उत्तर प्रदेश में विशेष संक्षिप्त पुनरीक्षण (SIR) के बाद जारी हुई अंतिम मतदाता सूची को लेकर भारी गड़बड़ी की शिकायतें सामने आ रही हैं। एक तरफ जहां लाखों मतदाताओं के नाम कटने से विपक्षी दल हमलावर हैं, वहीं दूसरी तरफ सूची में दर्ज अजीबोगरीब गलतियों ने चुनाव आयोग के सिस्टम पर सवालिया निशान लगा दिए हैं।

अजीबोगरीब गलतियां: एक नाम पांच जगह, पते भी बदले

ग्राउंड रिपोर्टिंग और शिकायतों के आधार पर मतदाता सूची में ऐसी खामियां मिली हैं जो हैरान करने वाली हैं:
  • एक मतदाता, पांच घर: बांदा (अलीगंज ईस्ट) की रानी सिंह (33) का नाम लिस्ट में 5 बार दर्ज है। रिकॉर्ड के अनुसार, वे एक ही इलाके के पांच अलग-अलग घरों में रह रही हैं।
  • पहचान की अदला-बदली: अकबरपुर रानिया की अंजना दुबे के घर का पता आधिकारिक तौर पर शेखू खान के नाम से दर्ज कर दिया गया है।
  • साजिश का आरोप: सपा अल्पसंख्यक प्रकोष्ठ के सदस्य शेखू खान का कहना है, "मेरा नाम नहीं काट पाए तो पता बदल दिया, ताकि वोटिंग के समय विवाद हो और मुझे अधिकार से वंचित कर दिया जाए।"
बांदा में बाबेरू के सपा विधायक विश्वंभर यादव का कहना है कि "मेरी सीट पर 32,299 वोटर्स हटाए गए हैं। 2022 में मैंने भाजपा को 7,300 वोटों से हराया था। यह साफ तौर पर हमारी सीट छीनने की कोशिश है।" यादव ने कहा कि अब हमारे कार्यकर्ता उन मतदाताओं से संपर्क कर रहे हैं, जिनके पास सारे दस्तावेज हैं और फिर भी नाम काट दिए गए हैं। इनमें दलित और मुस्लिम मतदाताओं को टारगेट किया गया है। उनका कहना है कि यह साफ-साफ पश्चिम बंगाल का ही पैटर्न है।  

अखिलेश यादव के गंभीर आरोप

समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव ने इस पूरी प्रक्रिया को 'सत्तारूढ़ दल की साजिश' करार दिया है। उनके मुख्य आरोपः 
  • टारगेट पर कौन: केवल दलित, मुस्लिम और ओबीसी (PDA) मतदाताओं के नाम चुन-चुनकर हटाए गए हैं।
  • कन्नौज का मुद्दा: कन्नौज में बड़ी संख्या में सपा समर्थकों के नाम काटे गए, शिकायत के बाद भी सुधार नहीं हुआ।
  • संस्थागत विफलता: चुनाव आयोग ने सूची को साफ करने के बजाय उसे 'अस्त-व्यस्त' (Chaotic) कर दिया है।
राज्य में एसआईआर प्रक्रिया शुरू होने के बाद 27 अक्टूबर, 2025 तक की मतदाता सूची की तुलना में अब लखनऊ और गाजियाबाद में क्रमशः 22.89 प्रतिशत (9.14 लाख) और 20.24 प्रतिशत (5.75 लाख) नाम हटाए गए। लखनऊ जिले में दो लोकसभा क्षेत्र हैं - लखनऊ और मोहनलाल गंज। लखनऊ भाजपा का गढ़ है, जिसका प्रतिनिधित्व केंद्रीय मंत्री राजनाथ सिंह करते हैं, जबकि मोहनलाल गंज सीट राज्य की प्रमुख विपक्षी पार्टी समाजवादी पार्टी (एसपी) ने 2024 के संसदीय चुनावों में जीती थी। लेकिन लखनऊ और गाजियाबाद के अलावा यूपी के 8 और जिले भी नाम काटे जाने से प्रभावित हुए हैं। नीचे ग्राफ देखिएः

नाम डिलीट किए जाने के मामले में 10 जिले ज्यादा प्रभावित

समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष और पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने उत्तर प्रदेश विधानसभा के मुख्य कार्यकारी अधिकारी को ज्ञापन लिखकर ऑनलाइन और ऑफलाइन दोनों तरीकों से अपील दाखिल करने के लिए मानक संचालन प्रक्रिया (एसओपी) जारी करने की मांग की है। अंतिम मतदाता सूची में त्रुटियों को बताते हुए ज्ञापन में इलाहाबाद दक्षिण विधानसभा क्षेत्र के मतदान केंद्र संख्या 389 का उदाहरण दिया गया है, जहां मतदाता शालिनी सिंह के पिता का नाम बंगाली में छपा है। "इसी तरह, गाजीपुर विधानसभा क्षेत्र के मतदान केंद्र संख्या 102 पर मतदाता सत्येंद्र यादव (हरिहर यादव के पुत्र) का नाम क्रमांक 1047 और 1056 पर दर्ज है।" अखिलेश ने अपने ज्ञापन में अंतिम मतदाता सूची में दोहरी प्रविष्टियों की ओर इशारा किया है।
यूपी बीजेपी के प्रवक्ता ने कहा कि “विपक्ष द्वारा उठाए जा रहे सवालों से यह स्पष्ट है कि अखिलेश यादव को उत्तर प्रदेश के वैध मतदाताओं पर भरोसा नहीं है। जब भी निष्पक्ष और निर्भीक चुनाव कराए जाते हैं, समाजवादी पार्टी को नुकसान होने की संभावना रहती है, इसीलिए वे चिंतित हैं।” हालांकि यूपी एसआईआर के दौरान ही पारदर्शिता को लेकर चिंताएं उठाई गईं थीं। कई बूथ स्तर के अधिकारियों (बीएलओ) और बूथ स्तर के एजेंटों (बीएलए) के वीडियो सामने आए, जिनमें आरोप लगाया गया था कि सिद्धार्थनगर और फतेहपुर जैसे जिलों में बड़ी संख्या में पहले से भरे हुए फॉर्म 7 डिलीट करने के लिए सौंपे गए थे। मुरादाबाद और सीतापुर जैसे जिलों में कथित तौर पर अत्यधिक कार्य दबाव में काम कर रहे बीएलओ द्वारा आत्महत्या की खबरों के बाद यह प्रक्रिया विवादों में घिर गई।

चुनाव आयोग की सफाई

विपक्ष के भारी हंगामे के बीच चुनाव आयोग ने सफाई पेश की है। उसका कहना है कि सूची बूथ स्तर (BLO) पर एक सप्ताह तक उपलब्ध है। मानवीय त्रुटियों को सुधारने के लिए अभी भी कानूनी रास्ते खुले हैं। यदि आपका नाम कट गया है या विवरण गलत है, तो आप निम्न कदम उठा सकते हैं:
  • प्रथम अपील: 25 अप्रैल तक जिला निर्वाचन अधिकारी (DEO) के पास आपत्ति दर्ज कराएं।
  • द्वितीय अपील: DEO के फैसले के 30 दिनों के भीतर मुख्य निर्वाचन अधिकारी (CEO) के पास अपील करें।
बागपत, अलीगढ़ से लेकर प्रयागराज तक शिकायतों का अंबार लगा है। क्या यह महज प्रशासनिक लापरवाही है या चुनावों से पहले 'वोट बैंक' को प्रभावित करने का कोई बड़ा मास्टरप्लान? जनता की निगाहें अब चुनाव आयोग के अगले कदम पर टिकी हैं।