यूपी में चुनाव आयोग की SIR ड्राफ्ट वोटर लिस्ट में 12.6 करोड़ नाम जबकि राज्य चुनाव आयोग की सूची में 16.1 करोड़ नाम हैं। यह बड़ा अंतर क्यों है?
एसआईआर प्रक्रिया। (प्रतीकात्मक तस्वीर)
यूपी में चुनाव आयोग के ही मतदाताओं की संख्या के दो अलग-अलग आँकड़े एसआईआर प्रक्रिया को उधेड़ कर रख रहे हैं। एसआईआर की मतदाता ड्राफ्ट सूची में 12.6 करोड़ मतदाता बताए गए हैं, जबकि कुछ महीने पहले ही यूपी में पंचायत चुनाव के लिए तैयार सूची को देखा जाए तो कुल 16.1 करोड़ मतदाता हो जाते हैं। उत्तर प्रदेश में कुल व्यस्क लोगों की आबादी भी क़रीब 16 करोड़ ही अनुमानित है। तो क्या एसआईआर की ड्राफ्ट सूची से क़रीब 3.5 करोड़ वैध मतदाताओं के नाम कट रहे हैं? आख़िर यह कैसे हो रहा है?
ईसीआई की एसआईआर और पंचायत चुनाव के लिए राज्य चुनाव आयोग की ये दोनों सूचियाँ क़रीब-क़रीब एक ही समय पर वोटरों की गिनती करती हैं, लेकिन नंबरों में इतना बड़ा फर्क देखकर सवाल उठ रहे हैं। चुनावी विश्लेषक और स्वराज इंडिया के प्रमुख योगेंद्र यादव ने भी इस पर सवाल उठाया है। उन्होंने इस अंतर को 'प्राकृतिक प्रयोग' बताया है। उन्होंने सोशल मीडिया और द इंडियन एक्सप्रेस में लिखे लेख में कहा है कि ये फर्क एसआईआर प्रक्रिया की खामी को साफ़ दिखाता है।
क्या हैं ये दो अलग-अलग आँकड़े?
ईसीआई की एसआईआर ड्राफ्ट सूची 6 जनवरी 2026 को जारी की गई। इस सूची के जारी होने से पहले ईसीआई के अनुसार पहले 15.44 करोड़ मतदाता थे। लेकिन एसआईआर की सूची में अब सिर्फ 12.55 करोड़ बचे हैं। यानी 2.89 करोड़ नाम हटा दिए गए।
राज्य चुनाव आयोग यानी SEC-UP की पंचायत और लोकल बॉडी चुनाव वाली सूची दिसंबर 2025 में प्रकाशित हुई थी। इसमें ग्रामीण क्षेत्र में 12.7 करोड़ मतदाता थे। पंचायत चुनाव ग्रामीण क्षेत्रों में होते हैं इसलिए यह आँकड़ा ग्रामीण क्षेत्रों का है। SEC-UP 2023 के अनुसार शहरी क्षेत्रों में 3.4 करोड़ मतदाता थे। यानी ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों के मतदाताओं को जोड़ दें तो राज्य चुनाव आयोग के अनुसार यूपी में कुल 16.1 करोड़ मतदाता हैं।योगेंद्र यादव ने एक्स पर यही लिखा है। उन्होंने लिखा है कि 'हमारे पास दो अलग-अलग तरीके हैं जो हमें मतदाताओं के लिए दो बहुत अलग-अलग आँकड़े देते हैं। एसआईआर के अनुसार यह 12.6 करोड़ है और बिना एसआईआर के यह 16.1 करोड़ है, जो राज्य की अनुमानित वयस्क आबादी के बिल्कुल बराबर है।'
यूपी एसआईआर पर योगेंद्र यादव
यादव ने राहुल शास्त्री के साथ मिलकर द इंडियन एक्सप्रेस में एक हफ़्ते पहले एक लेख में भी यही लिखा है। वह कहते हैं कि अंतर सिर्फ इतना है कि पहले गणना फॉर्म नहीं था और नागरिकता के दस्तावेज नहीं थे। उन्होंने कहा, "दो तरीके, दो आंकड़े, लेकिन सच्चाई साफ है। ये मतदाता सूची की 'सफाई' नहीं, बल्कि लाखों लोगों को वोटिंग अधिकार से वंचित करने वाला क़दम है।"
एसआईआर प्रक्रिया क्या है और क्यों विवाद?
एसआईआर एक विशेष गहन पुनरीक्षण है, जिसमें घर-घर जाकर फॉर्म भरवाए गए और पुराने रिकॉर्ड से लिंक करने की जरूरत पड़ी। कई लोगों के फॉर्म नहीं मिले या दस्तावेज नहीं जमा हुए, इसलिए नाम कट गए। चुनाव आयोग का कहना है कि मृत, शिफ्टेड या डुप्लीकेट नाम हटाए गए हैं। इनमें 46 लाख मृत, 2.17 करोड़ शिफ्टेड और 25 लाख डुप्लीकेट नाम शामिल हैं।उत्तर प्रदेश से और ख़बरें
विपक्षी दल क्यों कर रहे हैं विरोध?
कांग्रेस, समाजवादी पार्टी जैसे विपक्षी दलों ने एसआईआर की पूरी प्रक्रिया का विरोध किया है। विपक्ष का आरोप है कि लाखों-करोड़ों वैध मतदाताओं के नाम बिना सही जांच के हटा दिए जा रहे हैं। उत्तर प्रदेश में ड्राफ्ट रोल में 2.89 करोड़ नाम हटाए गए, जिसे विपक्ष बीजेपी की साजिश बता रहा है ताकि अल्पसंख्यक, गरीब और विपक्षी समर्थक वोटरों को वोटिंग से वंचित किया जाए।
विपक्षी दलों का आरोप है कि विशेष रूप से मुस्लिम बहुल क्षेत्रों, प्रवासियों और कमजोर वर्गों के वोटरों को निशाना बनाया जा रहा है। पश्चिम बंगाल में टीएमसी ने इसे योग्य मतदाताओं को हटाने की साजिश बताया और सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की। विपक्ष का आरोप है कि बीएलओ यानी बूथ लेवल ऑफिसर द्वारा घर-घर सर्वे में पक्षपात किया जा रहा है और आपत्ति दर्ज करने की प्रक्रिया जटिल है। विपक्ष का दावा है कि यह बीजेपी शासित राज्यों या आगामी चुनाव वाले राज्यों में विपक्षी वोट बैंक को कमजोर करने की कोशिश है।
एसआईआर प्रक्रिया कब शुरू हुई?
एसआईआर का पहला चरण पिछले साल बिहार में विधानसभा चुनाव से पहले शुरू हुआ था। इसका दूसरा चरण 12 राज्यों व केंद्रशासित प्रदेशों में 27 अक्टूबर 2025 से शुरू हुआ। इन 12 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में 4 नवंबर से काम चला। असम में अलग से 'स्पेशल रिवीजन' प्रक्रिया चल रही है।आखिरी बार ज्यादातर राज्यों में एसआईआर प्रक्रिया 2002 से 2004 के बीच हुई थी। बिहार में 2003 की वोटर लिस्ट को आधार बनाकर गहन रिवीजन हुआ था।
एसआईआर का मक़सद क्या है?
एसआईआर का सबसे बड़ा मकसद वोटर लिस्ट को साफ-सुथरा बनाना है। सरकार का जोर खासकर विदेशी अवैध प्रवासियों को बाहर करने पर है, जिनका जन्म स्थान जांचा जाता है। बीजेपी का कहना है कि यह कदम इसलिए अहम है क्योंकि कई राज्यों में बांग्लादेश और म्यांमार से आए अवैध प्रवासियों पर कार्रवाई चल रही है। चुनाव आयोग का कहना है कि इससे वोटर लिस्ट सटीक और विश्वसनीय बनेगी।