उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार में सब कुछ ठीक चल रहा है—ऐसा दावा करने वाली सियासी तस्वीर को पिछले 48 घंटों में दो मंत्रियों के बयानों ने चुनौती दी है। पहले कैबिनेट मंत्री और निषाद पार्टी के अध्यक्ष संजय निषाद ने अपनी ही सरकार के खिलाफ गोंडा के एक पार्टी कार्यकर्ता की मौत को लेकर धरना दिया और पुलिस-प्रशासन पर सवाल उठाए। अब सीतापुर से बीजेपी विधायक और राज्य मंत्री राकेश राठौर ‘गुरु’ पुलिस थाने पहुंचकर भावुक हो गए और अपनी ही सरकार की कार्यशैली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए।
मामला सीतापुर में सड़क चौड़ीकरण और अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई से जुड़ा है। मंदिर के एक चबूतरे को हटाए जाने के विरोध के दौरान विवाद हुआ और पुलिस ने बीजेपी कार्यकर्ता जितेंद्र मिश्रा तथा उनके बेटे शुभम को हिरासत में ले लिया। इसके बाद राज्य मंत्री राकेश राठौर देर रात समर्थकों के साथ कोतवाली पहुंच गए। वहां काफी देर तक हंगामा और नारेबाजी हुई।

‘अगर कार्यकर्ता सुरक्षित नहीं रहेगा तो लड़ने का क्या फायदा?’

कोतवाली में राकेश राठौर काफी भावुक दिखाई दिए। मीडिया के सामने उन्होंने कहा कि वह अपने राजनीतिक जीवन में पहली बार थाने आए हैं। उन्होंने कहा कि आज वह विधायक या मंत्री हैं तो मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के समर्थन और आशीर्वाद की वजह से हैं। लेकिन इसके बाद उन्होंने जो सवाल उठाया, वह सीधे सरकार और पुलिस-प्रशासन की कार्यशैली पर था।
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‘32 मुकदमों वाले व्यक्ति को कुर्सी, कार्यकर्ता को हवालात?’

मंत्री ने मीडिया से बातचीत में एक व्यक्ति का जिक्र करते हुए गंभीर आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि एक ‘माफिया’ व्यक्ति पर करीब 32 मुकदमे हैं, फिर भी उसे सत्ता में प्रभावशाली स्थिति दी गई, जबकि बीजेपी के कार्यकर्ता को हिरासत में रखा गया। राठौर ने सवाल उठाया कि अगर किसी व्यक्ति पर इतने मामले दर्ज हैं तो उसके खिलाफ कार्रवाई की बजाय उसे सत्ता का संरक्षण क्यों मिलता है।
उन्होंने कथित आर्थिक लेनदेन की भी जांच की मांग करते हुए कहा कि रजिस्ट्री कार्यालय के रिकॉर्ड देखे जाएं और पता लगाया जाए कि इतनी बड़ी रकम कहां से आई और कहां गई। इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि अभी सामने नहीं आई है, इसलिए इन्हें मंत्री के आरोप के रूप में ही देखा जाना चाहिए।

‘कार्यकर्ता ने किसी को हटने को कहा होगा, फिर भी…’

राकेश राठौर ने बीजेपी कार्यकर्ता की ओर से माफी भी मांगी। उन्होंने कहा कि संभव है कि कार्यकर्ता ने किसी व्यक्ति से सिर्फ रास्ते से हटने के लिए कहा हो और उसके व्यवहार में गलती हुई हो। अगर उसने गलती की है तो उसे कानूनी परिणाम भुगतने चाहिए। लेकिन मंत्री का सवाल था कि किसी कार्यकर्ता की गलती को आधार बनाकर उसे ऐसी स्थिति में क्यों डाला जाए, जबकि उनके अनुसार आपराधिक मामलों वाले प्रभावशाली लोगों को सत्ता में जगह मिलती है।

मंदिर का चबूतरा तोड़ने से शुरू हुआ विवाद

एबीपी लाइव के मुताबिक, सीतापुर के बाल्दा कॉलोनी इलाके में सड़क चौड़ीकरण का काम नगर पालिका की ओर से कराया जा रहा था। इसी दौरान अतिक्रमण की कार्रवाई में रम्पा टॉकीज के सामने स्थित मंदिर के चबूतरे को हटाया गया। बीजेपी कार्यकर्ता जितेंद्र मिश्रा और उनके बेटे शुभम ने इसका विरोध किया। विरोध के दौरान दोनों पक्षों में झड़प हुई। इसी दौरान एक पत्रकार द्वारा घटना का वीडियो बनाए जाने को लेकर भी विवाद हुआ। पत्रकार की शिकायत के बाद पुलिस ने पिता-पुत्र को हिरासत में लिया।
प्रशासन की ओर से यह कहा गया कि चबूतरा अतिक्रमण की सीमा में था और सरकारी कार्य में बाधा डालने के आरोप में दोनों को हिरासत में लिया गया। यानी पुलिस-प्रशासन और मंत्री पक्ष की घटना को लेकर अलग-अलग व्याख्या सामने आ रही है।

मंत्री के पहुंचने के बाद दोनों कार्यकर्ता रिहा

राकेश राठौर का आरोप था कि उन्होंने पहले कोतवाल और फिर वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों से बात की थी। उन्हें कार्यकर्ताओं को छोड़ने का आश्वासन दिया गया, लेकिन कई घंटे बाद भी रिहाई नहीं हुई। इसके बाद मंत्री अपने समर्थकों के साथ पैदल कोतवाली पहुंच गए। वहां समर्थकों की भीड़ जुट गई और पुलिस-प्रशासन के खिलाफ नारेबाजी हुई। अंततः दोनों हिरासत में लिए गए कार्यकर्ताओं को छोड़ दिया गया।

संजय निषाद के बाद राकेश राठौरः क्या बीजेपी के भीतर बेचैनी बढ़ रही है?

राकेश राठौर का मामला इसलिए ज्यादा महत्वपूर्ण हो जाता है क्योंकि यह घटना कैबिनेट मंत्री संजय निषाद के अपनी ही सरकार के खिलाफ खुले विरोध के तुरंत बाद सामने आई है। गोंडा में निषाद पार्टी के कार्यकर्ता और बर्तन कारोबारी विनोद साहनी की मौत के बाद संजय निषाद KGMU में धरने पर बैठ गए थे। उन्होंने पुलिस अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई, आरोपियों की गिरफ्तारी और पीड़ित परिवार के लिए मदद की मांग की। इसके बाद वह शुक्रवार को गोंडा पहुंचकर भी प्रदर्शन में शामिल हुए।
इस मामले में पुलिस ने आरोपियों को गिरफ्तार किया और संबंधित पुलिसकर्मियों के खिलाफ भी कार्रवाई हुई। रिपोर्टों के मुताबिक तीन आरोपियों को गिरफ्तार किया गया है और पुलिसकर्मियों को निलंबित किया गया। संजय निषाद के धरने में विपक्षी नेताओं की मौजूदगी ने भी इसे राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण बना दिया। समाजवादी पार्टी के नेताओं ने भी सरकार की कानून-व्यवस्था पर सवाल उठाए। अब सीतापुर में बीजेपी के अपने मंत्री का थाने पहुंचना और यह कहना कि ‘अगर कार्यकर्ता नहीं रहेगा तो लड़ने का क्या फायदा’, बीजेपी संगठन और सरकार के बीच जमीनी स्तर पर पैदा हो रही शिकायतों की ओर संकेत करता है।

2027 से पहले संदेश क्या है?

उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव 2027 में होने हैं। ऐसे समय में सत्तारूढ़ बीजेपी के मंत्रियों और विधायकों का अपनी ही सरकार के अधिकारियों के खिलाफ सार्वजनिक रूप से आवाज उठाना राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण है। इन दोनों घटनाओं को एक ही रंग में देखना भी उचित नहीं होगा। संजय निषाद का मामला एक पार्टी कार्यकर्ता की मौत और पुलिस की कथित लापरवाही से जुड़ा है, जबकि राकेश राठौर का मामला अतिक्रमण कार्रवाई, स्थानीय विवाद और बीजेपी कार्यकर्ताओं की हिरासत से जुड़ा है। लेकिन दोनों मामलों में एक समानता जरूर दिखाई देती है- सरकार के भीतर के नेता यह संदेश दे रहे हैं कि स्थानीय प्रशासन और पुलिस तक उनकी बात भी आसानी से नहीं पहुंच रही।
राकेश राठौर का भावुक होना और संजय निषाद का धरने पर बैठना विपक्ष के लिए राजनीतिक हथियार बन सकता है। बीजेपी के लिए चुनौती यह होगी कि वह इन घटनाओं को महज स्थानीय विवाद मानकर आगे बढ़ती है या फिर मंत्रियों और कार्यकर्ताओं की शिकायतों को प्रशासनिक स्तर पर गंभीरता से लेकर उनका समाधान करती है। फिलहाल सीतापुर की तस्वीर में सबसे बड़ा सवाल यही है- जब अपनी ही सरकार का मंत्री थाने में खड़े होकर पूछे कि ‘अगर पार्टी कार्यकर्ता सुरक्षित नहीं है तो संघर्ष का क्या फायदा’, तो सवाल सिर्फ एक कार्यकर्ता की गिरफ्तारी का रह जाता है या फिर यह सरकार और संगठन के बीच बढ़ती दूरी का संकेत भी है?