर सुनवाई करने के बाद यह नोटिस जारी किया। 
जस्टिस रंजन गोगोई और जस्टिस दीपक मिश्रा के खंडपीठ ने अब सीबीआई से कहा है कि वह बताए कि इस मामले में अब तक क्या प्रगति हुई है। 

क्या है मामला?

दरअसल विश्वनाथ चतुर्वेदी ने साल 2005 में अदालत में जनहित याचिका दायर कर माँग की थी कि मुलायम सिंह यादव, उनके बेटे अखिलेश यादव और प्रतीक यादव और बहू डिंपल यादव की ज्ञात आय से बहुत अधिक जायदाद होने के मामले की जाँच करने का आदेश सीबीआई को दे। याचिका में यह आरोप लगाया गया था कि मुलायम सिंह और अखिलेश यादव ने अपने पद का दुरुपयोग कर यह पैसा कमाया है। सुप्रीम कोर्ट ने साल 2007 में सीबीआई को आदेश दिया था कि वह इन मामलों की जाँच करे। सर्वोच्च अदालत ने साल 2012 में मुलायम सिंह की पुनर्विचार याचिका खारिज कर दी। विश्वनाथ चतुर्वेदी ने अपनी हालिया याचिका में कहा है कि लंबा समय बीत गया, उसके बाद संदिग्धों की आय और जायदाद के बीच का अंतर पहले से बहुत ज़्यादा हो गया, लेकिन उनके ख़िलाफ़ कोई कार्रवाई नहीं की गई। 
दिलचस्प है कि यह नोटिस ठीक आम चुनाव से पहले जारी किया गया है। यह भी ध्यान में रख जाना चाहिए कि ये सभी लोग यानी मुलायम सिंह, अखिलेश, प्रतीक और डिंपल यादव इस बार चुनाव लड़ रहे हैं। मुलायम सिंह मैनपुरी, अखिलेश आज़मगढ़ और कन्नौज डिंपल से लड़ रही हैं। 
ग़ौरतलब है कि सबसे ज़्यादा सांसद देने वाले राज्य उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी ने मिल कर गठबंधन बनाया है और यह गठबंधन ही सत्तारूढ़ दल भारतीय जनता पार्टी को राज्य में लोकसभा चुनावों में चुनौती दे रहा है।
हालाँकि गठबंधन में मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस को शामिल नहीं किया गया है और बीएसपी की नेता मायावती ने साफ़ कह दिया है कि कांग्रेस से उनका कोई  मतलब नहीं है, पर गठबंधन बीजेपी की जीत की राह में बड़ा रोड़ा बनने जा रहा है, इससे इनकार नहीं किया जा सकता है। कुछ दिन पहले सीबीआई ने मायावती के ताज कॉरीडोर मामले को फिर से उठाया और कथित बालू खनन घोटाला मामले में अखिलेश की भी पड़ताल करने की बात कही। 
लेकिन, सवाल यह उठता है कि ये तमाम मामले ठीक चुनाव के पहले ही क्यों उठ रहे हैं। जो मामला 2005 से चल रहा है, उस पर अब तक क्यों कुछ नहीं हुआ। क्यों याचिकाकर्ता की नींद चुनाव के ऐन पहले ही क्यों खुली? ये तमाम सवाल  लाज़िमी हैं। 
जिस दिन उत्तर प्रदेश में अखिलेश यादव की समाजवादी पार्टी, मायावती की बहुजन समाज पार्टी, अजित सिंह की राष्ट्रीय लोकदल और निषाद पार्टी के बीच लोकसभा की सीटों का बँटवारा हुआ, उसी दिन सीबीआई ने यह एलान कर दिया किया कि बालू खनन घोटाले में अखिलेश यादव से भी पूछताछ हो सकती है।
इसके साथ ही उत्तर प्रदेश और दिल्ली में सीबीआई की टीम ने 12 ठिकानों पर छापे मारे। सीबीआई ने ये छापे इलाहाबाद हाई कोर्ट के निर्देश पर मारे। दिलचस्प बात यह है जुलाई 2016 में पूर्व आईएएस अधिकारी चंद्रकला के ख़िलाफ़ अदालत ने जाँच के आदेश दिए थे। बी. चंद्रकला के ठिकानों पर भी छापे मारे गए। 
इसके कुछ दिन बाद ही प्रवर्तन निदेशालय ने मायावती सरकार के दौरान हुए कथित स्मारक निर्माण घोटाले में सात जगहों पर छापेमारी की। ईडी ने उत्तर प्रदेश राजकीय निर्माण निगम और निजी संस्थानों के इंजीनियरों के घरों पर भी छापे मारे। 2007 से लेकर 2012 के बीच मायावती सरकार ने लखनऊ और नोएडा में कई पार्क और स्मारकों का निर्माण कराया था। अधिकारियों के अनुसार, ईडी ने इस संबंध में आपराधिक मुक़दमा भी दर्ज़ किया है। उत्तर प्रदेश सरकार के विजिलेंस विभाग ने 2014 में इस मामले में शिकायत दर्ज़ कराई थी। तब कहा गया था कि पार्क और स्मारकों के निर्माण में लगभग 1400 करोड़ का घोटाला हुआ था। 
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निशाने पर मायावती भी

सीबीआई ने बसपा सुप्रीमो मायावती के ख़िलाफ़ भी आय से अधिक संपत्ति रखने के मामले में जाँच की है। लंबी जाँच के बाद मामला बंद कर दिया गया। या तो उसे पर्याप्त पुख़्ता सबूत नहीं मिले या उस समय की राजनीतिक स्थिति अलग थी, सत्ता समीकरण अलग था, यह कहा जा सकता है। लेकिन सीबीआई ने एक दूसरे मामले में मायावती की जाँच शुरू कर दी है। यह मामला उनके शासन काल के दौरान 2010-11 में बेची गई 21 चीनी मिलों से जुड़ा है। सीबीआई ने 2018 में इसकी जाँच शुरू की। इन चीनी मिलों को बेचे जाने से प्रदेश सरकार को 1,179 करोड़ रुपए का घाटा हुआ, ऐसा बताया जा रहा है। मायावती पर आरोप लग रहा है कि उन्होंने किसी को फ़ायदा पहुँचाने के लिए जान बूझ कर इन चीनी मिलों को कम कीमतों में बेच दिया। 
इसी तरह बीते दिनों ही मायावती के पूर्व निजी सचिव नेतराम के यहाँ भी सीबीआई ने छापा मारा। वह 2007 से 2012 तक जब मायावती मुख्यमंत्री थीं, नेतराम उनके सचिव हुआ करते थे। उन पर कई फ़र्ज़ी कंपनियाँ चलाने के आरोप हैं। उनके रिश्तेदारों के घरों पर भी सीबीआई ने छापे मारे हैं। 
सवाल यह उठता है कि सीबीआई की सक्रियता चुनाव के पहले क्यों बढ़ जाती है। सवाल यह भी है कि यह सक्रियता सत्तारूढ़ दल के विरोधियों के ख़िलाफ़ ही क्यों होती है। इन सवालों का जवाब सीबीआई को ही देना चाहिए। सीबीआई बीते कुछ दिन पहले ख़ुद विवादों में थी जबकि उसका अंदरूनी कलह खुल कर सामने आ गई है और उसके शीर्ष के दो अफ़सरों ने एक दूसरे पर भ्रष्टाचार के आरोप जड़ दिए थे। ख़ुद सीबीआई की विश्वसनीयता पर सवाल उठ रहे हैं। ऐसे में सीबीआई की जाँच के राजनीतिक निहितार्थ से इनकार नहीं किया जा सकता है। इस मामले में यह भी यह कहा जा सकता है। 
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