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यूपी में 'तीन बनाम तैंतीस' की लड़ाई जीत गई बीजेपी!

हार अनाथ होती है और जीत का हर कोई माई-बाप होता है।

उत्तर प्रदेश में सपा-बसपा-रालोद गठबंधन की क़रारी हार और प्रियंका जैसे तुरुप के पत्ते को सामने लाने के बाद कांग्रेस का अपना गढ़ अमेठी हार जाने के बाद तमाम कारण गिनाए जा सकते हैं। कागज पर ही सही पर सपा-बसपा-रालोद का गठबंधन अपने आप में ख़ासा मारक था। कांग्रेस महासचिव बनायी गयी प्रियंका गाँधी ने कह ही दिया था कि उनके प्रत्याशी कई जगह वोटकटवा बन गठबंधन की मदद कर रहे थे। तमाम दावों के बाद ढेरों की तादाद में पुराने प्रत्याशी उतार कर बीजेपी ने जनता की नाराज़गी को हवा दी थी। कुल मिलाकर यूपी में ज़मीन पर बीजेपी उतनी मज़बूत तो नहीं ही दिख रही थी जितनी नतीजों में नज़र आयी। कई जगहों पर तो गठबंधन का यादव-मुसलिम-दलित समीकरण इतना मज़बूत था कि कोई वजह नहीं बनती है कि वह हार जाता। मगर नतीजे चौंकाने वाले निकले और तमाम ऐसी जगहों पर बीजेपी के प्रत्याशी आसानी से निकले जहाँ उम्मीद नहीं थी। कड़े मुक़ाबले वाली कम से कम आधा दर्जन सीटों पर बेहद कम अंतर से ही सही पर बीजेपी प्रत्याशियों ने गठबंधन को मात दी।

मैनपुरी, रायबरेली जैसी सीटों पर विपक्ष की जीत उतनी बड़ी नहीं रही जितने की उम्मीद की जा रही थी। अमेठी में अब तक की सबसे ज़्यादा मेहनत करने के बाद भी कांग्रेस के हाथ हार ही लगी तो कन्नौज और बदायूँ जैसी सपा की अपराजेय सीटें भी हाथ से निकल गयी।

'तीन बनाम तैंतीस' का आँकड़ा चला 

सपा-बसपा-रालोद जहाँ उत्तर प्रदेश में यादव, जाटव और मुसलिम बिरादरी के वोटों को सहेजने और ‘एक भी वोट बँटने न पाए, एक भी वोट घटने न पाए’ जैसे नारे देकर आश्वस्त होकर बैठ गया वहीं बीजेपी ने 33 अन्य पिछड़ी व दलित जातियों को बटोरने का काम बख़ूबी किया। लोकसभा चुनावों में कांग्रेस के लिए खपने वाले एक पूर्व वामपंथी ने बताया कि पिछड़ों में कई जातियों जैसे कुर्मी, केवट में यादवों को लेकर ख़ासी कुंठा नज़र आयी तो दलितों में जाटवों के ख़िलाफ़ पासी, खटीक, वाल्मीकि जाते दिखे। इन जातियों का मानना है कि पिछड़ों की सारी मलाई अकेले यादव और दलितों के नाम पर सारा लाभ जाटवों के हिस्से चला जाता है। बीजेपी ने इसे ख़ूब भुनाया और तीन के ख़िलाफ़ तैंतीस के आँकड़े पर जमकर काम किया। नतीजा सामने है कि ग़ैर-यादव पिछड़ों, ग़ैर-जाटव दलितों ने बीजेपी को थोक के भाव वोट दिए और जीत सुनिश्चित की।

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लाभार्थियों के डाटा बैंक का इस्तेमाल

उज्ज्वला योजना के तहत बँटे गैस कनेक्शनों, प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत दिए गए घरों, घर-घर पहुँचायी गयी बिजली से लेकर गाँव-गाँव बनाए गए शौचालयों के लाभार्थियों के डाटा बैंक का बीजेपी ने इन चुनावों में बख़ूबी इस्तेमाल किया। बीजेपी के बूथ लेवल कार्यकर्ताओं को इन लाभार्थियों के फ़ोन नंबर सहित सूची उपलब्ध करायी गयी जिनसे संपर्क साधा गया और लाभ के बारे में याद दिलाया गया। लाभार्थियों में उन जातियों की तादाद ख़ासी थी जो परंपरागत रूप से बीजेपी के वोटर नहीं थे पर उन्हें भी साधा गया। जिन्हें इन योजनाओं का लाभ नहीं मिला था उनका गिला-शिकवा दूर करते हुए जल्दी शामिल कराने का आश्वासन भी दिया गया। कुल मिलाकर गाँव-गाँव में बीजेपी ने लाभार्थियों का एक अलग वोट बैंक तैयार कर डाला जिसे मीडिया ने साइलेंट वोट बैंक का नाम दिया। इस वोट बैंक ने बिरादरी की लाइन से अलग जाकर मुखर न होते हुए भी बीजेपी को वोट दिया।

राष्ट्रवाद के साथ हिन्दुत्व का तड़का

चुनाव में विकास, काम को पीछे कर बीजेपी ने पूरे उत्तर प्रदेश में राष्ट्रवाद की ही अलख जगायी और इसकी कोई काट विरोधियों के पास नहीं थी। आक्रामक प्रचार अभियान, सोशल मीडिया ख़ासकर वाट्सएप के ज़रिए बीजेपी ने गाँव-गाँव तक यह संदेश पहुँचा दिया कि पाकिस्तान, आतंकवाद के ख़िलाफ़ वह ही लड़ सकती है, जबकि बाक़ी दलों के पास इससे निपटने की कोई रणनीति नहीं है। अगड़ों ने तो मानो इस पूरे चुनाव को जंग मान बीजेपी का साथ दिया और सजातीय प्रत्याशी होने पर भी कुछ ही जगहों पर वोट बँटने दिया। अगड़ों ने न केवल ख़ुद के वोट सहेजे बल्कि एक कार्यकर्ता की तरह बीजेपी के पक्ष में काम किया। तीन बनाम तैंतीस की लड़ाई लड़ने में अगड़ों की भूमिका भी प्रमुख रही जिसने ग़ैर-यादव व ग़ैर-जाटव जातियों को बीजेपी के पाले में लाने में मदद की। इन सबके साथ बीजेपी, संघ का हिन्दुत्व के प्रचार-प्रसार का अभियान चलता रहा। केंद्र व राज्य दोनों जगह सरकारें होने के चलते इसे सतह पर तो नहीं देखा गया पर अंदरखाने यह बख़ूबी चलता रहा। योगी के ‘अली बजरंग बली’ वाले बयान हो या सहारनपुर में आतंकी अज़हर मसूद के दामाद वाला कथन हो, इन सबने आग में घी का काम किया।

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यादवों तक को बाँट डाला

सपा-बसपा गठबंधन बनने के बाद बीजेपी ने प्रचार किया कि दोनों पार्टियों के वोट एक-दूसरे को ट्रांसफ़र नहीं हो रहे हैं और मुसलमान वोट बँट रहा है। पश्चिम में हुए पहले दो चरणों के चुनाव के बाद ऐसा न होते देख उसने यादव वोटों में बँटवारे पर काम करना शुरू किया। नतीजे बताते हैं कि उसे इसमें सफलता भी मिली। फिरोजाबाद, कन्नौज और बदायूँ में हार या फिर मैनपुरी में मुलायम की कम अंतर से हुई जीत से साफ़ है कि सपा अपने यादव वोटों को सहेजने में भी पूरी तरह से कामयाब नहीं हो पायी। आजमगढ़ में अखिलेश के सामने भोजपुरी गायक निरहुआ को उतार यादव वोट बाँट दिए तो संतकबीरनगर में कांग्रेस के भालचंद्र यादव को मज़बूत दिखा वहाँ भी सपा के वोटों में सेंध लगायी। कुशीनगर में बालेश्वर यादव का सपा से टिकट काट नथुनी कुशवाहा को देने के मामले को बीजेपी ने अपने पक्ष में कर लिया। यहाँ यादव वोटों का बड़ा हिस्सा बीजेपी के पक्ष में चला गया। संतकबीरनगर में कांग्रेस के भालचंद्र यादव ने एक लाख से ज़्यादा वोट खींच कर बीजेपी के प्रवीण निषाद को जीत दिला दी।

नतीजों को देखने से साफ़ पता चलता है कि रामपुर, सहारनपुर, संभल, मुरादाबाद, अमरोहा, नगीना, गाजीपुर, श्रावस्ती जैसे अल्पसंख्यक व दलित बहुल इलाक़ों में गठबंधन आसानी से जीता जबकि यादव बहुल इलाक़ों में नहीं।

साम-दाम-दंड-भेद का बख़ूबी इस्तेमाल

सुल्तानपुर में जहाँ तमाम मशक्कत के बाद मेनका बमुश्किल कुछ हज़ार वोटों से जीतीं हों या चंदौली जहाँ प्रदेश बीजेपी अध्यक्ष महेंद्र नाथ पांडेय कड़े संघर्ष में फँसे थे। बीजेपी ने इन सीटों पर और इन जैसी तमाम जगहों पर शासन-प्रशासन की हनक का जमकर इस्तेमाल किया। सुल्तानपुर में पुलिस की मदद से भारी दबाव बनाया गया तो चंदौली में माफिया विनीत सिंह सहित कई दबंगों को अपने पक्ष में शामिल करा लिया गया। अमेठी में राजेश मसाला के मालिक के घर को केंद्र बना गाँवों के प्रधान साधे गए तो दर्जनों सीटों पर ज़िला पंचायत सदस्यों से लेकर बीडीसी, ग्राम प्रधानों पर दबाव डलवाया गया। घोसी में गठबंधन प्रत्याशी को मतदान के पहले फ़रार होना पड़ा तो कई जगहों पर पुराने मुक़दमे खुलवा दिए गए। कुल मिलाकर बीजेपी ने चुनाव को अपने पक्ष में लाने के लिए हर हथकंडे अपनाए।

आख़िर मोहब्बत और जंग में सब कुछ जायज़ जो होता है।

कुमार तथागत
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